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किसानों और मजदूरों के बच्चों ने बिहार बोर्ड में किया टॉप, आगे की पढ़ाई के लिए सरकार से मदद की आस

बिहार बोर्ड की मैट्रिक (10वीं) परीक्षा परिणाम की टॉपर्स लिस्ट में अधिकतर बच्चे कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के हैं और किसानों और मजदूरों के संतान हैं। इन बच्चों ने एक बार फिर यह साबित किया है कि प्रतिभाएं संसाधनों की मोहताज नहीं होती। अब इन बच्चों और उनके अभिभावकों को सरकार और प्रशासन से मदद की दरकार है ताकि बच्चों की आगे की पढ़ाई भी जारी रहे।

Daya SagarDaya Sagar   28 May 2020 8:40 AM GMT

किसानों और मजदूरों के बच्चों ने बिहार बोर्ड में किया टॉप, आगे की पढ़ाई के लिए सरकार से मदद की आस

बिहार के पूर्णिया जिले के गांव मझुआ बेलदारी टोला के शुभम राज (16 वर्ष) उस वक्त खुशी से उछल पड़े, जब उन्हें पता चला कि मैट्रिक (10वीं) की परीक्षा में उन्हें पूरे राज्य में 8वां स्थान प्राप्त किया है। आत्मविश्वास से लबरेज शुभम गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं कि उन्हें इस परिणाम की पूरी उम्मीद थी क्योंकि उन्होंने इसके लिए कड़ी मेहनत की थी। उन्होंने यह भी बताया कि यह उम्मीद सिर्फ उन्हें ही नहीं उनके माता-पिता और उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों को भी थी, क्योंकि उन्हें शुभम की मेहनत पर पूरा भरोसा था।

शुभम के पिता हूलन महतो एक राजमिस्त्री हैं, जो भवन निर्माण का काम करते हैं। वह भी अपने बेटे के इस उपलब्धि पर फूले नहीं समा रहे हैं। फोन पर बातचीत में कहते हैं, "मुझे कितना भी मेहनत करना पढ़े लेकिन अपने बच्चों को आगे तक पढ़ाऊंगा।"

चार भाई-बहनों में सबसे बड़े शुभम को भी इस बात का इल्म है कि उनकी पढ़ाई के लिए उनके पिताजी काफी संघर्ष करते हैं, इसलिए वह भी अपने मेहनत में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। उन्होंने बताया कि वह रोज 6-7 घंटा पढ़ाई करते हैं और आगे साइंस से ग्रेजुएशन कर आईएएस की तैयारी करना चाहते हैं। उनका कहना है कि मेरिट लिस्ट में नाम आने के बाद अगर उनको सरकार से भी सहायता मिलने लगे, तो उन्हें और उनके तीन छोटे भाई-बहनों की आगे की पढ़ाई में दिक्कत नहीं आएगी।

मंगलवार को बिहार बोर्ड की मैट्रिक (10वीं) की परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ। 14,94,071 विद्यार्थियों में से कुल 80.59% यानी 12,02,030 विद्यार्थी पास हुए हैं। इनमें से 4,03,392 विद्यार्थी फर्स्ट डिवीजन में, 5,24,217 सेकेंड डिवीजन में और 2,75,402 थर्ड डिवीजन में पास हुए। टॉप करने वालों की सूची में उन बच्चों का भी नाम शामिल हैं, जिन्होंने अपनी कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि और परिस्थितियों को धता बताते हुए एक बार फिर यह साबित किया कि प्रतिभाएं संसाधनों की मोहताज नहीं होती, बशर्ते उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन मिलता रहे।

इस परीक्षा को रोहतास जिले के हिमांशु राज ने टॉप किया है। धान का कटोरा कहे जाने वाले रोहतास जिले के तेनुअज पंचायत के नटवार कला गांव के रहने वाले हिमांशु राज ने 500 में से 481 अंक पाएं हैं। शुभम राज की ही तरह हिमांशु राज के घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। उनके पिता सुभाष सिंह एक छोटे किसान हैं, जो स्थानीय बाजार में रोज सब्जी और फसल बेचकर और दसवीं तक के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपने परिवार का भरण पोषण करते है। उन्होंने बताया कि उनके पास खुद की खेती नहीं है और वह दूसरों की जमीन को किराये पर लेकर खेती करते हैं।

गांव कनेक्शन से बातचीत में हिमांशु राज ने बताया कि उन्हें अच्छे अंक आने और टॉपर लिस्ट में जगह बनाने की उम्मीद तो थी लेकिन वह पूरा बिहार टॉप कर जाएंगे, इसके बारे में उन्होंने सोचा नहीं था। हिमांशु ने बताया कि वह दिन में 10 से अधिक घंटे पढ़ाई करते हैं और समय मिलने पर खेतों में भी पिता का हाथ बंटाते हैं। इससे पहले हिमांशु की बड़ी बहन ने भी मैट्रिक परीक्षा में 88 प्रतशत नंबर लाकर जिले के टॉपर्स लिस्ट में जगह बनाई थी। हिमांशु अब आगे की पढ़ाई के साथ-साथ आईआईटी की तैयारी भी करना चाहते हैं और उनकी इच्छा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने की है।

शुभम की ही तरह हिमांशु राज के पिता ने भी कहा कि अगर उनको सरकार की तरफ से कुछ मदद मिल जाता तो भविष्य में हिमांशु की पढ़ाई में सुविधा और आसानी होती। नवभारत टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार बोर्ड के टॉपर्स को सरकार की तरफ से लैपटॉप और आर्थिक मदद दी जाती है। टॉप करने वाले को एक लाख और लैपटॉप, दूसरे टॉपर को 75 हजार और लैपटॉप, तीसरे टॉपर को 50 हजार लैपटॉप और टॉप 10 के अन्य टॉपर्स को 10 हजार रूपये और लैपटॉप की मदद दी जाती है।

बिहार बोर्ड के टॉपर हिमांशु राज अपने माता-पिता के साथ

इन टॉपर्स और उनके अभिभावकों को उम्मीद है कि यह सरकारी मदद उन्हें जल्द से जल्द मिले, ताकि बच्चों की आगे की पढ़ाई में कोई दिक्कत ना आए। जैसा इस परीक्षा में चौथे नंबर पर आए सन्नू कुमार के पिता शंभू महतो कहते हैं। शंभू महतो लखीसराय में एक खेतिहर मजदूर हैं, जो दूसरों की खेतों में खेती और दिहाड़ी मजदूरी कर अपना जीविकोपार्जन करते हैं।

गांव कनेक्शन से फोन पर बात में वह कहते हैं, "चार बच्चों को पढ़ाना इतना आसान नहीं है, इसलिए उनकी दो बड़ी बेटियां बारहवीं पास करने के बाद पढ़ाई छोड़ चुकी हैं। अगर सरकार की तरफ से उन्हें मदद मिलती है, तो सन्नू की आगे की पढ़ाई में बहुत मदद मिलेगी।" उन्होंने बताया कि राज्य में चौथा स्थान लाने के बाद भी उन्हें अभी तक किसी स्थानीय अधिकारी या नेता का फोन नहीं आया, जिससे वह थोड़े से निराश भी हैं। सन्नू ने बताया कि वह बड़ा होकर सिविल सर्विसेज में जाना चाहते हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार मैट्रिक (10वीं) पास करने के बाद पढ़ाई छोड़ने वाले राज्यों में बिहार का देश में असम के बाद दूसरा स्थान है। इस रिपोर्ट के अनुसार बिहार में लगभग 32 प्रतिशत छात्र 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। इसमें छात्राओं का प्रतिशत 33.7 और छात्रों का प्रतिशत 30.3 है।

डाटा सोर्स- एमएचआरडी, इमेज सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस न्यूजपेपर

समस्तीपुर के हरपुर की रहने वाली ज्योति कुमारी ने 500 में से 475 नंबर लाकर छठा स्थान प्राप्त किया है। तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी ज्योति अपनी मां से प्रेरणा लेती हैं, जो समस्तीपुर में जीविका दीदी हैं और समाजसेवा का कार्य करती हैं। ज्योति के पिता एक सीमांत किसान हैं, जो अपनी छोटी सी खेती में फसल और सब्जी उगाकर घर चलाते हैं, वहीं ज्योति के बड़े भाई पटना में रहकर बच्चों की कोचिंग लेते हैं और बिहार सिविल सेवाओं की तैयारी करते हैं। ज्योति भी बिहार पीसीएस (बीपीएससी) में सफल होकर अपने राज्य बिहार के लोगों की सेवा करना चाहती हैं।

समस्तीपुर के ही दुर्गेश ने 500 में 480 अंक हासिल कर इस परीक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त किया। समस्तीपुर के जितवारपुर स्थित एसके हाईस्कूल में पढ़ने वाले दुर्गेश के पिता एक किसान हैं लेकिन उन्होंने अपने बेटे की पढ़ाई में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। दुर्गेश भविष्य में आईआईटी से इंजीनियरिंग करना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने सबसे अधिक फिजिक्स, केमेस्ट्री और मैथ्स पर ध्यान दिया था।

बिहार बोर्ड के सेकेंड टॉपर दुर्गेश अपने परिवार के साथ

गांव कनेक्शन से फोन से बातचीत में उन्होंने कहा कि वह रोज आठ से दस घंटे पढ़ाई करते हैं। आंख पर लगे मोटे चश्मे के बारे में पूछने पर वह हंसते हुए कहते हैं कि बचपन में ही उन्हें चश्मा लग गया था और फिर पढ़ाई करने से यह लगातार मोटा होता चला गया। हालांकि उन्हें इससे बहुत अधिक दिक्कत नहीं है और आगे भी कड़ी मेहनत करके वह आईआईटी में पढ़ाई करने के अपने सपने को सच करना चाहते हैं।

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