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छत्तीसगढ़: केंद्र और राज्य के नियम-शर्तों में उलझे किसान, बाढ़ में खराब हुई फसलों का मुआवजा देने से बीमा कंपनियों का इनकार

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले में अगस्त के आखिरी सप्ताह में हुई भारी बारिश के चलते लगभग 50 से 60 गांवों के किसानों की फसल बर्बाद हो गई, लेकिन किसानों को इसका कोई मुआवजा नहीं मिल रहा है।

- शुभम ठाकुर

"बीते हफ्ते एक रात दो दिन की लगातार बारिश के बाद शिवनाथ नदी का पानी अचानक हमारे घरों में घुसने लगा। जल्दबाजी में घर का आधा सामान हमने गांव के ही दूसरे लोगों के घरों में पहुंचाया और आधा घर पर ही छोड़ दिया। रात गुज़ारने के लिए हमने गांव के ही एक अन्य व्यक्ति के घर पर आश्रय ली। सुबह जब घर लौटे तो हमारा कच्चा मकान टूट चुका था।"

यह बताते हुए छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के बहिंगा गांव के रहने वाले बिसरू ध्रुव के चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान है। यह पूछने पर कि आपका इतना नुकसान हो गया फिर भी आप मुस्कुरा रहे हैं, बिसरू कहते हैं कि हम गरीबों के पास रोने के बहुत कारण हैं, हर बात पर रोने लगे तो कभी खुश नहीं रह पाएंगे।

गांव कनेक्शन की टीम जब बिसरू ध्रुव के घर पहुंची तो वे अपने टूटे हुए घर की मरम्मत कर रहे थे। बिसरू कहते हैं कि उन्हें नहीं समझ आ रहा है कि वे अब अपना घर कैसे ठीक करेंगे, क्योंकि हर दिन शाम को बारिश होने लगती है। बिसरू ने अपने घर से ही सटे लगभग डेढ़ एकड़ खेत में धान की खेती की थी। वे बताते हैं कि इस बाढ़ में उनकी पूरी फसल चौपट हो गई है। घर की मरम्मत में बिसरू का हाथ बटा रही उनकी पत्नी बताती हैं कि उनके बेटे-बहु कमाने-खाने पूना गए थे, कोरोना संकट के चलते वे गांव लौट आए हैं और फिलहाल उनके पास कोई काम नहीं है।

बिसरू ने बताया, "बाढ़ के बाद तीन-चार दिनों तक हमारी सुध लेने शासन की ओर से कोई नहीं आया। कल पटवारी आया था, हमारे दस्तावेज लेकर गया है। उसने कहा है कि मुआवजा मिलना होगा तो मिल जाएगा। नहीं मिलेगा तो मैं उसमें कुछ नहीं कर सकता।" बिसरू ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत अपनी फसल का बीमा करवाया था। बिसरू कहते हैं कि पटवारी ने बताया है कि उनकी (बिसरू की) धान की फसल जलप्लावन की वजह से बर्बाद हुई है इसलिए उन्हें बीमा की राशि नहीं मिलेगी।


छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले में अगस्त के आखिरी सप्ताह में हुई भारी बारिश के चलते लगभग 50 से 60 गांवों में किसानों की फसल बर्बाद हो गई, लेकिन किसानों को इसका कोई मुआवजा नहीं मिल रहा है। राज्य सरकार की एक अधिसूचना के मुताबिक जलप्लावन यानी बाढ़ की स्थिति में धान की फसल बीमा के दायरे में नहीं आती, जबकि सोयाबीन अरहर आदि फसल आती है, जबकि धान यहां के किसानों की मुख्य फसल है। केंद्र सरकार की गाइडलाइन के अनुसार किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा होने पर बीमा की राशि किसानों को दी जानी चाहिए, लेकिन राज्य और केंद्र सरकार के नियमों में उलझे किसानों का इससे नुकसान हो रहा है।

इस गांव में हमारी मुलाकात बहिंगा ग्राम पंचायत की सरपंच कुमारी निषाद के पति राधेश्याम निषाद से हुई। उन्होंने हमें बताया कि शिवनाथ नदी में आए बाढ़ की वजह से गांव में लगभग 50 से 60 एकड़ की फसल बर्बाद हो गई है। जिसमें लगभग 25 एकड़ धान की फसल और 35 एकड़ सोयाबीन और अरहर की फसल शामिल है। बीमा के बारे में पूछने पर राधेश्याम ने बताया कि बीमा कंपनी ने इसे 'जलप्लावन' बताकर धान की फसल के लिए बीमा की राशि देने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि बिसरू के अलावा गांव में तारण यादव व भवानी ध्रुव का घर भी ढह गया है।

शिवनाथ नदी के किनारे बसे एक अन्य गांव बहेरघट की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है। बहेरघट निवासी किसान अभिषेक शर्मा बताते हैं, "मैं 60-70 एकड़ जमीन पर धान, पपीता व अरहर की खेती करता हूं। बाढ़ की वजह से मेरी धान की 5 एकड़ फसल बर्बाद हो गई है। इसके साथ ही 6 एकड़ पपीते की फसल भी खराब हो गई है।" अभिषेक अनुमान लगाते हुए बताते हैं कि गांव में कुल-मिलाकर लगभग 300 एकड़ की फसल बर्बाद हुई है। और इससे कम से कम 100 किसान परिवार प्रभावित होंगे।

इसी तरह हम शिवनाथ नदी के किनारे बसे डंगनिया गांव में भी किसानों का हाल जानने पहुंचे। डंगनिया निवासी एवन साहू ने इस बार 11 एकड़ जमीन पर खेती की है, जिसमें से तीन एकड़ जमीन उन्होंने किराये पर (जिसे स्थानीय भाषा में रेघा कहते हैं।) ली है। उन्होंने धान, अरहर, मूंगफली और सब्जी की खेती की है। वह बताते हैं कि उनकी आधी यानी लगभग 5 एकड़ फसल बर्बाद हो गई है, जिसमें ज्यादा हिस्सा धान का है। उनकी फसल का बीमा नहीं हुआ है क्योंकि वह अपना पुराना कर्ज नहीं चुका पाए थे।


डंगनिया के ही रहने वाले रमेश साहू ने बताया कि उन्होंने 8 एकड़ जमीन पर धान की और दो एकड़ पर अरहर की खेती की है। इस बाढ़ की वजह से उनका आधे से ज्यादा धान और पूरी अरहर की फसल चौपट हो गई है। उन्होंने अपनी फसल का बीमा नहीं करवाया था क्योंकि उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं थी। इसी तरह डंगनिया निवासी फंतू साहू ने डेढ़ एकड़ जमीन पर सोयाबीन व डेढ़ एकड़ पर ही सब्जी की खेती की थी। शिवनाथ नदी में आई बाढ़ की वजह से उनकी भी पूरी फसल बर्बाद हो गई है।

यह कहानी बहिंगा, बहेरघट और डंगनिया की ही नहीं है। यह तांडव केवल शिवनाथ नदी ने ही नहीं मचाया है। अगस्त के आखिरी सप्ताह में भारी बारिश के चलते जिले की तीन नदियां शिवनाथ, खारुन और सुरही उफान पर थे। बेमेतरा जिला पंचायत के सभापति राहुल टिकरिहा के मुताबिक शिवनाथ की बाढ़ से नदी के किनारे बसे खम्हरिया, पेंड्री, कुरूद, रांका, सहगांव, जमघट, सिलघट, ताकम, लावातारा, संडी, डंगनिया, बहिंगा, बहेरघट और नवागांव समेत कुल 20 से 25 गांवों के किसानों को नुकसान हुआ है। इसके अलावा खारुन नदी की बाढ़ से भालेसर, कुम्ही, ढाबा, मुड़पारकला, मुड़पारखुर्द, बेलौदी कला, पहंदा, जामगांव, बेरला कला और कंडरका गांव प्रभावित हैं। इधर सुरही नदी में बाढ़ की वजह से इसके किनारे बसे बचेड़ी, गाड़ाडीह, मौहाभाठा, बुधवारा, और बासीन समेत कई गांव प्रभावित हैं। इस तरह देखा जाए तो जिले के लगभग 60 से 65 गांवों में किसानों को नुकसान हुआ है। स्थानीय लोग बताते हैं कि इस बार की बाढ़ काफी भयानक थी, इसके पहले इतनी भयंकर बाढ़ साल 2014 में आई थी।

बेमेतरा जिले में बचेड़ी नामक एक गांव सुरही नदी के किनारे स्थित है। बचेड़ी निवासी लखन लाल धुर्वे ने इस बार 12 एकड़ जमीन पर खेती की थी। जिसमें 4 एकड़ पर धान व बाकी 8 एकड़ में सोयाबीन शामिल है। उनकी पूरी फसल बर्बाद हो गई है। ग्रामीण बताते हैं कि गांव में 1600 एकड़ का रकबा है, जिसमें लगभग 100 एकड़ फसल बर्बाद हो गई है। ग्रामीणों के मुताबिक बाढ़ की वजह से गांव में लगभग 20 से 25 किसानों की फसल को नुकसान हुआ है। बचेड़ी के ही रहने वाले संतु सिन्हा ने एक एकड़ में सब्जी, एक एकड़ में सोयाबीन व 10 एकड़ में धान की फसल उगाई थी। इनकी भी पूरी फसल चौपट हो गई है। लखन लाल और संतु सिन्हा समेत हमने जितने किसानों से बात की उनमें से ज्यादातर ने यही कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि जलप्लावन की स्थिति में धान की फसल बीमा के दायरे में नहीं आती।


सुरही नदी राजनांदगांव जिले के गंडई के पास पैरीमीठा गांव के पहाड़ से निकली है। यह सैकड़ों गांवों में लोगों की प्यास बुझाती हुई देवकर के पास कुम्हीबुडा गांव से आगे शिवनाथ नदी में समा जाती है। इसी तरह 290 किलोमीटर लंबी शिवनाथ नदी महानदी की प्रमुख सहायक नदी है। यह राजनांदगांव जिले के अंबागढ़ चौकी तहसील से निकलती है व दुर्ग, बिलासपुर से होते हुए जांजगीर चांपा जिले में शिवरीनारायण के पास महानदी से मिल जाती है। वहीं खारून नदी की लंबाई 208 किलोमीटर है, यह बालोद जिले के संजारी क्षेत्र से निकलती है व शिवनाथ नदी में मिल जाती है।

छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत दो बीमा कंपनियों को बीमा का काम दिया गया है। एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड जिन जिलों में बीमा करेगी उनमें राजनांदगांव, सरगुजा, मुंगेली, कोंडागांव, नारायणपुर, बेमेतरा, बलौदाबाजार, दुर्ग, कोरबा, बालोद, कोरिया, महासमुंद, धमतरी, कांकेर, रायगढ़, दंतेवाड़ा, सूरजपुर, जांजगीर-चांपा, सुकमा और गरियाबंद शामिल हैं। वहीं दूसरी बीमा कंपनी बजाज एलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी है, जो जशपुर, बलरामपुर, बस्तर, बीजापुर, बिलासपुर, रायपुर, कबीरधाम और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में बीमा का काम कर रही है।

इस आधार पर बेमेतरा जिले में बीमा का काम एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड को दिया गया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यहां सबसे ज्यादा धान की ही फसल बर्बाद हुई है, और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अनुसार छत्तीसगढ़ सरकार ने धान सिंचित व धान असिंचित फसल में जलप्लावन से होने वाली क्षति को ही बीमा के दायरे से बाहर कर दिया है।


जलप्लावन से धान की फसल में होने वाली क्षति नहीं आती बीमा के दायरे में

राहुल टिकरिहा के मुताबिक बीमा कंपनी ने बर्बाद हुए धान की फसल के लिए किसानों को बीमा की राशि देने से इनकार कर दिया है। राहुल का कहना है कि किसानों के साथ धोखा हुआ है। यहां की मुख्य फसल धान है और नियम-शर्त जोड़कर इसे ही बीमा के दायरे से बाहर कर दिया गया है। जबकि अरहर, सोयाबीन जैसी अन्य फसलें बीमा के दायरे में आती हैं। ऐसे में बीमा कराने का मतलब ही क्या हुआ। किसान बीमा इसलिए करवाते हैं ताकि उन्हें संकट की स्थिति में आर्थिक सहयोग मिल सके। वे सवाल करते हुए कहते हैं कि जलप्लावन अतिवृष्टि का ही नतीजा है। ऐसे में यदि अतिवृष्टि प्राकृतिक आपदा है तो फिर जलप्लावन प्राकृतिक आपदा क्यों नहीं है? किसानों से बीमा का पैसा लिया गया है लेकिन जब बीमा राशि देने की बात आती है तो किसानों को ठगा जाता है। यहां कुल-मिलाकर किसानों को ही मरना है।

'फसल बर्बाद होने की जानकारी सरकार को नहीं देना चाहते किसान'

नाम नहीं बताने की शर्त पर छत्तीसगढ़ के कृषि विभाग के ही एक अधिकारी बताते हैं, "अगर कोई किसान आरबीसी 6-4 (राजस्व पुस्तक परिपत्र) के अनुसार बर्बाद हुए फसल की जानकारी सरकार को देता है तो इस स्थिति में उसे प्रति हेक्टेयर लगभग साढ़े तेरह हजार रुपये की मुआवजा राशि शासन की ओर से मिलेगी। लेकिन ऐसा करने पर वह किसान अपने उस रकबे पर फसल नहीं बेच पाएगा।" अधिकारी के मुताबिक अगर वह किसान कमीशन लेकर अपने रकबे पर दूसरे की फसल को बेचता है तो ऐसे में वह सरकारी मुआवजे से अधिक कमाई कर लेगा।

इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि फसल बर्बाद होने पर प्रति हेक्टेयर साढ़े तेरह हजार का मुआवजा शासन द्वारा दिया जाता है, यानी एक एकड़ का मुआवजा लगभग साढ़े पांच हजार रुपये मिलेगा। फसल बर्बाद होने की जानकारी सरकार को देने के बाद किसान अपने उस रकबे पर फसल नहीं बेच सकता। एक एकड़ रकबे पर अधिकतम 15 क्विंटल धान बेचा जा सकता है। खरीफ विपणन वर्ष 2019-20 के अनुसार छत्तीसगढ़ में कॉमन वेरायटी धान का समर्थन मूल्य 1815 रुपये प्रति क्विंटल है। इसके साथ ही किसानों को बोनस राशि के तौर पर 685 रुपये भी दिया जाता है। इस तरह किसान को कुल 2500 रुपये प्रति क्विंटल की राशि प्राप्त होती है। मान लीजिए कि वह किसान फसल बर्बाद होने की स्थिति में किसी दूसरे किसान की फसल को अपने रकबे पर बेचने देता है और बदले में कमीशन के तौर पर 685 रुपये बोनस की राशि अपने पास रखता है तो एक एकड़ में वह 685X15 यानी 10275 रुपये की कमाई कर लेगा। जोकि मुआवजे की राशि से लगभग दोगुना है। यही वजह है कि ज्यादातर किसान अपनी फसल बर्बाद होने की जानकारी सरकार को देने से कतराते हैं।


क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक?

आम आदमी पार्टी के छत्तीसगढ़ के संयोजक और कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर संकेत ठाकुर राज्य में किसानों के हितों को लेकर लंबे समय से काम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि दुर्भाग्य की बात है कि हर बार किसान ही धोखा खाया है और सरकारें इसपर कभी कोई कड़ा कदम नहीं उठा सकी है। पहले से ही इसे नियम में लिख दिया गया है कि जलप्लावन की स्थिति में धान की फसल बीमा के दायरे में नहीं आएगी। नदी के किनारे, नहर का पानी छोड़ा जाता है तब या बहुत ज्यादा बारिश होने पर जलप्लावन तो होता ही है। इसे लिख तो दिया गया है पर इसका प्रचार-प्रसार नहीं हुआ है। अधिकांश किसान अनपढ़ हैं। उन्हें तो बीमा कैसे होता है इसकी भी जानकारी नहीं होती। अब जब फसल बर्बाद हो गई तब उन्हें बताया जाता है कि देखिए हमने तो लिखा था।

क्या कहते हैं सरकारी अधिकारी?

इस संबंध में हमने बेमेतरा जिले के जिला कृषि अधिकारी महादेव मानकर से बात की। वह कहते हैं कि किसानों को बीमा की राशि अभी तो नहीं मिलेगी पर जब फसल की कटाई होगी तब मिलेगी। मानकर का कहना है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की गाइडलाइन के अनुसार गांव इकाई है। गांव इकाई में चार फसल कटाई के प्रयोग होंगे, इसके जो परिणाम होंगे उसकी तुलना पिछले पांच सालों की उपज से होगी। अगर फसल कटाई में उपज पिछले पांच सालों से कम आती है तो उसके आधार पर किसानों को बीमा का लाभ दिया जाएगा।

इसी तरह रायपुर जिले के कृषि अधिकारी रामलखन खरे बताते हैं, "फसल बीमा योजना को लेकर भारत शासन की जो भी नियम-शर्तें हों, राज्य सरकार अपनी परिस्थितियों के अनुसार उसमें बदलाव कर सकती है। छत्तीसगढ़ सरकार ने धान की फसल को जलप्लावन की स्थिति में बीमा के दायरे से बाहर रखा है। छत्तीसगढ़ शासन की अधिसूचना में इसका जिक्र है।

वहीं केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की गाइडलाइन के अनुसार, "खड़ी फसल (बुवाई से कटाई तक के लिए) नहीं रोके जा सकने वाले जोखिमों जैसे सूखा, अकाल, बाढ़, सैलाब, कीट एवं रोग, भूस्खलन, प्राकृतिक आग और बिजली, तुफान, ओले, चक्रवात, आंधी, टेम्पेस्ट, तुफान और बवंडर के कारण उपज के नुकसान को कवर करने के लिए व्यापक जोखिम बीमा प्रदान की जाएगी।"


रबी फसल भी हो गई थी बर्बाद, जिसका मुआवजा अब तक नहीं

बेमौसम बारिश व ओलावृष्टि की वजह से बीते रबी फसल में भी जिले के किसानों को भारी नुकसान हुआ था। किसानों की चना, गेहूं, अलसी और तिवरा की फसल बर्बाद हो गई थी। राहुल के मुताबिक जिले के लगभग 1 लाख 25 हजार किसानों की क्षतिपूर्ति के लिए राजस्व विभाग द्वारा 175 करोड़ रुपए की राशि का डिमांड नोट राज्य सरकार को भेजा गया था। इसमें से राज्य सरकार की ओर से चार महीने पहले महज 15 करोड़ की राशि ही पीड़ित किसानों के लिए भेजी गई। राहुल कहते हैं कि जब ओलावृष्टि से बर्बाद रबी फसल की क्षतिपूर्ति किसानों को आज तक नहीं मिल पाई है, तो बाढ़ की क्षतिपूर्ति की उम्मीद किसान कैसे करे? वे कहते हैं कि यह इलाका छत्तीसगढ़ शासन में कृषि मंत्री रविंद्र चौबे का गृह जिला है। यहां की ये स्थिति है तो आप प्रदेश के बाकी हिस्सों की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं।

कहा जा सकता है कि सरकार की तमाम नियम-शर्तों का खामियाजा अंत में किसानों को ही भुगतना पड़ता है। सरकार की जो भी नियम-शर्तें हों, पर सच्चाई यह है कि किसानों को एक बार फिर मुआवजे के लिए ना जाने कितने महीनों-सालों तक इंतजार करना होगा। सरकारों को चाहिए कि वह ऐसे नियम-शर्त बनाए जो किसानों को परेशान करने के बजाए उनकी सहूलियत के लिए हों।

(शुभम ठाकुर छत्तीसगढ़ से स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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