पहाड़ों में डर: उत्तराखंड आपदा के बाद घर लौटने से डर रहे हैं 13 गांवों की महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग

कड़कड़ाती ठंड के बावजूद चमोली में भूस्खलन और बाढ़ से प्रभावित 13 गांवों के लोग जंगलों में डेरा डाले हुए हैं। वे कहते हैं कि उनके घरों में सुरंग के कारण पहले से ही दरारें पड़ गई हैं। इस बीच, बताया जा रहा है कि ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदियों का जल स्तर फिर से बढ़ रहा है।

Megha PrakashMegha Prakash   13 Feb 2021 5:54 AM GMT

देहरादून, उत्तराखंड: ब्राह्मी देवी चमोली जिले के पेंग गांव में रहती हैं। उत्तराखंड की आपदा में पुल बह जाने के बाद जिन 13 गांवों से संपर्क टूट गया था, पेंग उनमें से एक है। ब्राह्मी देवी 7 फरवरी की सुबह बर्फ से ढंके पर्वतीय क्षेत्र में होने वाली घटना को देखने वाली पहले लोगों में से एक थीं।

ब्राह्मी देवी ने गांव कनेक्शन को बताया, "मैं जंगल में चारा और लकड़ी लेने गई थी, तभी मैंने पहाड़ों के पीछे से गड़गड़ाहट की ज़ोरदार आवाज़ सुनी। ऐसा लगा जैसे एक हजार डायनामाइट की छड़ें एक साथ ब्लास्ट हो गईं हों।" इस क्षेत्र में 7 फ़रवरी को आई आपदा के बाद अब तक 32 शव बरामद किए जा चुके हैं और 200 से अधिक लोगों के लापता होने की आशंका है। इसके साथ ही लगभग 25 से 30 श्रमिकों के एक सुरंग में फंसे होने की भी आशंका है, जहां बचाव कार्य जारी है।

ब्राह्मी देवी एक पल के लिए डर गई जब उन्होंने धूल के गुबार को पहाड़ियों से गांव की ओर आते देखा। लेकिन जल्दी ही उन्होंने खुद को संभाला। उन्होंने याद करते हुए बताया, "इससे पहले कि मैं समझ पाती कि क्या हो रहा है, बर्फ का एक बड़ा टुकड़ा, अपने साथ बोल्डर, गाद, उखड़े हुए पेड़ और पानी लेकर आ गया। मैं घबरा गई, और दूसरों को सचेत करने के लिए गाँव की ओर भागी। पर मैं तेजी से आ रहे पानी का मुकाबला नहीं कर सकी। जो महिलाएं अपने मवेशियों को चराने के लिए नीचे ले गईं थीं, वे बह गईं। ढलान पर बने घर गाद के नीचे दब गए। पृथ्वी कांप रही थी।"

Photo: By arrangement

आपदा को छह दिन हो चुके हैं। इसकी वजह से चमोली जिले के रैनी और तपोवन में जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा है। पुल के डूबने की वजह से, पेंग गांव सहित 13 गांवों से संपर्क पूरी तरह टूट गया है। जिस रैनी गांव से चिपको आंदोलन की शुरूआत हुई थी, वो भी अलग-थलग पड़ गया है। एक ज़िप-लाइन के माध्यम अलग-थलग पड़े गांवों तक आवश्यक वस्तुएं पहुंचाई जा रही है, लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि ये राहत सामग्री पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं।

रैनी और 13 अन्य गांव तिब्बत की सीमा नीती-माना घाटी में स्थित हैं। कड़कड़ाती सर्दी के दौरान लोग यहाँ से निचले इलाकों में चले जाते हैं। इस दौरान यहाँ का जीवन दूभर हो जाता है। सूकी भालगांव के युवा ग्राम प्रधान लक्ष्मण सिंह बुटोला ने गाँव कनेक्शन को बताया कि 1990 के दशक की शुरुआत में यहां सड़क बनाने को मंजूरी दी गई थी, लेकिन इसका निर्माण कभी नहीं हुआ।

लक्ष्मण सिंह ने आगे बताया, "आपदाओं के दौरान कनेक्टिविटी एक बड़ी चुनौती बन जाती है। चूंकि संपर्क के लिए एकमात्र पुल टूट गया था, इसलिए सूखा राशन एक जिप लाइन के माध्यम से गांव तक पहुंचाया जा रहा है, जिसका निर्माण हाल ही में हुआ है।"

पेंग पहला गांव था, जिसने तबाही के इस मंजर को देखा। महिलाओं और बच्चों ने अपने घरों को छोड़ दिया है और कड़ी-ठंड के बावजूद जंगल में रहने को मजबूर हैं। बुजुर्ग चिंतित दिख रहे हैं। वे पूछते हैं, "हम बहुत डरे हुए हैं। अगर ऐसा दोबारा हुआ तो हम कैसे बचेंगे?"

Photo: Rajeev Ranjan Deo Pandey/Twitter

पेंग ग्राम पंचायत की सदस्य ज्योति देवी ने गाँव कनेक्शन को बताया कि ग्रामीणों के पास खाना बनाने के लिए बिजली या ईंधन नहीं है। प्राकृतिक झरने, जो पीने के पानी का एकमात्र स्रोत हैं, उन्हें भी नुकसान पहुंचा है।

पेंग की ग्राम प्रधान, शोभना राणा ने गाँव कनेक्शन को बताया कि वे डर में जीने को मजबूर हैं। "बांध परियोजनाओं के लिए चल रहे सुरंग निर्माण कार्य के कारण बोल्डर टूट गए हैं। बाढ़ आने से पहले ही छोटे-छोटे टुकड़े गांव को नुकसान पहुंचा चुके थे। बाढ़ के कारण हम बेघर हो गए हैं। केवल सूखा राशन, लालटेन और साबुन ही हम तक पहुँच रहे हैं," शोभना राणा ने बताया।

लोगों को इसी तरह की किसी और त्रासदी की आशंका है। इसलिए पेंग की महिलाएं आग्रह कर रही हैं कि उनका कहीं और पुनर्वास किया जाए। स्थानीय महिला बैसाखी देवी ने गाँव कनेक्शन को बताया, "हमारा गाँव एक बोल्डर पर स्थित है, जो कभी भी टूट सकता है। पहले से ही, हमारे गांव के कई घरों में सुरंग खोदने के कारण दरारें पड़ गई हैं।"

Photo: By arrangement

स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि विकास के नाम पर उनके इलाकों को नष्ट किया जा रहा है। महत्वाकांक्षी जल विद्युत परियोजनाएं से स्थानीय लोगों को जो आय होती है वो अस्थायी है। मज़दूरी के तौर पर उन्हें 5,000 से 8,000 रुपए महीना ही मिलते हैं, जो कि उनके परिवार के लिए पर्याप्त नहीं है। ये लोग कुछ बचे हुए पैसों को शराब पर खर्च कर देते हैं। ग्रामीणों ने बताया कि कुछ लोगों को नदी खनन का ठेका भी मिल जाता है।

लेकिन, ज़मीनी स्तर पर वास्तव में कुछ भी नहीं बदला है। न स्कूल हैं, न अस्पताल हैं और न ही कोई सड़क है। विडंबना यह है कि बिजली पैदा करने वाली परियोजनाओं के बावजूद, उत्तराखंड की पहाड़ियाँ अंधेरे में डूबी हुई हैं। "लोगों के घरों में या तो चांद की रोशनी आती है या सूरज की," दो दशक से जोशीमठ में काम कर रहे पर्यावरणविद्, अतुल सती ने गांव कनेक्शन को बताया।

रैनी गांव के ग्राम प्रधान भुवन सिंह राणा ने गांव कनेक्शन को बताया कि ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदियों का जल स्तर बढ़ना शुरू हो गया है, जिससे लोगों में दहशत का माहौल है। नतीजतन, तपोवन सुरंग में फंसे लगभग 30 श्रमिकों के लिए चल रहा बचाव अभियान दो दिन पहले अस्थायी तौर पर रोक दिया गया था, जिसे सीमित टीमों के साथ फिर से शुरू कर दिया गया।

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