गंगा उद्भव योजना: गंगा की इकोलॉजी और डॉल्फिन का सवाल

पेयजल की समस्या को खत्म करने के लिए बिहार सरकार ने मोकामा के पास से गंगा का पानी 190 किलोमीटर दूर नालंदा और गया ले जाने का निर्णय लिया है, लेकिन इस पर कई सवाल भी उठ रहे हैं। जानकार इस प्रोजेक्ट को अव्यावहारिक मान रहे हैं, तो दूसरी तरफ इससे गंगा की परिस्थितिकी और डॉल्फिन पर भी खतरे की आशंका है।

Umesh Kumar RayUmesh Kumar Ray   27 Oct 2020 7:00 AM GMT

गंगा उद्भव योजना: गंगा की इकोलॉजी और डॉल्फिन का सवालप्रतीकात्मक तस्वीर (साभार- नवभारतटाइम्स.कॉम)

रोहिण कुमार और उमेश कुमार राय

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षी योजना गंगा उद्भव योजना का काम शुरू हो चुका है। इस योजना में गंगा का पानी पाइपलाइन के जरिये मोकामा से 190 किलोमीटर दूर नालंदा और गया ले जाया जाएगा।

इस पानी को वहां फिल्टर कर स्थानीय आबादी की जरूरतें पूरी की जाएंगी। इस प्रोजेक्ट को लेकर मोकामा के स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि गंगा नदी से पानी निकालने से मोकामा में खेती-बारी और भूगर्भ जल का रिचार्ज प्रभावित होगा।

लोगों का यह भी सवाल है कि जब बिहार सरकार जल-जीवन-हरियाली मिशन में बारिश के पाना का संचयन कर जल संरक्षण को बढ़ावा दे रही है तो इस व्यवस्था को गया और नालंदा में लागू क्यों नहीं कर रही है। मोकामा के लोगों का ये कहना भी है कि मगध क्षेत्र में जल संचयन की सदियों पुरानी परंपरा आहर-पईन का पुनरोद्धार करने की जगह बिहार सरकार वाटर लिफ्टिंग जैसी अव्यावहारिक योजना पर करोड़ों रुपए क्यों खर्च किये जा रहे हैं।

पिछली रिपोर्ट में गांव कनेक्शन ने इन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की थी। गंगा उद्भव योजना पर श्रृंखलाबद्ध स्टोरी की इस कड़ी में इस प्रोजेक्ट से गंगा की परिस्थितिकी (इकोलॉजी) और गंगा में पायी जाने वाली डॉल्फिन पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर चर्चा करेंगे।

बिहार में गंगा बक्सर के पास से प्रवेश करती है और बिहार को बीचोंबीच चीरती हुई पश्चिम बंगाल में जाती है। बिहार में गंगा की चौड़ाई कुछ कम है। बिहार की एक बड़ी आबादी गंगा पर निर्भर है। कृषि कार्यों में सिंचाई गंगा से की जाती है, तो दूसरी तरफ हजारों मछुआरों की आजीविका गंगा नदी से चलती है। इसके अलावा गंगा जैव विविधता के लिहाज से भी अहम है। जानकारों का कहना है कि गंगा नदी से पानी निकालने का गंगा की परिस्थितिकी और जलीय जीवों पर गहरा असर पड़ेगा।

गौरतलब हो कि बिहार में गंगा नदी में 300 किलोमीटर के दायरे में 700 डॉल्फिन पाये गये थे। डॉल्फिन की मौजूदगी को लेकर मोकामा से मनिहारी तक सर्वेक्षण हुआ था। डॉल्फिन की मौजूदगी वहां ज्यादा होती है, जहां का पानी साफ होता है, ऐसे में मोकामा से मनिहारी के बीच 700 डॉल्फिन मिलने का मतलब है कि यहां गंगा काफी हद तक साफ है।

गंगा पर काफी समय से काम कर रहे तिलका मांझी यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर सुनील कुमार चौधरी ने गांव कनेक्शन के साथ बातचीत में इस प्रोजेक्ट की व्यावहारिकता पर सवाल उठाते हुए कहा, "गंगा में मॉनसून भर जो पानी आता है, वही पानी बाकी समय में इस्तेमाल होता है, ऐसे में गंगा से कृत्रिम तौर पर पानी निकालने से बहुत प्रभाव पड़ेगा।"

गौरतलब है कि नदी के साथ भूगर्भ जल की वर्टिकल कनेक्टिविटी और तालाब-पोखरों के साथ लेटरल कनेक्टिविटी होती है। यानी नदी भूगर्भ जल को रिचार्ज करती ही है, नदी के आसपास जो पोखर-तालाब हैं, उन्हें भी पानी पहुंचाती है। अतः नदी से पानी निकालने से भूगर्भ जल और तालाब-पोखरों पर भी असर पड़ सकता है।

इसके लिए बहुत जरूरी है कि एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट (EIA) किया जाये और इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाये।

गंगा उद्भव योजना से डॉल्फिन और गंगा की परिस्थितिकी पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर जब गांव कनेक्शन ने जल संसाधन विभाग के सर्किल-3 के सीनियर इंजीनियर (प्लानिंग व मॉनीटरिंग) संजय कुमार तिवारी से बात की, तो उन्होंने कहा, "सभी तरह की स्टडी हो चुकी है और इस प्रोजेक्ट से कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।"

जब गांव कनेक्शन ने उनसे एनवायरमेंट इम्पैक्ट स्टडी की रिपोर्ट मांगी, तो उन्होंने कहा कि वह किसी तरह की रिपोर्ट देने के लिए अधिकृत नहीं हैं, लेकिन उनके आकलन में किसी तरह का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है।

गांव कनेक्शन को मालूम हुआ है कि गंगा उद्भव योजना से गंगा की परिस्थितिकी और डॉल्फिन पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर किसी तरह का अध्ययन नहीं हुआ है।

स्टेट एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी की स्टेट एनवायरमेंट असेसमेंट कमेटी ने गांव कनेक्शन को बताया कि गंगा उद्भव योजना को लेकर किसी तरह का अध्ययन नहीं किया गया है।

कमेटी के सदस्य व नेशनल इस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग से जुड़े नित्यानंद सिंह मौर्य ने गांव के साथ बातचीत में कहा, "दरअसल, साल की 2006 की पर्यावरण व वन मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार इस प्रोजेक्ट की जो प्रकृति है, उसमें एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट कराने की बाध्यता नहीं है। इस अधिसूचना का सहारा लेकर सरकार ने असेसमेंट नहीं कराया होगा। अगर पाइपलाइन के जरिये तेल या गैस ले जायी जाती, तो असेसमेंट अनिवार्य हो जाता।"

"चूंकि इम्पैक्ट असेसमेंट अनिवार्य नहीं है, तो किसी तरह की जनसुनवाई की भी जरूरत नहीं है", उन्होंने कहा।

मोकामा के स्थानीय लोगों ने भी पुष्टि की कि प्रोजेक्ट को लेकर किसी तरह की जनसुनवाई नहीं की गई है। मोकामा के स्थानीय निवासी प्रणव शेखर शाही ने कहा कि मोकामा क्षेत्र में इसको लेकर कोई जनसुनवाई नहीं हुई। अखबारों से उन्हें पता चला कि ये योजना लाई जा रही है। वहीं नित्यानंद सिंह मौर्या का कहना है कि सरकार को एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट कराना चाहिए था।

उन्होंने कहा, "जिस पाइपलाइन के जरिये पानी ले जाया जायेगा, उसकी चौड़ाई काफी ज्यादा है। चूंकि पाइपलाइन अंडरग्राउंड से जाएगी तो जाहिर है कि जमीन के भीतर बड़े गड्ढे बनाने होंगे। फिर जहां पानी जायेगा, वहां इसे स्टोर करना होगा। इन सबसे जाहिर तौर पर पर्यावरण पर प्रभाव पड़ेगा। लेकिन, कितना प्रभाव पड़ेगा, ये तब मालूम होता, जब अध्ययन किया गया होता।"

जानकारों ने गंगा से पानी से निकालने से गाद की समस्या के और गंभीर होने की भी आशंका जाहिर की है।

सुनील कुमार चौधरी कहते हैं, "गंगा से पानी निकाल लेने से इसके फ्लो पर प्रभाव पड़ेगा। गंगा अपनी प्राकृतिक रफ्तार से बहती है, तो वह अपने साथ गाद को भी बहाकर ले जाती है। पानी निकाल लेने से गंगा के बहाव पर प्रभाव पड़ेगा, जिससे वह गाद को अपने साथ बहाकर नहीं ले जा पायेगी। इससे गाद एक जगह जमा होती जाएगी। इससे नदी उथली होती जायेगी।"

गौरतलब हो कि फरक्का बराज बनने के बाद गंगा में गाद का जमना तेज हुआ है। पिछले वर्षों में हुए अध्ययनों में पता चला है कि गंगा में इतनी गाद जमा हो गई है कि उसे हटाने के लिए तीन दशक लग जायेंगे। गंगा में गाद जम जाने के कारण मोकामा टाल में हाल के वर्षों में जलजमाव ज्यादा हो रहा है। स्थानीय लोगों की मानें, तो पहले मोकामा टाल से पानी जल्दी निकल जाता था, लेकिन अब पानी निकलने में काफी देर हो जाती है, जिससे बुआई भी काफी देर से होती है। इससे फसलों के उत्पादन पर भी असर हुआ है।

नदियों पर लम्बे समय से काम कर रहे डॉ दिनेश मिश्र कहते हैं, "अध्ययन में ये निष्कर्ष निकाला गया कि गंगा में रोजाना जितनी गाद आती है, उसका दोगुना गाद रोज निकालना होगा और ऐसा लगातार 30 सालों तक करते रहना होगा, तब जाकर गंगा से गाद पूरी तरह हटेगी। लेकिन फिर सवाल उठता है कि उस गाद का सरकार क्या करेगी, कहां डम्प करेगी। बीच में, बिहार सरकार ने कहा था कि मिट्टी से ईंट बनायी जाएगी, लेकिन ईंट की खपत कहां होगी?"

जानकार इस परियोजना को गंगा के जलीय जीवों और गांगेय डॉल्फिन के लिए भी नुकसानदेह मान रहे हैं।

सर्वेक्षण करने वाली टीम का हिस्सा रहे सुनील चौधरी ने गांव कनेक्शन से कहा, "बिहार के इस हिस्से में गंगा का पानी अन्य राज्यों के मुकाबले अब भी ज्यादा साफ है।"

दो साल पहले केंद्र सरकार ने गंगा के रास्ते वाटर ट्रांसपोर्ट सेवा शुरू करने के लिए जल मार्ग विकास प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी है। इसके तहत 5369.18 करोड़ रुपए खर्च कर जल मार्ग विकसित किया जाएगा। प्रोजेक्ट साल 2023 तक पूरा हो जायेगा।

इस जल मार्ग में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। प्रोजेक्ट के तहत 6 शहरों में फेरी टर्मिनल विकसित किया जाएगा, जिनमें से तीन टर्मिनल बिहार के पटना, भागलपुर और मुंगेर में होंगे। इसका मतलब है कि बिहार में गंगा नदी में जल मार्ग से खासी हलचल रहेगी, जो डॉल्फिन और गंगा के अन्य जलीय जीवों को प्रभावित कर सकते हैं।

डाउन टू अर्थ मैगजीन के लिए लिखे एक लेख में नालंदा ओपेन यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर, गांगेय डॉल्फिन के विशेषज्ञ और डॉल्फिन मैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर रवींद्र कुमार सिन्हा ने कहा था कि जल मार्ग विकास प्रोजेक्ट से गांगेय डॉल्फिन को खतरा हो सकता है।

उन्होंने लेख में लिखा था, "ये गहरी चिंता की बात है कि प्रस्तावित प्रोजेक्ट गांगेय डॉल्फिन के अलावा अन्य विलुप्तप्राय जलीय जीवों का अस्तित्व खत्म कर सकता है।"

डॉल्फिन पर काम कर रहे अरविंद मिश्रा ने गांव कनेक्शन के साथ बातचीत में इस प्रोजेक्ट के चलते डॉल्फिन पर असर पड़ने की आशंका व्यक्त की। उन्होंने कहा, "गंगा से पानी निकालने से डॉल्फिन के साथ ही अन्य जलीय जीव मसलन घोंघा, सितुआ, उदबिलाव पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि उन्हें पर्याप्त पानी नहीं मिल पायेगा।"

"जिस जगह से पानी लिया जाएगा, वो नेशनल एक्वाटिक जोन का हिस्सा है, इसलिए इस प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट तो होना ही चाहिए था", उन्होंने आगे कहा, "बिहार में गंगा में अभी अच्छी संख्या में डॉल्फिन मौजूद है। लोगों में भी जागरूकता है। लेकिन, अगर इस तरह बिना किसी अध्ययन के और नफा-नुकसान का आकलन किये बिना प्रोजेक्ट शुरू किया जाता है, तो पूरे प्रयास पर पानी फिर जायेगा। इसलिए सरकार को इस पर गंभीरता से चिंतन-मनन करना चाहिए।

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