बिजली की 'खेती' कर हर महीने 6000-8000 रुपए कमा रहे गुजरात के किसान

Arvind ShuklaArvind Shukla   5 Feb 2020 12:46 PM GMT

मुजकुआ (गुजरात)। गुजरात के मुजकुआ गांव के एक दर्जन किसान अपने खेतों में सोलर के सहारे बिजली पैदाकर मुनाफा कमा रहे हैं। ये किसान पहले ट्यूबवेल के बिल के लिए बिजली विभाग को 12,000 से 15,000 रुपये देते थे, वही किसान अब हर महीने ग्रिड को बिजली बेचकर 6000 से 8000 रुपये महीने कमा रहे हैं।

"बिजली आने का कोई समय नहीं था, कभी दिन में आती थी, कभी रात में आती थी। इसलिए रात में भी ट्यूबवेल चलाने आने पड़ता था। साल में 12 हजार से 15 हजार तक का बिल भी आता था। दो साल पहले हमारे खेतों में सोलर लगवाए गए, जिसके बाद मैंने अपना कनेक्शन कटवा दिया। खेत में बिजली का काम कभी-कभी होता है बाकि बिजली हम ग्रिड को दे देते हैं, जिससे हर महीने 6 हजार से 8 हजार रुपए मिलते हैं।" लाबू भाई पटेल अपने खेत में लाइन से लगे सोलर पैनल दिखाते हुए कहते हैं।

लाबू पटेल (65 वर्ष) गुजरात के आणंद जिले के अंनकाल ब्लॉक के मुझकुआ गांव में रहते हैं। अहमदाबाद से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने गोद लिया है। दो साल पहले यहां कॉपरेटिव के मॉडल पर गांव में 11 किसानों के यहां सौर ऊर्जा यूनिट स्थापित की गई। लाबू भाई के यहां 10 पैनल लगाए गए हैं जिनकी कुल क्षमता 15 किलोवाट है। जिससे वो 15 हार्सपावर को मोटर चलाते हैं और बाकी की बिजली ग्रिड के सहारे ग्रिड को बेच देते हैं।

मुजकुआ गांव में लाबू भाई पटेल के खेत में लगे सोलर पैनल और उनसे जुड़ा ट्यूबवेल। फोटो- सुयश

एनडीडीबी के कार्यकारी निदेशक मीनेश शाह गांव कनेक्शन को बताते हैं, "किसानों की आमदनी बढ़ाने में ये एक बेहतर कदम है। एक तो किसानों का बिजली का बिल बच रहा है, दूसरा उन्हें बिजली ग्रिड को देने पर पैसे मिल रहे हैं। क्योंकि जितनी कम देर सिंचाई पंप चलेगा जितनी देर बिजली ग्रिड को जाएगी तो किसानों को पैसा मिलेगा।"

एनडीडीबी ने मुजकुआ सौर्य ऊर्जा उत्पादक कॉपरेटिव बनाकर गांव में सितंबर 2018 में इसकी शुरुआत कराई थी। सभी किसानों के यहां की बिजली पहले गांव में बनाए गए समिति के सेंटर में जाती है, जहां से वो मध्य गुजरात बिजली वितरण कंपनी लिमिटेड को भेजी जाती है। बदले में किसानों को 3.47 पैसे प्रटि यूनिट का भुगतान होता है। साथ ही 2.50 पैसे का बोनस अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान की तरफ से दिया जाता है।

गुजरात के गांवों से निकली कुसुम योजना

गुजरात में सबसे पहले ये काम अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (IWMI) ने खेड़ा जिले के धुंडी गांव में किया था। धुंड़ी में ये व्यवस्था साल 2016 में की गई। जो काफी सफल रही। जिसके बाद एनडीडीबी ने अपने गोद लिए गांव में सहकारी समिति बनाकर इसे लागू कराया। धुंड़ी मॉडल को ही केंद्र ने सराहा और साल 2019 में इसे कुसुम योजना के तहत पूरे देश में लागू किया गया। साल 2020-21 के बजट में सौर्य पंप और सिंचाई के साथ बिजली उत्पादन पर काफी जोर दिया गया है। हालांकि पर्यावरण से जुड़ी कई संस्थाएं कुसुम योजना में जल संरक्षण को प्रमुख घटक बनाए जाने की मांग करते रहे हैं।

मुजकुआ गांव के ग्रिड का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक कार्यक्रम में किया था। मीनेश शाह बताते हैं, किसान उतनी ही देर पंप चलाता है जब उसकी जरुरत है, बाकी समय वो ग्रिड को बिजली देता है, जिसमे उसका ज्यादा फायदा है। तो पानी का दोहन की संतुलित है।"

एनडीडीबी में कॉपरेटिव सर्विसेज में मैनेजर संदीप भारती कहते हैं, पूरे गांव में जो सोलर यूनिट लगाई गई हैं उनका खर्च करीब 2 करोड़ रूपया है। जिसका खर्च एक लाख 1 लाख 20 हजार पर किलोवाटर आया है। इसमें किसानों के हिस्से में करीब 2 लाख 25 हजार रुपए आए थे, ये पैसा भी किसानों को न्यूनतम ब्याज पर उपलब्ध करवा दिया गया था। इस तरह किसान की लागत बहुत कम रही और उसे कमाई का एक बड़ा जरिया मिल गया। धुंडी और मुजुकआं का मॉडल ही बाद में कुसुम बना है।"

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मुजकुआ गांव के किसान मनु भाई कहते हैं, लोग कहते थे कि सोलर लगाने से खेती नहीं हो पाएगी, लेकिन ये सोलर यूनिट ऊंचाई पर है तो इनमें सब्जियां, गेहूं, तंबाकू जैसी कोई भी फसल उगा सकते हैं। दूसरा ये ऐसे बने (डिजाइन) हैं कि उन्हें जुताई के वक्त सीधा किया जा सकता है।

कुसुम योजना के तहत साल 2020-21 के बजट में 15 लाख सोलर पंप लगाए जाने हैं, जिन्हें सीधे ग्रिड से जोड़ा जाएगा। इसके साथ सरकार उन इलाकों पर खासा जोर दे रही है जहां की जमीन उपजाऊ नहीं है।

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