झारखंड कृषि विभाग, जहां बीते 31 साल से नहीं हुई कोई भर्ती

बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (बीएयू) के अलावा राज्य में कुल नौ कॉलेज हैं जहां कृषि से संबंधित पढ़ाई होती है। साल 1989 से कोई वैकेंसी नहीं आई है। इस लिहाज से देखें तो 2019 के सत्र तक कुल 2770 छात्र पढ़कर निकल चुके हैं, लेकिन राज्य में उनके लिए रोजगार के कोई अवसर नहीं हैं।

Anand DuttaAnand Dutta   15 Jun 2020 11:10 AM GMT

झारखंड कृषि विभाग, जहां बीते 31 साल से नहीं हुई कोई भर्ती

रांची: झारखंड की 78 प्रतिशत आबादी कृषि कार्यों पर निर्भर है। राज्य बैंकर्स समिति के अनुसार राज्य में कुल 39 लाख किसान हैं। जाहिर है इतनी बड़ी कृषक आबादी का ध्यान सरकार द्वारा रखा जाना चाहिए। साथ ही इस सिस्टम को चलाने के लिए जरूरत के मुताबिक लोगों की बहाली भी होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है, बीते 31 सालों से कृषि विभाग में एक भी भर्ती नहीं हुई है।

आंकड़ों के मुताबिक झारखंड के कृषि विभाग में इस वक्त कुल 3913 पद खाली हैं। विभाग के लिए पूरे राज्य में कुल 5565 पद स्वीकृत किए गए हैं, जिसमें मात्र 1652 पदों पर ही नियुक्ति हुई है। इसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण पद प्रखंड कृषि पदाधिकारी का माना जाता है। राज्य में प्रखंडों की कुल संख्या कुल 260 है, जिसमें 194 में कृषि पदाधिकारी का पद खाली हैं। इसके अलावा प्रखंड उद्यान पदाधिकारी, सहायक अनुसंधान पदाधिकारी, पौधा संरक्षण निरीक्षक, सांख्यिकी सहायक, अनुमंडल कृषि पदाधिकारी सहित कुछ और पदों पर भी बहाली नहीं हुई है।

बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (बीएयू) के अलावा राज्य में कुल नौ कॉलेज हैं जहां एग्रीकल्चर से संबंधित पढ़ाई होती है। बीएयू के छात्र अनूप कुमार बताते हैं, ''साल 1989 से आज तक हमारे लिए कोई वैकेंसी नहीं आई है। इस लिहाज से देखें तो 2019 के सत्र तक कुल 2770 छात्र पढ़कर निकल चुके हैं। वहीं इन कॉलेजों में कुल 345 छात्र हर साल दाखिला लेते हैं।''

अनूप आगे कहते हैं ''जब बहाली ही नहीं करनी है तो इन विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को खोलने का क्या मतलब है? हजारों कृषि स्नातक छात्र बेरोजगार हैं।''

एक अन्य छात्र इबरार के मुताबिक जो पद खाली हैं, अगर उसको देखें तो किसानों को मिट्टी संबंधी जानकारी, कौन सा बीज इस्तेमाल करना, कीड़ों को हटाने संबंधी जानकारी, सरकारी योजनाओं की जानकारी सही समय पर नहीं मिल पा रही है। अगर ये बहाली होती है, तो इन सब मसलों पर काम किया जा सकता है।''

बेरोजगार छात्र इन दिनों ऑनलाइन आंदोलन कर रहे हैं। लॉकडाउन से ठीक पहले ये छात्र राज्य के कृषि मंत्री बादल पत्रलेख से भी मिलने गए थे। जहां मंत्री ने इन्हें आश्वासन दिया था कि बहुत जल्द कुल 1885 पदों पर बहाली होने जा रही है, लेकिन अब तक इस प्रक्रिया की सुगबुगाहट भी नहीं दिख रही है।

एक बार फिर मंत्री ने दिया आश्वासन

शनिवार 13 जून को कांग्रेसी नेता आदित्य विक्रम जायसवाल के नेतृत्व में इसी मसले पर मिलने गए एक प्रतिनिधिमंडल को मंत्री बादल पत्रलेख ने कहा कि जिस अनियमितता की वजह से बहाली अभी तक नहीं हो पाई है, उसको दूर करने के लिए विभाग के सचिव को तत्काल पत्र लिखा गया है। इसे जल्द दूर किया जाएगा। इसके तुरंत बाद बहाली प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। हालांकि मंत्री ने इसके लिए कोई निश्चित समय नहीं बताया।

बीएयू से एग्रीकल्चर में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही मनीषा के मुताबिक ''सरकारी के साथ प्राइवेट कंपनियों में भी वैकेंसी ना के बराबर है। इसको ऐसे समझिये कि यहां का रिक्रूटमेंट सेल सालों से बंद पड़ा था, कुछ समय पहले दुबारा शुरू किया गया है। इफको किसान कॉल सेंटर में मात्र चार लोगों का प्लेसमेंट हुआ। झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी प्लेसमेंट के लिए आनेवाली थी, लेकिन लॉकडाउन की वजह से वह भी नहीं आई। पढ़ाई करने के बाद भी बहुत सारे छात्र आज तक घर में बैठे हैं।''

छात्रा प्रियांशी कहती हैं, ''साल 2015 में एक बार बहाली के लिए नोटिफिकेशन निकाला भी गया। हम लोग काफी खुश हुए कि चलो कुछ तो हुआ। लेकिन थोड़े ही समय बाद इसे रद्द भी कर दिया गया।''

बहाली नहीं होने से झारखंड की कृषि की स्थिति पर क्या बुरा असर पड़ रहा है। इस सवाल पर किसान नीलीमा तिग्गा कहती हैं, ''छात्र पढ़कर भी क्या करें? किसी भी सरकार ने कभी एग्रीकल्चर को सबसे आगे रखा ही नहीं। जबकि आनेवाला समय साफ दिख रहा है कि कृषि पर निर्भरता ही किसी देश की अर्थव्यवस्था चल सकती है। ऐसे हालात में झारखंड की इस बदली हुई सरकार को कृषि विभाग में बहाली पर खासा ध्यान देना होगा।''

देश में बेरोजगारी दर सबसे अधिक झारखंड में

बीएयू में निदेशक शिक्षा प्रसार रहे आरपी सिंह रतन बताते हैं, ''किसानों को तीन स्तर पर मदद की सख्त जरूरत है। पहला किसानों के फ्रंट पर काम करनेवाले अधिकारी या कर्मचारी न के बराबर हैं, जैसे विलेज लेवल वर्कर (वीएलडबल्यू) झारखंड में सिर्फ 12 से 15 कर्मचारी हैं। एक बार प्रयास किए तो 1800 वीएलडबल्यू की बहाली हुई, लेकिन कृषि सेवा में उसको न देकर ग्रामीण विकास में रख दिया गया। कृषि विभाग से जुड़ी संस्था आत्मा के पास भी कर्मचारी नहीं हैं। कृषि वैज्ञानिकों और नीचे के स्तर के कर्मचारियों के राज्यभर में पद खाली हैं। एग्रीकल्चर कॉलेजों में प्रोफेसर तो उंगली पर गिने जाने लायक बचे हैं, ऐसे में अगर पढ़ाई होगा तो केवल डिग्री दिए जाने लायक, न ही इसके लिए उचित्त लैब है। किसान को रिसर्च का सपोर्ट का मिलना चाहिए। यह स्थिति झारखंड के कृषि के अनुकूल नहीं है।''

झारखंड कृषि बजट 2017-18 के मुताबिक कुल कृषि भूमि के 80 प्रतिशत हिस्सों पर एकफसलीय खेती होती है। उसमें केवल धान ही उपजाया जाता है, बाकि 20 प्रतिशत हिस्सों में सब्जी व अन्य चीजों की खेती होती है। वहीं पूरे राज्य में मात्र 13 प्रतिशत हिस्से सिंचित भूमि यानी सिंचाई की उचित्त सुविधा वाला है। पिछली सरकार ने दावा किया था कि 30 प्रतिशत हिस्सों में सिंचाई की सुविधा पहुंचाई गई है, लेकिन सरकार ने यह भी माना कि उन जगहों पर खेती शुरू नहीं हो पाई है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी की हालिया सर्वे के मुताबिक देश में इस वक्त सबसे अधिक बेरोजगारी झारखंड में है। मई माह में बेरोजगारी दर बढ़कर 59.2 प्रतिशत तक पहुंच गई है। राज्य सरकार मनरेगा और कृषि संबंधित उद्योग के सहारे ही कम करने की कोशिश कर रही है। इस वक्त इन छात्रों और किसानों की जरूरत को समझ सरकार को इस 31 साल के सवाल को खत्म करना चाहिए।

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