लॉकडाउन में फंसे प्रवासी मजदूरों के सामने खाने का संकट, मानवाधिकार संगठनों ने मांगा सबके लिए मुफ्त राशन

बांद्रा के हेमंत जैसे ही हालात मानेसर में रहने वाले सुरेश, नोएडा के हरौला में रहने वाले एहसान, दिल्ली के सदर बाजार मंडी में रहने वाले विकास यादव और सूरत की मशहूर हीरा मंडी के पास रहने वाले आत्माराम की है। ये सभी प्रवासी मजदूर अपना गांव, अपना राज्य छोड़कर इन शहरों की तरफ इसलिए आए थे, ताकि उन्हें कभी खाने की समस्या ना हो, लेकिन लॉकडाउन के इस समय में इनके सामने सबसे बड़ी समस्या खाने को लेकर ही आ रही है।

Daya SagarDaya Sagar   23 April 2020 8:23 AM GMT

लॉकडाउन में फंसे प्रवासी मजदूरों के सामने खाने का संकट, मानवाधिकार संगठनों ने मांगा सबके लिए मुफ्त राशन

"हम अगले 20 दिन क्या, 50 दिन भी यहीं रूक जाएं, लेकिन हमें खाने के लिए राशन-पानी तो मिले," लॉकडाउन बढ़ने के सवाल पर हेमंत पोद्दार कहते हैं। हेमंत (30 वर्ष) बिहार के कटिहार जिले के निवासी हैं और मुंबई के बांद्रा इलाके में रहकर निर्माण मजदूर का काम करते हैं। उनके साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के लगभग 600 मजदूर उनके इलाके में रहते हैं, जिसका नाम खेरवाड़ी नाका है।

"लॉकडाउन के इस समय में हम मजदूरों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत राशन-पानी की आ रही है। जेब की जमा-पूंजी सब खत्म हो रही है। यहां का राशन कार्ड भी नहीं है कि सरकारी राशन मिल पाए। सरकारी कैम्प में कहीं-कहीं बना बनाया खाना मिल रहा है, जो हमारे इलाके से बहुत दूर है। रास्ते में पुलिस वाले बहुत मारते हैं, इसलिए वहां जाना बहुत मुश्किल है। कुल मिलाकर हम लोग आधे पेट ही खाना खा रहे हैं। कोरोना से मरने से पहले हो सकता है कि हम लोग भूखमरी से ही मर जाएं," हेमंत की बातों में क्षोभ और निराशा एक साथ झलकती है।

हेमंत जैसे ही हालात मानेसर में रहने वाले सुरेश, नोएडा के हरौला में रहने वाले एहसान, दिल्ली के सदर बाजार मंडी में रहने वाले विकास यादव और सूरत की मशहूर हीरा मंडी के पास रहने वाले आत्माराम की है। ये सभी प्रवासी मजदूर अपना गांव, अपना राज्य छोड़कर इन शहरों की तरफ इसलिए आए थे, ताकि उन्हें कभी खाने की समस्या ना हो, लेकिन लॉकडाउन के इस समय में इनके सामने सबसे बड़ी समस्या खाने को लेकर ही आ रही है।


केंद्र सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा के बाद सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत देश के लगभग 80 करोड़ गरीब लोगों को हर महीने के नियमित राशन के साथ ही प्रति व्यक्ति 5 किलो अतिरिक्त गेहूं या चावल और एक किलो दाल मुफ्त देने की बात कही थी। केंद्रीय खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग के मंत्री राम विलास पासवान ने कहा था कि इससे देश की दो तिहाई से अधिक जनसंख्या को लॉकडाउन के इस चुनौतीपूर्ण समय में खाद्यान्न सुविधा का लाभ मिलेगा, जो कि नागरिकों के 'भोजन के अधिकार' के अंतर्गत आता है।

लेकिन लॉकडाउन के बाद औद्योगिक शहरों से प्रवासी मजदूरों की जो तस्वीरें निकल कर सामने आ रही हैं, वे कुछ और ही हालत को बयां कर रही हैं। मुफ्त राशन की सुविधा का यह लाभ उन लोगों को नहीं मिल पा रहा है, जिनके पास या तो राशन कार्ड नहीं है या जो अपने काम के सिलसिले में अपने घर से दूर दूसरे शहरों और राज्यों में रहते हैं। ऐसे प्रवासी मजदूरों की संख्या लाखों में है, जिनके पास कोरोना लॉकडाउन के इस समय में खुद को सुरक्षित रखने के लिए कमरा तो है, लेकिन राशन नहीं होने की वजह से वे लोग रात को भूखे या आधे पेट सोने को मजबूर हैं।

मध्य प्रदेश के जबलपुर में फंसे मुजफ्फरपुर, बिहार के प्रवासी मजदूर संदीप राज गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "हम लोग लगभग 60 लोग हैं, जो बिहार के मुजफ्फरपुर और मोतिहारी से ताल्लुक रखते हैं। हमारे पास खाने को कुछ नहीं बचा है। एक कैम्प में खाना तो मिल रहा है, लेकिन वहां बहुत भीड़ होती है। 3 से 4 घंटे लाइन लगाने पर हमें एक समय का खाना मिल पाता है। हमारा सरकार से निवेदन है कि या तो हमारे लिए राशन-पानी की व्यवस्था किया जाए या फिर हमें बिहार वापस भेज दिया जाए। ऐसे घुट-घुट के जीने से अच्छा है कि हम अपने घर-जवार पहुंचे, वहां फिर जो भी हो।


कुछ ऐसी ही बात सूरत से आत्माराम (52 वर्ष) कहते हैं, जो कि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के निवासी हैं। भर्राई हुई आवाज में वह गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "जैसे-जैसे दिन बढ़ते जा रहे हैं, हमारी बेचैनी भी बढ़ती जा रही है। यहां खाने-पीने को कुछ नहीं है। यहां हम परेशान हैं और उधर गांव में बीवी-बच्चे और परिवार वाले परेशान हो रहे हैं। सरकार को चाहिए कि या तो वे हमारे लिए राशन की व्यवस्था करें या फिर जैसे उन्होंने कोटा से बच्चों को उनके गांव तक पहुंचाया, वैसे हमें भी हमारे गांव तक पहुंचाने की व्यवस्था करें। भले ही हमें 14 दिन गांव के बाहर ही रूकना पड़े। कम से कम अपने लोगों के नजदीक तो हम पहुंच जाएंगे।"

प्रवासी मजदूरों के बीच काम करने वाली कई संस्थाओं और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि संकट के इस समय में राशन वितरण को एक साल के लिए गरीबों को मुफ्त कर देना चाहिए। इसमें राशन कार्ड की अनिवार्यता को भी खत्म किया जाना चाहिए ताकि किसी को भूखे पेट ना सोना पड़े।

गौरतलब है कि जैसे-जैसे लॉकडाउन आगे बढ़ा है, प्रवासी मजदूरों का धैर्य भी जवाब देने लगा है और ये लोग लॉकडाउन तोड़कर खाने, राशन और घर पहुंचाने की मांग को लेकर सड़कों पर आने लगे हैं। प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था आजीविका ब्यूरो ने प्रवासी मजदूरों के लिए एक मांग पत्र तैयार किया है, उसमें मुफ्त राशन का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया है।


इस मांग पत्र के मुताबिक, "सरकार को प्रवासी कामगारों के लिए तत्काल मुफ़्त और कम क़ीमत पर राशन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके लिए उनसे किसी तरह के पहचान पत्र या निवास प्रमाणपत्र दिखाने को नहीं कहा जाए। केंद्र और राज्य सरकारों ने जो राहत कि घोषणा की है वह उन्हीं लोगों के लिए है जिनके पास राशन कार्ड है। प्रवासी कामगारों के पास उस शहर में राशन कार्ड नहीं होता जहाँ वे काम करते हैं।"

इस मांग पत्र में यह भी लिखा है कि सरकार को इस तरह के सभी बाधाओं को समाप्त करना चाहिए ताकि प्रवासी मज़दूरों को संकट के इस समय में सभी ज़रूरी सहायता उपलब्ध करायी जा सके। जनसाहस संस्था द्वारा किए गए एक सर्वे में में सामने आया है कि 42.3 प्रतिशत प्रवासी मजदूरों के पास अब एक भी दिन का राशन नहीं बचा है और उनके सामने भुखमरी जैसे हालात हो गए हैं। जबकि 80 प्रतिशत से अधिक प्रवासी मजदूरों के सामने लॉकडाउन बढ़ने के बाद राशन की समस्या होनी तय है।

हाल ही में 'रोजी-रोटी अधिकार अभियान' नामक संस्था ने केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान को पत्र लिखकर मांग की थी कि देश में सबको 'भोजन का अधिकार' है। इसलिए सरकार को बिना किसी कागज के सभी को राशन मुहैया करवाया जाना चाहिए। इस पत्र में यह भी लिखा गया है कि देश की कम से कम 10 करोड़ जरूरतमंद और गरीब लोगों की आबादी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत पंजीकृत नहीं हैं, इसलिए ऐसे लोगों को सरकारी राहत योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

हालांकि कई राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों में जरूरतमंदों को बिना राशन कार्ड के भी राशन देने की बात कर रही हैं। लेकिन या तो ये प्रक्रिया बहुत जटिल है या स्थानीय स्तर पर कोटेदार मनमानी कर सिर्फ कार्ड वालों को ही राशन दे रहे हैं।

उदाहरण के लिए अगर दिल्ली की बात करें तो दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने प्रवासी मजदूरों और जरूरतमंदों के लिए ई-कूपन के जरिये राशन देने की बात कही है, लेकिन कम साक्षर मजदूरों में इंटरनेट से ऐप डाउनलोड कर ई-कूपन प्राप्त करना बहुत मुश्किल हो रहा है। जैसा कि दिल्ली के सदर बाजार मंडी में रिक्शा खींचने वाले विकास यादव बताते हैं। उन्होंने बताया कि सरकार ने व्यवस्था तो की है, लेकिन हमें इसका कोई फायदा नहीं मिल पा रहा।

इसी तरह उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी प्रवासी मजदूरों, शहरों में रहने वाले रिक्शा चालकों और अन्य जरूरतमंदों के लिए बिना कार्ड के मुफ्त राशन की व्यवस्था की है, लेकिन यूपी में कई जगहों पर कोटेदारों के मनमानी करने का मामला सामने आ रहा है। संत कबीर नगर के निवासी जमील खुर्शीद गांव कनेक्शन को बताते हैं, "उन लोगों को ही राशन नहीं मिल पा रहा जिनका नाम पहले राशन लिस्ट में था, लेकिन हाल ही में हुई डिजिटलाइजेशन में नाम कट गया तो फिर जिनका नाम राशन लिस्ट में नहीं है, उनको राशन मिलना तो लगभग असंभव के बराबर है।"

केंद्र सरकार ने भी लगभग दो हफ्ते पहले कहा था कि वह जरूरतमंदों को राशन कार्ड और पहचान पत्र के बिना ही राशन देने पर विचार कर रही है, लेकिन दो हफ्ते बाद भी केंद्र सरकार की तरफ से अभी तक कोई स्पष्ट निर्देश नहीं आए हैं।

फूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में भारत के पास आवश्यकता से 3 गुना अधिक अनाज का भंडारण है। इसके अलावा आपातकाल या संकट के समय मे प्रयोग में आने वाला बफर स्टॉक भी गोदामों में भरा हुआ है। पब्लिक हेल्थ रिसोर्स नेटवर्क से जुड़ी डॉ. वंदना प्रसाद कहती हैं, "केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर जल्द से जल्द राशन संबंधी इस मुद्दे का समाधान करना चाहिए, नहीं तो लोग कोरोना से पहले भूखमरी से मर जाएंगे!"

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लॉकडाउन बढ़ा मतलब प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें भी बढ़ीं


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