लॉकडाउन बढ़ा, अब समुद्र में फंसे एक लाख से अधिक मछुआरों का क्या होगा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को घोषित 21 दिन के लॉकडाउन को बढ़ाकर 40 दिनों का कर दिया। इससे एक लाख से अधिक प्रवासी मछली श्रमिकों की मुश्किलें और बढ़ गई जो अरब सागर में अपनी नावों में फंसे हैं। उन्हें सरकार से अभी तक कोई मदद नहीं मिली है। मछुआरा समुदाय ने इस लॉकडाउन से होने वाले नुकसान से उबरने के लिए एक विशेष आर्थिक पैकेज की मांग की है।

Nidhi JamwalNidhi Jamwal   16 April 2020 1:16 PM GMT

कोरोना वायरस के कारण देश भर में हुआ लॉकडाउन अब 14 अप्रैल से बढ़कर 3 मई तक हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अप्रैल को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में लॉकडाउन को बढ़ाए जाने की घोषणा की।

"20 अप्रैल तक सभी जिलों, इलाकों, राज्यों पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी कि वे लॉकडाउन को कितनी सख्ती से लागू कर रहे हैं। जो राज्य हॉटस्पॉट्स को बढ़ने नहीं देंगे, उन्हें कुछ विशेष शर्तों के साथ कुछ महत्वपूर्ण गतिविधियों को फिर से शुरू करने की अनुमति दी जा सकती है, " पीएम मोदी ने कहा।

उन्होंने आगे कहा कि जो क्षेत्र या जिले कोरोना से नहीं प्रभावित हैं, उन्हें 20 अप्रैल से लॉकडाउन में कुछ शर्तों के साथ छूट दी जाएगी। लेकिन अगर इन जगहों पर कोरोना को कोई मामला मिलता या नए हॉटस्पॉट विकसित होते हैं, तो लॉकडाउन की छूटों को तत्काल वापस ले लिया जाएगा।

इस लॉकडाउन के विस्तार ने महाराष्ट्र मछिमार कृति समिति की किरण कोली की चिंताओं को बढ़ा दिया है, जो एक लाख से अधिक प्रवासी मछली श्रमिकों को खिलाने और सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। ये मछुआरे और मछली श्रमिक लॉकडाउन के कारण महाराष्ट्र के तट पर ही अपनी नावों पर फंसे हुए हैं।

लॉकडाउन के कारण महाराष्ट्र तट पर एक लाख से भी अधिक प्रवासी मछली श्रमिक अपनी नावों में फंसे हुए हैं। फोटो साभार: किरण कोली

2 अप्रैल को गांव कनेक्शन ने ऐसे एक लाख से अधिक मछली श्रमिकों के समुद्र में फंसे होने की खबर को रिपोर्ट किया था। ये प्रवासी मछली श्रमिक ज्यादातर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के हैं। परिवहन के सभी साधनों के बंद होने के कारण इन श्रमिकों का अपने गृह राज्यों में लौटना संभव नहीं है और एक लाख से अधिक लोगों को महाराष्ट्र के तटों पर भी जगह नहीं दी जा सकती। इसलिए ये मछली श्रमिक पिछले तीन हफ्तों से अरब सागर में अपनी नावों में रह रहे हैं।

"विभिन्न अधिकारियों से संपर्क करने और जिला कलेक्टरों को पत्र लिखने के बावजूद, इन फंसे हुए मछुआरों के लिए सरकार से कोई मदद नहीं मिली है। पिछले तीन हफ्तों से हम उन्हें अरब सागर में अपनी नावों से सूखा राशन और पीने का पानी मुहैया करा रहे हैं," कोली ने बताया।

"हमने सरकार से इन मछली श्रमिकों के लिए परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने के लिए भी कहा है ताकि ये प्रवासी श्रमिक नावों से उतर कर अपने गृह राज्यों को लौट सकें। लेकिन अभी तक हमें कोई जवाब नहीं मिला है," कोली आगे कहते हैं।

हालांकि मछुआरों और मछली श्रमिकों की दिक्कतें यहां ही नहीं खत्म होती हैं। जहां इस लॉकडाउन से मछुआरों की आजीविका को भारी नुकसान हो रहा है, वहीं राज्य सरकार को भी इन मछली श्रमिको को 187 करोड़ रुपये की बकाया डीजल सब्सिडी भी जारी करना है, जो कि पिछले चार या पांच साल से लंबित है।

इस नुकसान के मद्देनजर महाराष्ट्र माछीमार कृति समिति ने अगले तीन महीनों के लिए मछुआरा परिवारों के लिए मुफ्त राशन की मांग की है। इसके अलावा मछुआरों और मछली श्रमिकों को सरकारी लोन देने की भी मांग समिति द्वारा की है।

"जब अगले साल अगस्त में मछली पकड़ने का मौसम शुरू होगा तब सरकार को प्रत्येक मछुआरे को कम से कम 5 लाख रुपये का नकद लोन प्रदान करना चाहिए। यह लोन ब्याज मुक्त होना चाहिए, "कोली ने कहा।

"मछुआरों ने अपनी आजीविका खो दी है और उनके पास अपनी नावों के मरम्मत कराने तक के पैसे नहीं हैं, जिससे वे अगले सीजन के लिए तैयार हो सके। अगर सरकार इस लोन की घोषणा नहीं करती है, तो मछुआरे गरीबी और भूख से मर जाएंगे," उन्होंने आगे कहा।

लॉकडाउन की वजह से कई मछुआरे अपनी नावों में फंसे हुए हैं। उनका आरोप है कि सरकार से उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही है।

दिलचस्प बात यह है लॉकडाउन लागू होने के दो हफ्ते बाद 10 अप्रैल को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक निर्देश जारी किया था, जिसमें मछली पकड़ने, जलीय कृषि उद्योग के संचालन में छूट दी गई थी। इसमें फीडिंग, रखरखाव, पैकेजिंग, कोल्ड चेन, बिक्री, विपणन, हैचरी, फीड प्लांट, झींगा और मछली उत्पादों की आवाजाही संबंधी गतिविधियां शामिल हैं।

इस आदेश में यह भी कहा गया था कि उपरोक्त सभी गतिविधियों में सफाई और सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान रखा जाएगा। लेकिन मछली पकड़ने वाले समुदाय को इन आदेशों के बारे में अधिक जानकारी नहीं है।

हर साल मानसून के आसपास 61 दिनों के लिए समुद्र में मछली पकड़ने पर प्रतिबंध होता है। मार्च, 2017 में केंद्र सरकार ने पूर्वी और पश्चिमी तट पर भारतीय अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की गतिविधियों पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे, जो आज भी लागू होता है।

2017 की इस अधिसूचना में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप सहित देश के दोनों तटों पर मत्स्य संसाधनों के संरक्षण और समुद्री सुरक्षा के लिए 61 दिनों का प्रतिबंध लगाया जाता है। इस अवधि के दौरान परम्परागत गैर-मोटर चालित नावों को छोड़कर मछली पकड़ने की सभी गतिविधियों पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया जाता है।

"देश के पूर्वी तट पर यह प्रतिबंध 15 अप्रैल से 14 जून तक लागू होता है, जबकि पश्चिमी तट पर यह 1 जून से शुरू होकर 31 जुलाई को समाप्त होता है," टी. पीटर बताते हैं, जो नेशनल फिशवर्कर्स फोरम के महासचिव हैं।

10 अप्रैल के निर्देशों के अनुसार पश्चिमी तट पर मछुआरों के पास मछली पकड़ने की गतिविधियों को फिर से शुरू करने के लिए मई अंत तक का समय है, लेकिन देश के पूर्वी तट पर मछली पकड़ने पर प्रतिबंध पहले ही लागू हो चुका है। इस तरह लॉकडाउन की वजह से पूर्वी तट पर मछली पकड़ने वाले मछुआरों की आजीविका को एक तगड़ा झटका लगा है और अब तक सरकार की तरफ से इन मछुआरों के लिए कोई वित्तीय मदद की घोषणा नहीं हुई है।

भारत के पूर्वी तट पर मछली पकड़ने पर वार्षिक प्रतिबंध 15 अप्रैल से 14 जून तक लागू होता है, जबकि पश्चिमी तट पर यह प्रतिबंध 1 जून से 31 जुलाई तक का है। फोटो साभार- निधि जम्वाल

"पश्चिमी तट के विपरीत हमारे यहां मछली पकड़ने पर प्रतिबंध की अवधि शुरू हो चुकी है। गृह मंत्रालय के 10 अप्रैल के आदेश में मछली पकड़ने की गतिविधियों को लॉकडाउन से छूट देने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है, "उड़ीसा पारंपरिक मछली कामगार संघ के के. अल्लाया ने गांव कनेक्शन को बताया।

"कोरोनो वायरस की वजह से पहले ही हमारे एक महीने की आजीविका पर ग्रहण लग चुका है और अगले दो महीनों में प्रतिबंध की अवधि के कारण मछुआरे समुद्र में नहीं जा सकते। हमारा गुजारा कैसे होगा?" वह पूछते हैं। "हम सरकार से इस साल प्रतिबंध की अवधि में छूट देने की मांग कर रहे हैं। बड़े जालदार जहाजों को छोड़कर सरकार को हमें यह अनुमति जरूर देना चाहिए, " वह आगे कहते हैं।

ओडिशा में 8,500 सक्रिय मछुआरे हैं। राज्य में 19,000 मछली पकड़ने वाली मशीनीकृत बड़ी नावें हैं जबकि लगभग 7,000 पारंपरिक छोटी मछली पकड़ने वाली नावें हैं, जिनमें से 3,500 गैर-मशीनीकृत यानी बिना इंजन वाली नावें हैं। अल्लाया ने फिर से दोहराया कि इस साल सरकार को सभी पारंपरिक मछली पकड़ने वाले मशीनीकृत और गैर-मशीनीकृत नावों को प्रतिबंध से छूट देनी चाहिए।

दिलचस्प बात यह है कि केरल में ऐसा पहले से ही हो रहा है। "इस प्रतिबंध की अवधि में भी केरल में जालदार बड़ी जहाजों के अलावा मछली पकड़ने वाली दूसरी नावों पर प्रतिबंध हटा दिया गया है," तिरुवनंतपुरम के पीटर बताते हैं।

"हम मछुआरे समुद्री संपदा और पर्यावरण की रक्षा करने में विश्वास करते हैं। लेकिन दो महीने तक मछली पकड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। जालदार बड़ी जहाजें (ट्रॉलर) ही मछलियों, समुद्री संपदा और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं, उन्हें नियंत्रित करने की जरूरत है, " पीटर कहते हैं।

लॉकडाउन की वजह से तमिलनाडु के मछुआरे भी 15 जून के बजाय 15 मई से मछली पकड़ने की गतिविधियों को फिर से शुरू करने की मांग कर रहे हैं।

"इस साल सरकार को सभी पारंपरिक मछली पकड़ने वाली नौकाओं को दो महीने के प्रतिबंध से मुक्त करना चाहिए,"- के अल्लाया, उड़ीसा पारंपरिक मछली श्रमिक संघ। फोटो साभार: निधि जम्वाल

24 मार्च को पीएम मोदी के 21-दिवसीय देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा करने के तुरंत बाद, नेशनल फिशरवर्कर्स फोरम ने केंद्रीय मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के राज्य मंत्री प्रताप चंद्र सारंगी को पत्र लिखकर मछुआरों को समर्थन देने के लिए विशेष पैकेज की मांग की थी।

फोरम ने तीन महीने के लिए प्रति मछुआरे परिवार को 10,000 रुपये की देने की मांग की है। इसके अलावा फोरम ने मछली श्रमिकों के लिए मुफ्त एलपीजी सिलेंडर और मुफ्त राशन के भी पर्याप्त आपूर्ति की मांग की है।

"मछुआरा समुदाय मछली पकड़ने के लिए समुद्र में जाने वाले मछुआरों की तुलना में कहीं अधिक है। मत्स्य पालन और बिक्री में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल होती हैं, "अल्लाया कहते हैं, जो कि नेशनल फिशरवर्कर्स फोरम के उपाध्यक्ष भी हैं। उन्होंने कहा, "ऐसे महिला मछुआरों के लिए हमने तीन महीने की अवधि के लिए प्रति माह तीन हजार रुपये की मांग की है।"

देश में कुल 1 करोड़ 60 लाख मछुआरों और मछली श्रमिकों में से लगभग आधी संख्या (5,570,217) महिलाओं की है।

देश के कुल 1 करोड़ 60 लाख मछुआरों और मछली श्रमिकों में से लगभग आधी संख्या (5,570,217) महिलाओं की है। फोटो साभार: निधि जम्वाल

इस बीच तटीय राज्य आंध्र प्रदेश के भी मछली पकड़ने वाले समुदाय ने तीन महीने के लिए प्रति मछुआरा परिवार को 15,000 रुपये के मासिक मुआवजे की मांग की है। वर्तमान में, मछली पकड़ने की प्रतिबंध की अवधि के दौरान प्रति परिवार 5,000 रुपये का मुआवजा प्रदान किया जाता है।

"मत्स्य पालन एक सेमी-स्किल्ड श्रम है और देश में इस तरह का श्रम करने वालों के लिए कानूनी मजदूरी 371 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति दिन है। इस तरह प्रत्येक मछुआरे को यह दैनिक वेतन मिलना चाहिए," आंध्र प्रदेश के डेमोक्रेटिक ट्रेडिशनल फिशर्स एंड फिश वर्कर्स फोरम के देबासीस पॉल गांव कनेक्शन को बताते हैं।

"हर मछुआरा परिवार में मछली पकड़ने जाने वाले पुरुषों के अलावा महिलाएं भी शामिल होती हैं, जो मछली पकड़ने के साथ-साथ इसकी बिक्री जैसी गतिविधियों में शामिल होती हैं। इस तरह प्रत्येक मछुआरे को 371 रुपये प्रति दिन के हिसाब से कम से कम आधा वेतन दिया जाना चाहिए। यह सब जोड़ने पर प्रति मछुआरे परिवार को प्रति माह 15,000 रुपये का मुआवजा होता है और यह तीन महीने के लिए प्रदान किया जाना चाहिए," उन्होंने कहा।

केंद्र सरकार ने मछुआरा समुदाय के लिए अभी तक कोई विशेष वित्तीय मदद नहीं प्रदान किया है। "पारंपरिक मछुआरे दिहाड़ी मजदूर की तरह होते हैं। वे मछली पकड़ने और अपने जीविकोपार्जन के लिए समुद्र में जाते हैं। आजीविका के बिना हम अपने परिवारों को कैसे बनाएं और खिलाएंगे? " पॉल प्रश्न पूछते हैं।

स्पष्ट है कि स्वास्थ्य संकट के इस समय में मछुआरों के आजीविका की भरपाई के लिए सरकार को अभी काफी कुछ करने की जरूरत है।

अनुवाद- दया सागर

इस रिपोर्ट का पहला भाग यहां पढ़ें- लॉकडाउन के बाद समुद्र में फंसे हैं एक लाख मछुआरे और मछली मजदूर


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