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मिथिला पेंटिंग के लिए पद्मश्री पाने वाली दुलारी देवी की कहानी

Umesh Kumar RayUmesh Kumar Ray   28 Jan 2021 5:05 PM GMT

मिथिला पेंटिंग के लिए पद्मश्री पाने वाली दुलारी देवी की कहानीदुलारी देवी अपने परिवार के सदस्यों के साथ (सभी फोटोज- अविनाश कर्ण)

मधुबनी (बिहार): मधुबनी जिले के रांटी गांव की रहने वाली 55 वर्षीया दुलारी देवी के पास सोमवार की सुबह दिल्ली से एक फोन आया। फ़ोन पर जब उन्हें बताया गया कि उन्हें पद्मश्री पुरस्कार देने का फैसला लिया गया है, तो दुलारी देवी को एकबारगी तो यकीन ही नहीं हुआ।

"हम तो कभी सोचे नहीं थे कि पद्मश्री पुरस्कार मिल जायेगा। हम बस पेंटिंग करते थे और उसी में खुश थे," दुलारी देवी ने गांव कनेक्शन को बताया।

गृह मंत्रालय ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्मश्री पुरस्कार के लिए जिन 102 लोगों के नामों की घोषणा की है, उनमें दुलारी देवी भी एक हैं। दुलारी देवी के अलावा बिहार की मृदुला सिन्हा (दिवंगत), डॉ दिलीप कुमार सिंह और रामचंद्र मांझी को भी पद्मश्री पुरस्कार मिला है। रामचंद्र मांझी भोजपुरी के लोक कलाकार हैं। वह भिखारी ठाकुर के साथ भी काम कर चुके हैं। मृदुला सिन्हा शिक्षा और साहित्य से जुड़ी हुई थीं और डॉ दिलीप कुमार सिन्हा को मेडिसिन के क्षेत्र में ये पुरस्कार मिला है।

दुलारी देवी मल्लाह बिरादरी से हैं, जो अतिपिछड़ा समुदाय में आती है। उनके खानदान में वह पहली महिला हैं, जिन्होंने मिथिला पेंटिंग बनाना सीखा। उनसे पहले उनके परिवार में किसी का भी मिथिला पेंटिंग से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था।

रांटी गांव में मिथिला पेंटिंग्स के लिए पद्मश्री पुरस्कार पाने वाली दुलारी देवी तीसरी महिला हैं। उनसे पहले इसी गांव की गोदावती दत्ता और महासुंदरी देवी को ये पुरस्कार मिल चुका है। महासुंदरी देवी का निधन हो चुका है। गोदावरी दत्ता अभी जीवित हैं। रांटी के पड़ोस के गांव जितवारपुर में भी मिथिला पेंटिंग करने वाले तीन कलाकारों को पद्मश्री पुरस्कार मिल चुका है।

दुलारी देवी के पद्मश्री बनने की कहानी संघर्ष के कई पड़ावों से होकर गुज़री है, जो किसी अकल्पनीय कहानी जैसी लगती है।


12 साल की उम्र में विवाह और फिर विच्छेद

दुलारी देवी की जिंदगी की शुरुआत भी पिछड़े तबके से आने वाली किसी आम लड़की की तरह ही हुई। घर की खराब माली हालत और परिवार में शिक्षा को लेकर जागरूकता कमी के चलते वह स्कूल न जा सकीं। शादी कर ससुराल गईं, तो वहां भी मुश्किल से 2-3 साल ही रह पाईं और वापस मायके लौट आईं। इसके बाद वह दोबारा कभी ससुराल नहीं गईं। वह कहती हैं, "पति से नहीं बनी और सास भी रखने को तैयार नहीं हुई। मैं वहां 2 साल ही रह पाई और मजबूर होकर मायके लौट आई और यहां मां के साथ ही मज़दूरी करने लगी।"

तब दुलारी देवी की मां और परिवार के अन्य लोग फूस की झोपड़ी में रहते थे। उनकी मां खेतों में मजदूरी करने जाती, तो दुलारी देवी भी साथ जाती थी। वह भी खेतों में काम करतीं। कुछ समय बाद उन्होंने गांव के ही एक परिवार में बर्तन धोने का काम शुरू कर दिया। इस परिवार में मधुबनी पेंटिंग की एक लम्बी परम्परा थी और महिलाएं पेंटिंग करती थीं। दुलारी देवी उन्हें पेंटिंग करते हुए देखतीं, तो उनकी भी इच्छा होती कि वे भी पेंटिंग करें।

इस परिवार में महासुंदरी देवी और कर्पूरी देवी थीं, जो मधुबनी पेंटिंग के क्षेत्र में काफी नाम कमा चुकी थीं।

ज़मीन पर लकड़ी से बनाती थीं पेंटिंग

दुलारी देवी को मिथिला पेंटिंग करने की शौक तो था, लेकिन उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे रंग, कागज़ और कपड़े ख़रीद पातीं। उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया, "मैं घर आती थी, तो आंगन को मिट्टी से लीप देती थी और लकड़ी से ज़मीन पर ही पेंटिंग बनाती थी। ये देखकर मेरी मां मुझे डांटती और कहती कि घर में ज़मीन पर लकीर खींचने से लोग भिखमंगे हो जाते हैं।"

कर्पूरी देवी और महासुंदरी देवी के यहां बर्तन धोने व झाड़ू-पोंछा करने के दौरान ही दोनों ने दुलारी देवी को पेंटिंग सिखाना शुरू किया। वह कहती हैं, "साल 1984 में महासुंदरी देवी के यहां मिथिला पेंटिंग की एक महीने की ट्रेनिंग हुई थी। इस ट्रेनिंग में मैंने भी हिस्सा लिया। मैं कर्पूरी देवी और महासुंदर देवी को पेंटिंग बनाते हुए देखती थी और उन्हें देख-देखकर ही धीरे-धीरे मैंने पेंटिंग बनाना शुरू किया।"

उन्होंने बताया, "जब वो लोग पेंटिंग करती थीं, तो मुझे कपड़े काटने का या अन्य छोटे काम देती थीं। इसका अलग से कुछ पैसा मुझे मिल जाता था।"

कर्पूरी देवी और महासुंदरी देवी ने भी दुलारी देवी की मदद की और पेंटिंग की बारीकियां बताईं। उन्होंने ही दुलारी देवी को ये भी कहा कि हर आदमी को अपने तरीके से पेंटिंग बनानी चाहिए, किसी की नकल नहीं करनी चाहिए। इसी सीख ने उन्हें आगे बढ़ने में मदद की।

इसी बीच प्रख्यात पेंटर गौरी मिश्रा ने महिलाओं को मिथिला पेंटिंग सिखाने और उनके काम को प्रमोट करने के लिए साल 1983 में एक संस्था का गठन किया था। कर्पूरी देवी ने उनका नाम वहां लिखवा दिया। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए वे कहती हैं, "मुझे वहां एक चमकदार कपड़ा दिया गया था पेंटिंग करने के लिए। मैंने कपड़ा देखा, तो वो इतना चमक रहा था कि मैं परेशान हो गई और पेंटिंग करने से इनकार कर दिया। चार दिन बाद मैं दोबारा गई, तो मुझे सूती का कपड़ा दिया गया। उस पर मैंने पेंटिंग बनाई, तो उन्हें पसंद आई। इसके बाद मुझे साड़ी दी गई पेंटिंग बनाने के लिए। उस साड़ी पर मैंने दो महीने तक पेंटिंग बनाई।"

इस तरह उन्होंने मिथिला पेंटिंग में विशेषज्ञता हासिल कर ली। शुरूआती दिनों में उनकी पेंटिंग पांच रुपए में भी बिकी थी। "कर्पूरी देवी जब जापान जाती थी, जो छोटे कागज़ पर पेंटिंग बनवा कर ले जाती थी। हर पेंटिंग के पांच रुपए मिलते थे। कागज़ बड़ा होता, तो 40 रुपए दिये जाते," वह बताती हैं।

गौरी मिश्रा की संस्था से वह 16 साल तक जुड़ी रहीं। वे मधुबनी के मिथिला कला संस्थान में बच्चों को पेंटिंग करना भी सिखाती थीं। पेंटिंग के क्षेत्र में बेहतर काम के लिए उन्हें अब तक कई पुरस्कार मिल चुके हैं। इनमें मिथिला अस्मिता सम्मान, राज्य पुरस्कार शामिल हैं।


"कर्पूरी देवी जिंदा रहतीं, तो मुझसे ज्यादा खुश होतीं"

मिथिला पेंटिंग की बदौलत ही दुलारी देवी ने अब पक्का घर बना लिया है और अपने भाई के लिए दुकान खोलने में आर्थिक मदद भी दी। उनसे प्रेरणा लेकर उनके घर में मिथिला पेंटरों की दूसरी पीढ़ी तैयार हो रही है।

सोमवार की सुबह जब दुलारी देवी के पास दिल्ली से फोन आया और फोन करने वाले ने पद्मश्री पुरस्कार देने की बात कही, तो उन्हें सहसा कर्पूरी देवी की याद आ गई। कर्पूरी देवी का निधन दो साल पहले ही हुआ है।

कर्पूरी देवी मिथिला पेंटिंग बनाने वाले उन कलाकारों में एक थीं, जिन्होंने इस कला को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाने में अहम भूमिका निभाई। जब जापान में मिथिला म्यूजियम खोला जा रहा था, तो उन्हें ही इस पर काम करने के लिए आमंत्रित किया गया था।

दुलारी देवी भावुक होकर कहती हैं, "मुझे ये अवार्ड मिलने से सब खुश हैं। मैंने एक संस्थान में जिन बच्चों को पेंटिंग सिखाई थी, वे सुबह से ही फोन कर बधाई दे रहे हैं। घर के लोग भी बहुत खुश हैं। आज कर्पूरी देवी जिंदा होतीं, तो मुझसे ज्यादा वो खुश होतीं। उन्होंने मुझे बेटी से बढ़कर माना और पेंटिंग सिखाई।"

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