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प्रदूषण से पक्षी भी परेशान, प्रजनन क्षमता हो रही प्रभावित

Diti BajpaiDiti Bajpai   11 Dec 2019 10:53 AM GMT

प्रदूषण से पक्षी भी परेशान, प्रजनन क्षमता हो रही प्रभावित

"उस समय को याद कीजिए जब एक तार में लाइन से चिड़ियां बैठती थीं, घरों में पक्षियों के घोसलें दिखते थे, जब पक्षियों का झुंड एक साथ उड़ता था, चील के उड़ने पर बरसात का अंदाजा लगाया जाता था। अब यह सब न के बराबर है और इन सबके खत्म होने का कारण है प्रदूषण, चाहे वो वायु हो, जल हो या फिर ध्वनि।", पक्षी विशेषज्ञ और भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) में पूर्व संयुक्त निदेशक डॉ रिशेंद्र वर्मा अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताते हैं।

डॉ रिशेंद्र पिछले कई वर्षों से लगातार घट रही पक्षियों की संख्या पर शोध कर रहे हैं। "जैसे इंसानों को प्रदूषण के कारण सांस लेने में दिक्कत होती है उससे कहीं ज्यादा पक्षियों को सांस लेने में दिक्कत होती है क्योंकि पक्षियों की श्वसन प्रक्रिया इंसानों की अपेक्षा कई गुना ज्यादा होती है। प्रदूषण के कण उनके अंदर पहुंचते हैं जो भविष्य में उनकी मौत का कारण बनते हैं।", डॉ. रिशेंद्र वर्मा बताते हैं।

वह आगे कहते हैं, "दिल्ली का इंडिया गेट एक बड़ा उदाहरण है। वहां एक समय में कबूतरों की संख्या काफी थी जो धीरे-धीरे कम हो रही है। ऐसे गौरैयों की संख्या में भी कमी आई है।"

नॉर्थ अमेरिका ब्रीडिंग बर्ड सर्वे के मुताबिक पिछले 50 वर्षों में गौरैयों की संख्या 82 प्रतिशत तक कम हो चुकी है। शहरों में बढ़ता हुआ प्रदूषण गौरैयों के जीवन के लिए सबसे बड़ा संकट है।

विश्व के सभी देशों में पर्यावरण प्रदूषण एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। पृथ्वी पर संतुलन बनाने के लिए जीव-जंतु, पेड़-पौधें, जल और इंसानों आदि का एक संतुलित संख्या में होना बेहद जरूरी है। इन सभी के संतुलन से ही पृथ्वी पर जीवनचक्र बना रहता है लेकिन बढ़ते प्रदूषण से हम जो सांस लेते हैं, खाना खाते हैं, पानी पीते हैं, उन सभी में किसी न किसी प्रकार से प्रदूषण के कण हमारे अंदर तो आते ही हैं। इसके साथ ही पशु-पक्षियों का भी अस्तित्व संकट में है।


डॉ. रिशेद्र अपने अनुभवों के बारे में गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "पेस्टीसाइड के अंधाधुंध इस्तेमाल से कीड़े-मकौड़े खत्म हो रहे हैं जो कि पक्षियों का पारम्परिक आहार हैं। पक्षियों को आहार न मिलने पर वह विस्थापन करते हैं, आहार की कमी उनकी मौत की वजह बनती है।" कई बार ये पक्षी जहां विस्थापित होकर जाते हैं वहां भी कमोबेश वहीं हालात होते हैं, लगातार की ये प्रक्रिया उनकी संख्या घटने का कारक बनती है।

सर्दियां शुरू होने से पहले हजारों किलोमीटर का सफर तय करके भारत में प्रवासी पक्षी अपना डेरा जमाते हैं लेकिन जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और सर्दियों में तापमान ज्यादा न गिरने के चलते इन प्रवासी पक्षियों की संख्या में आई कमी बेहद चिंताजनक है।

आगरा के राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी में वन संरक्षण अधिकारी आनंद कुमार बताते हैं, "नवंबर में प्रवासी पक्षियों का आना शुरू हो जाता है लेकिन सर्दी देर से शुरू होने के कारण इनकी संख्या अब धीरे-धीरे बढ़ रही है।"

द यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में नगर निकाय, खेती और औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाले अपशिष्ट से सबसे ज्यादा जल प्रदूषण होता है। खेती में इस्तेमाल किए जाने वाले कीटनाशक (पेस्टीसाइड), शहरों से निकलने वाला प्लास्टिक कूड़ा और औद्योगिक क्षेत्र का कचरा नदियों, झीलों और तालाबों में जाता है, जिससे पक्षियों को बीमारियां होती है साथ ही उनकी मौत भी हो जाती है। इससे धीरे-धीरे पक्षियों की प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जल प्रदूषण के कारण पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे मछलियां मर जाती हैं। पक्षियों का आहार मछलियां हैं जब वो उनको पानी में नहीं मिलती हैं तो उनको भोजन के लिए अन्य क्षेत्रों में जाना पड़ता है, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है।

राजस्थान के जोधपुर में रहने वाले प्रवासी पक्षी विशेषज्ञ शरद पुरोहित बताते हैं, "झीलों, तालाबों और सरोवर का संतुलन बनाने के लिए प्रवासी पक्षियों का आना बेहद जरुरी है। अकेले जोधपुर में 13 वेटलैंड (नमी वाली भूमि) हैं जहां पर प्रवासी पक्षी आते हैं। लेकिन अब हर साल इनकी संख्या घट रही है, जिसके दो प्रमुख कारण है। पहला प्रदूषण के कारण उनका खत्म हो रहा भोजन और दूसरा जलवायु परिवर्तन।"


वह आगे कहते हैं, "घरों से निकला प्लास्टिक कचरा पशुओं के पेट में जाता है जब वो मरते हैं तो शिकारी पक्षी के जरिए उनके पेट में जाता है। ऐसा ही कुछ सांभर झील में हुआ, जिससे चपेट में हज़ारों पक्षी आए। भारी वर्षा के कारण शहरों, खेतों और औद्योगिक क्षेत्रों का पानी कहीं न कहीं वेट लैंड में पहुंचता है, जिससे प्राकृतिक वनस्पतियां खत्म हो जाती है, मछलियां मरती है और कीड़े-मकौड़े भी मरते है। यहीं सब पक्षियों का आहार है जब उनको नहीं मिलेगा तो वो दूसरी जगह विस्थापन करेंगे।"

पक्षियों को जल और वायु प्रदूषण से तो खतरा है ही इसके साथ ध्वनि प्रदूषण से उनकी प्रजनन क्षमता पर असर पड़ रहा है। जर्मनी के मैक्स प्लैँक इंस्टीट्यूट फॉर ऑर्निथोलॉजी के शोधार्थियों ने जेब्रा फिंच नाम के पक्षी पर अध्ययन किया है। इस अध्ययन के मुताबिक पक्षियों के प्रजनन की शक्ति घट रही है और उनके व्यवहार में भी परिवर्तन देखा गया है। अध्ययन में दावा किया गया है कि शोर की वजह से पक्षियों के गाने-चहचहाने पर भी फर्क पड़ता है। कंजर्वेशन फिजियोलॉजी नाम की पत्रिका में यह अध्ययन प्रकाशित भी किया गया है।

पक्षियों में ध्वनि प्रदूषण के असर के बारे में पक्षी विशेषज्ञ डॉ रिशेंद्र वर्मा बताते हैं, "शोर के कारण वो आपस में कम्युनिकेट नहीं कर पाती है जिससे उनकी प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है। शांत वातावरण में प्रजनन करने वाले पक्षियों में ध्वनि प्रदूषण का असर पड़ता है। शोर की वजह से उनके हार्मोन में काफी उतार-चढ़ाव होता है।"

प्रदूषण से जहां एक ओर पक्षियों की मृत्युदर में गिरावट आ रही है वहीं दूसरी ओर बढ़ते प्रदूषण से सर्दियों में आने वाले साइबेरियन प्रवासी पक्षियों की संख्या में लगातार हो रही है लेकिन पक्षी-प्रेमी अमित मिश्रा इनकी गिरावट का अलग कारण बताते हैं। वह कहते हैं, "पक्षियों की संख्या घटने का मुख्य कारण प्रदूषण नहीं है उसके कई कारण है। जिस माहौल में हमारे यहां पशु-पक्षी या जंगली जानवर रहते हैं वो उनको नहीं मिल पा रहा है, जिससे उनकी जनसंख्या कम हो रही है।"

वह आगे कहते हैं, "कौवा हमारी गंदगी साफ करता है, उल्लू चूहे की संख्या कम करता है, चिडियां कीड़े मकौड़े की संख्या कम करती हैं अगर यह नहीं रहेंगी तो हमारे यहां इन सबकी संख्या बढ़ेगी और हम पेस्टीसाइड का इस्तेमाल करेंगे जो हमारे लिए ही हानिकारक है।"

पशु-पक्षी प्रेमी और इस विषय पर शोध कर रहे लोग प्रदूषण को इनके लिए धीमा जहर कहते हैं। धीमा जहर प्रदूषण एक प्रकार का धीमा जहर है, जो हवा, पानी, धूल आदि के माध्यम से न केवल मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर उसे रुग्ण बना देता है, प्रदूषण के चलते प्रकृति के चक्र में अहम कई वनस्पतियां गल रही हैं। तो इस धीमे जहर के चलते विश्व में पशु-पक्षियों की प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर है।

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