नर्मदा में 11000 लीटर दूध चढ़ाए जाने के मामले पर NGT सख्त, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से मांगा जवाब, कही ये बात

Gaon Connection | May 19, 2026, 14:38 IST
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सीहोर के धार्मिक समारोह में नर्मदा नदी में अर्पित किए गए 11 हजार लीटर दूध और 210 साड़ियों ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण का ध्यान खींचा है। एनजीटी ने केंद्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जानकारी मांगी है कि क्या यह पर्यावरण की अनदेखी की जा रही है। याचिकाकर्ता जलीय जीवों पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंतित हैं।
<div style="box-sizing: border-box; display: inline-block; font-size: 14px; font-weight: 500; line-height: normal; margin-right: 4px; text-align: left; font-family: Noto Sans Devanagari">नर्मदा में 11 हजार लीटर दूध बहाया गया था</div><br>
नर्मदा में 11 हजार लीटर दूध बहाया गया था
मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में धार्मिक अनुष्ठान के दौरान नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध और 210 साड़ियां अर्पित किए जाने के मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी ने केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जवाब मांगा है। एनजीटी ने पूछा है कि क्या इस तरह के धार्मिक अनुष्ठान मौजूदा पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करते हैं या फिर इन्हें रोकने के लिए नए दिशा-निर्देशों की जरूरत है।

21 दिन के धार्मिक आयोजन के बाद हुआ अनुष्ठान

मामला सीहोर जिले के भेरूंदा क्षेत्र के सतदेव गांव का है। यहां 8 अप्रैल को 21 दिन तक चले धार्मिक आयोजन के समापन पर नर्मदा नदी में करीब 11 हजार लीटर दूध चढ़ाया गया था। इसके अलावा 210 साड़ियां भी नदी को अर्पित की गई थीं। इस घटना के बाद पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता जताई थी।

एनजीटी की भोपाल पीठ में हुई सुनवाई

सोमवार को एनजीटी की केंद्रीय क्षेत्र पीठ, भोपाल में इस मामले की सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए। ट्रिब्यूनल ने कहा कि यह जांच की जाए कि इस तरह की धार्मिक गतिविधियां मौजूदा पर्यावरण नियमों के दायरे में आती हैं या नहीं।

नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर असर की आशंका

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि बड़ी मात्रा में दूध और कपड़े नदी में डालने से:

  • जलीय जीवों पर असर पड़ सकता है
  • सिंचाई स्रोत प्रभावित हो सकते हैं
  • पीने के पानी की गुणवत्ता खराब हो सकती है
याचिका में यह भी कहा गया कि यह जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1974 के प्रावधानों का उल्लंघन हो सकता है।

NGT ने जताई चिंता

हालांकि एनजीटी ने कहा कि अभी तक ऐसा कोई वैज्ञानिक आंकड़ा पेश नहीं किया गया है, जिससे यह साबित हो सके कि दूध डालने से कितना प्रदूषण हुआ।लेकिन ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि जल अधिनियम की धारा 24 के तहत नदियों और जल स्रोतों में प्रदूषण फैलाने वाले पदार्थ डालना प्रतिबंधित है। एनजीटी ने कहा कि दूध जैसे जैविक पदार्थ नदी में जाने से बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी बढ़ सकती है, जिससे जलीय जीवन प्रभावित हो सकता है। एनजीटी ने इस मामले को पर्यावरण और जनहित से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए अगली सुनवाई 17 जुलाई को तय की है।

देश की महत्वपूर्ण नदियों में शामिल है नर्मदा

नर्मदा नदी मध्यप्रदेश के अमरकंटक से निकलती है और करीब 1312 किलोमीटर का सफर तय करते हुए महाराष्ट्र और गुजरात से होकर अरब सागर में गिरती है। यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी पश्चिम की ओर बहने वाली नदी है और मध्यप्रदेश, गुजरात तथा महाराष्ट्र में सिंचाई और पेयजल का महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है।
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