नेपाल से ड्यूटी-फ्री खाद्य तेल आयात दो साल में 17 गुना बढ़ा, खाद्य तेल उत्पादक संघ ने सरकार से नीति समीक्षा और जाँच की माँग की
Gaon Connection | Jul 20, 2026, 19:09 IST
नेपाल से शुल्क-मुक्त रिफाइंड खाद्य तेल के आयात में पिछले दो वर्षों में 17 गुना से अधिक बढ़ोतरी हुई है, जिससे घरेलू खाद्य तेल उद्योग की चिंता बढ़ गई है। इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IVPA) ने सरकार से SAFTA के तहत आयात नियमों और टैरिफ ढाँचे की समीक्षा की माँग की है। संगठन का कहना है कि बढ़ते आयात से घरेलू रिफाइनिंग उद्योग, तिलहन किसानों, नए निवेश और सरकारी सीमा शुल्क राजस्व पर असर पड़ सकता है।
नेपाल से बढ़ता खाद्य तेल आयात बना चिंता का विषय
भारत में खाद्य तेल क्षेत्र एक बार फिर नीतिगत बहस के केंद्र में आ गया है। नेपाल से शुल्क-मुक्त (ड्यूटी-फ्री) रिफाइंड खाद्य तेल के आयात में पिछले दो वर्षों के दौरान आई तेज़ बढ़ोतरी ने घरेलू रिफाइनिंग उद्योग और तिलहन क्षेत्र से जुड़े संगठनों की चिंता बढ़ा दी है। उद्योग का कहना है कि आयात की मौजूदा रफ़्तार जारी रही तो इसका असर देश की रिफाइनिंग क्षमता, किसानों की आय, निवेश और सरकारी राजस्व पर पड़ सकता है। ऐसे में सरकार से मौजूदा व्यापार व्यवस्था और शुल्क ढाँचे की समीक्षा की माँग तेज़ हो गई है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक है और घरेलू माँग पूरी करने के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहता है। दूसरी ओर, सरकार घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने, रिफाइनिंग उद्योग को मज़बूत करने और कृषि आधारित वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम कर रही है। ऐसे में नेपाल से शुल्क-मुक्त रिफाइंड तेल के बढ़ते आयात ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्षेत्रीय व्यापार समझौतों और घरेलू उद्योग के हितों के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए।
इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IVPA) के अनुसार, नेपाल से भारत आने वाले रिफाइंड खाद्य तेल का आयात वर्ष 2023 में 47,295 टन था, जो 2024 में बढ़कर 1,24,056 टन और 2025 में 8,04,000 टन से अधिक हो गया। यानी केवल दो वर्षों में आयात 17 गुना से ज़्यादा बढ़ गया। एसोसिएशन का अनुमान है कि यदि यही रुझान जारी रहा तो नेपाल से खाद्य तेल का आयात जल्द ही सालाना 10 लाख टन तक पहुँच सकता है। इससे नेपाल भारत के प्रमुख रिफाइंड खाद्य तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो जाएगा और देश के खाद्य तेल व्यापार की संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
भारत में अधिकांश कंपनियाँ कच्चा खाद्य तेल आयात कर देश के भीतर उसका रिफाइनिंग कार्य करती हैं। इस प्रक्रिया के दौरान कंपनियाँ सीमा शुल्क और कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर (AIDC) का भुगतान करती हैं। लेकिन जब तैयार रिफाइंड तेल बिना शुल्क के आयात होता है, तो घरेलू उद्योग को प्रतिस्पर्धा में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
IVPA के अध्यक्ष सुधाकर देसाई ने कहा, "भारत क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग और SAFTA के उद्देश्यों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हालांकि, शुल्क-मुक्त रिफाइंड खाद्य तेल के मौजूदा आयात स्तर की व्यापक समीक्षा ज़रूरी है, ताकि घरेलू रिफाइनिंग उद्योग और किसानों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित न हो।" एसोसिएशन का मानना है कि यदि घरेलू रिफाइनिंग उद्योग पर दबाव बढ़ता है तो सोयाबीन, सरसों जैसी तिलहन फसलों की माँग पर भी असर पड़ सकता है, जिससे किसानों की आय प्रभावित होने की आशंका है। साथ ही नए निवेश और देश में वैल्यू एडिशन की प्रक्रिया भी धीमी पड़ सकती है।
IVPA का अनुमान है कि शुल्क-मुक्त आयात में बढ़ोतरी के कारण केंद्र सरकार को हर वर्ष लगभग ₹2,000 से ₹2,500 करोड़ तक के सीमा शुल्क राजस्व का संभावित नुकसान हो सकता है। संगठन का कहना है कि इससे वैल्यू एडिशन का बड़ा हिस्सा भारत के बजाय दूसरे देशों में स्थानांतरित हो सकता है।
इसी वजह से एसोसिएशन ने सरकार से दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) समझौते के तहत लागू Rules of Origin (RoO) के अनुपालन की जाँच कराने की माँग की है।
IVPA ने स्पष्ट किया है कि उसकी माँग नेपाल के साथ वैध व्यापार को रोकने या भारत की अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रतिबद्धताओं को कमज़ोर करने के लिए नहीं है। संगठन का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि शुल्क छूट का लाभ उन्हीं उत्पादों को मिले, जो Rules of Origin की निर्धारित शर्तों का वास्तविक रूप से पालन करते हों।
एसोसिएशन का यह भी कहना है कि मौजूदा टैरिफ व्यवस्था की समीक्षा से घरेलू रिफाइनिंग उद्योग को समान प्रतिस्पर्धा का अवसर मिलेगा, तिलहन किसानों के हित सुरक्षित रहेंगे और भारत की दीर्घकालिक खाद्य तेल सुरक्षा को भी मज़बूती मिलेगी।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक है और घरेलू माँग पूरी करने के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहता है। दूसरी ओर, सरकार घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने, रिफाइनिंग उद्योग को मज़बूत करने और कृषि आधारित वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम कर रही है। ऐसे में नेपाल से शुल्क-मुक्त रिफाइंड तेल के बढ़ते आयात ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्षेत्रीय व्यापार समझौतों और घरेलू उद्योग के हितों के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए।
दो वर्षों में 17 गुना बढ़ा आयात, 10 लाख टन तक पहुँचने की आशंका
घरेलू उद्योग और किसानों पर असर की आशंका
IVPA के अध्यक्ष सुधाकर देसाई ने कहा, "भारत क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग और SAFTA के उद्देश्यों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हालांकि, शुल्क-मुक्त रिफाइंड खाद्य तेल के मौजूदा आयात स्तर की व्यापक समीक्षा ज़रूरी है, ताकि घरेलू रिफाइनिंग उद्योग और किसानों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित न हो।" एसोसिएशन का मानना है कि यदि घरेलू रिफाइनिंग उद्योग पर दबाव बढ़ता है तो सोयाबीन, सरसों जैसी तिलहन फसलों की माँग पर भी असर पड़ सकता है, जिससे किसानों की आय प्रभावित होने की आशंका है। साथ ही नए निवेश और देश में वैल्यू एडिशन की प्रक्रिया भी धीमी पड़ सकती है।
सरकार को राजस्व नुकसान और नियमों की समीक्षा की माँग
इसी वजह से एसोसिएशन ने सरकार से दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) समझौते के तहत लागू Rules of Origin (RoO) के अनुपालन की जाँच कराने की माँग की है।
व्यापार रोकना नहीं, पारदर्शिता सुनिश्चित करना उद्देश्य
एसोसिएशन का यह भी कहना है कि मौजूदा टैरिफ व्यवस्था की समीक्षा से घरेलू रिफाइनिंग उद्योग को समान प्रतिस्पर्धा का अवसर मिलेगा, तिलहन किसानों के हित सुरक्षित रहेंगे और भारत की दीर्घकालिक खाद्य तेल सुरक्षा को भी मज़बूती मिलेगी।