बारिश की कमी से खेत सूने! खरीफ़ बुआई 21 फ़ीसदी घटी, जानें धान से तिलहन तक सभी प्रमुख फ़सलों की बुआई कितने फ़ीसदी पिछड़ी

Umang | Jul 07, 2026, 15:19 IST
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कमज़ोर और असमान मानसून के कारण इस वर्ष खरीफ़ फ़सलों की बुआई पिछले साल की तुलना में 21 फ़ीसदी पीछे चल रही है। धान, दलहन, तिलहन, मोटे अनाज और कपास सभी प्रमुख फ़सलों का रकबा घटा है, जबकि गन्ने और जूट-मेस्टा की बुआई में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालाँकि, मध्य भारत में मानसून के सक्रिय होने से आने वाले दिनों में बुआई की रफ़्तार बढ़ने की उम्मीद है। वहीं, आईएमडी ने जुलाई में सामान्य से कम वर्षा का अनुमान जताया है, जिससे बारिश पर निर्भर क्षेत्रों में चिंता बनी हुई है।

कम बारिश से खरीफ़ खेती पर संकट!
कम बारिश से खरीफ़ खेती पर संकट!
देश के कई हिस्सों में समय पर और पर्याप्त वर्षा नहीं होने से खरीफ़ सीज़न की शुरुआत किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण रही। धान, अरहर, सोयाबीन, मूँगफली और कपास जैसी प्रमुख फ़सलों की बुआई तय समय के मुताबिक़ आगे नहीं बढ़ सकी। बारिश पर निर्भर इलाक़ों में किसान खेत तैयार होने के बावजूद पर्याप्त नमी का इंतज़ार करते रहे, जिससे खरीफ़ का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में काफ़ी पीछे रह गया।

हालाँकि, पिछले एक सप्ताह के दौरान मध्य और दक्षिण भारत में मानसून के सक्रिय होने से हालात में सुधार की उम्मीद जगी है। खेतों में नमी बढ़ने के साथ कई राज्यों में बुआई की रफ़्तार तेज़ होने लगी है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का कहना है कि यदि अगले कुछ दिनों तक मानसून सक्रिय रहता है तो खरीफ़ बुआई में तेज़ी आने की संभावना है। वहीं भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने जुलाई में सामान्य से कम वर्षा का अनुमान बरक़रार रखा है, जिससे बारिश पर निर्भर क्षेत्रों की चिंता अभी पूरी तरह दूर नहीं हुई है।

खरीफ़ बुआई अब भी पीछे, धान, दलहन, तिलहन और कपास पर सबसे ज़्यादा असर

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, 5 जुलाई 2026 तक देश में खरीफ़ फ़सलों की कुल बुआई 350.85 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 442.80 लाख हेक्टेयर की तुलना में 91.95 लाख हेक्टेयर यानी लगभग 21 फ़ीसदी कम है।

धान की बुआई 60.24 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 69.30 लाख हेक्टेयर थी। दलहन फ़सलों का रकबा 37.15 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जो पिछले वर्ष के 47.49 लाख हेक्टेयर से कम है। अरहर की बुआई लगभग 21 लाख हेक्टेयर से घटकर 12.35 लाख हेक्टेयर रह गई है। उड़द का रकबा 4.63 लाख हेक्टेयर से घटकर 3.01 लाख हेक्टेयर और मूँग का रकबा 17.20 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.81 लाख हेक्टेयर रह गया। हालाँकि, मोठ की बुआई 3 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 3.45 लाख हेक्टेयर हो गई है। श्री अन्न एवं मोटे अनाज की कुल बुआई 60.12 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले वर्ष के 71.86 लाख हेक्टेयर से कम है। बाजरा का रकबा 30 लाख हेक्टेयर से घटकर 20.82 लाख हेक्टेयर रह गया। मक्का की बुआई 32.94 लाख हेक्टेयर, ज्वार 4.53 लाख हेक्टेयर और रागी 0.84 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले वर्ष की तुलना में कम है।

तिलहन फ़सलों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई है। कुल तिलहन रकबा 109.27 लाख हेक्टेयर से घटकर 66.31 लाख हेक्टेयर रह गया। सोयाबीन की बुआई 79.20 लाख हेक्टेयर से घटकर 47.80 लाख हेक्टेयर और मूँगफली की बुआई 28 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.93 लाख हेक्टेयर रह गई। दूसरी ओर, सूरजमुखी और अरंडी के रकबे में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कपास का रकबा भी 82 लाख हेक्टेयर से घटकर 63.18 लाख हेक्टेयर रह गया। वहीं गन्ने का क्षेत्रफल 56.72 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 57.58 लाख हेक्टेयर और जूट एवं मेस्टा का रकबा 6.16 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 6.28 लाख हेक्टेयर हो गया है।

सक्रिय मानसून से बढ़ी उम्मीद, लेकिन जुलाई का अनुमान अब भी चुनौतीपूर्ण

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, पिछले सप्ताह मध्य भारत में मानसून सक्रिय होने से वर्षा की कमी में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। जून के अंत तक जहाँ मध्य भारत में वर्षा का घाटा 50 फ़ीसदी से अधिक था, वहीं अब यह घटकर लगभग 5 फ़ीसदी रह गया है। मंत्रालय का कहना है कि इससे आने वाले दिनों में विशेषकर दलहन और तिलहन की बुआई में तेज़ी आने की संभावना है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, 1 जून से 6 जुलाई के बीच देश में 170.7 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जो दीर्घावधि औसत से 20 फ़ीसदी कम है। क्षेत्रवार देखें तो पूर्व एवं उत्तर-पूर्व भारत में 41 फ़ीसदी, उत्तर-पश्चिम भारत में 19 फ़ीसदी, दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में 15 फ़ीसदी और मध्य भारत में 5 फ़ीसदी वर्षा की कमी बनी हुई है। आईएमडी ने जुलाई के लिए सामान्य से कम वर्षा का अनुमान व्यक्त किया है। विभाग के अनुसार, प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल नीनो परिस्थितियों के कारण जुलाई में देशभर में वर्षा दीर्घावधि औसत के 94 फ़ीसदी से कम रहने की संभावना है। ऐसे में खरीफ़ सीज़न की आगे की तस्वीर आने वाले सप्ताहों में मानसून की प्रगति और वर्षा के वितरण पर निर्भर करेगी।
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