Jaisalmer: AI (आर्टिफिशियल इंसिमिनेशन) तकनीक से बच रही है ‘गोडावण पक्षी’ की जिंदगी, विलुप्ति के कगार पर था गोडावण

Gaon Connection | Mar 26, 2026, 17:28 IST
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राजस्थान में गोडावण की प्रजाति को संरक्षित करने के लिए अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लिया जा रहा है। जैसलमेर के संरक्षण केंद्र में इस तकनीक के माध्यम से चार नए चूजे जन्मे हैं। यह पहल गोडावण की कम प्रजनन दर को ध्यान में रखते हुए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
राजस्थान का Desert National Park
राजस्थान का Desert National Park
राजस्थान में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) की संख्या बढ़ाने के लिए अब आर्टिफिशियल इंसिमिनेशन तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसलमेर के गोडावण संरक्षण केंद्र में इस तकनीक की मदद से हाल ही में चार चूजों का जन्म हुआ है, जिनमें से दो AI से पैदा हुए हैं। यह कदम इस संकटग्रस्त पक्षी की प्रजाति को बचाने की दिशा में एक बड़ी सफलता है, क्योंकि गोडावण की प्राकृतिक प्रजनन दर बहुत धीमी है।

विलुप्ति के कगार पर अनोखा पक्षी

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण)
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण)
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) भारत के सबसे दुर्लभ और संकटग्रस्त पक्षियों में से एक है। शर्मीले स्वभाव और धीमी प्रजनन दर के कारण इसकी संख्या लगातार घटती जा रही थी। लेकिन अब राजस्थान में इस पक्षी को बचाने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है, जिससे इसके संरक्षण को नई उम्मीद मिली है।

AI से गोडावण की संख्या में वृद्धि

जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क के डीएफओ ब्रजमोहन गुप्ता ने बताया कि जैसलमेर के सम गांव में स्थित ब्रीडिंग सेंटर में 2026 के ब्रीडिंग सीजन में चार गोडावण के चूजों का जन्म हुआ। इनमें से दो चूजे प्राकृतिक तरीके से पैदा हुए, जबकि दो चूजों का जन्म आर्टिफिशियल इंसिमिनेशन (AI) तकनीक से हुआ। यह तकनीक गोडावण की संख्या बढ़ाने में मददगार साबित हो रही है।

क्या है आर्टिफिशियल इंसिमिनेशन?

जैसलमेर के रामदेवरा कस्बे में स्थित देश के सबसे बड़े गोडावण संरक्षण केंद्र के प्रोजेक्ट एसोसिएट महेश कुमार ने बताया, "गोडावण का प्राकृतिक रूप से प्रजनन बहुत धीमा होता है। मादा गोडावण साल भर में केवल एक ही अंडा देती है, जिससे इनकी संख्या बढ़ाना एक चुनौती भरा काम था। लेकिन आर्टिफिशियल इंसिमिनेशन के जरिए मादा गोडावण ज्यादा अंडे दे पाती है, जिससे इनकी संख्या बढ़ाना आसान हो गया है। इस तकनीक में नर पक्षी से शुक्राणु लेकर वैज्ञानिक तरीके से मादा के शरीर में डाला जाता है, ताकि अंडा फर्टिलाइज हो सके और चूजा विकसित हो सके। यह काम वन विभाग और वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सहयोग से किया जा रहा है।"

जैसलमेर में बढ़ी गोडावण की संख्या

महेश कुमार गुर्जर
महेश कुमार गुर्जर
महेश कुमार गुर्जर ने बताया कि जैसलमेर में अब कुल गोडावण की संख्या 72 हो गई है, जबकि पूरे देश में इनकी संख्या लगभग 150 है। अभी ब्रीडिंग सीजन चल रहा है, जो जून-जुलाई तक चलेगा। उनका अनुमान है कि इस सीजन में AI तकनीक की मदद से कुल 40 नए गोडावण के चूजों को जन्म दिलाया जा सकेगा।

संकटग्रस्त प्रजाति को बचाने के प्रयास

राजस्थान में ग्रामीण चरवाहे कर रहें गोडावण पक्षी के संरक्षण में मदद
राजस्थान में ग्रामीण चरवाहे कर रहें गोडावण पक्षी के संरक्षण में मदद
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को रेड डाटा बुक में अत्यधिक संकटग्रस्त प्रजातियों की श्रेणी में रखा गया है। यह राजस्थान का राज्य पक्षी भी है, इसलिए भारत और राजस्थान सरकार इसकी संख्या बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। जैसलमेर से 115 किलोमीटर दूर रामदेवरा जाने वाले मार्ग पर गोमट गांव में देश का सबसे बड़ा गोडावण प्रजनन केंद्र स्थापित किया गया है। यहां 9.25 करोड़ रुपये की लागत से एक अत्याधुनिक ‘रिवाइल्डिंग टनल’ भी बनाई गई है, जो दुर्लभ पक्षियों को जीवन देने का आधार बनेगी। इस टनल में पक्षियों को खुले वातावरण जैसा अनुभव कराया जाता है, ताकि वे जंगल में छोड़े जाने पर जीवित रह सकें।

गोडावण: एशिया का सबसे भारी उड़ने वाला पक्षी

गोडावण एशिया का सबसे भारी उड़ने वाला पक्षी है, जिसका वजन करीब 12 किलो होता है। यह राजस्थान के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में भी पाया जाता है। महेश कुमार गुर्जर के अनुसार, पिछले 5 सालों में पूरे देश में गोडावण की संख्या बढ़कर 222 हो गई है, जिसमें जैसलमेर में प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के तहत 72 गोडावण के जन्म का बड़ा योगदान है।

प्राकृतिक आवास पर मंडराता खतरा

गोडावण शुष्क और अर्ध-शुष्क घास के मैदानों में पाए जाते हैं, और जैसलमेर इनके लिए एक उपयुक्त स्थान है। हालांकि, पिछले कुछ सालों में यहां सोलर प्लांट्स लगने और बिजली की हाईटेंशन लाइनों के कारण इनके आवास पर संकट के संकेत दिखाई देने लगे हैं। पक्षी प्रेमी विक्रम दर्जी का कहना है कि गोडावण की संख्या में बढ़ोतरी जैव विविधता के लिए अच्छी बात है, लेकिन इसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना भी बहुत जरूरी है।
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