अमेरिकी शुल्क से भारतीय लाल मिर्च अर्क निर्यात को झटका, एंटी-डंपिंग और सब्सिडी रोधी ड्यूटी से बढ़ी चिंता, नए बाज़ार तलाशने की चुनौती
Gaon Connection | Jul 16, 2026, 14:57 IST
अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले ओलियोरेज़िन पैप्रिका (लाल मिर्च अर्क) पर एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगा दी है, जिससे भारतीय मसाला निर्यात उद्योग की चिंता बढ़ गई है। नई ड्यूटी के साथ अमेरिका द्वारा प्रस्तावित अतिरिक्त टैरिफ़ लागू होने पर भारतीय निर्यातकों की लागत और बढ़ सकती है। उद्योग का मानना है कि इससे अमेरिका में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होगी और निर्यातकों को बढ़ी लागत वहन करने या नए बाज़ार तलाशने पड़ सकते हैं।
अमेरिकी शुल्क से निर्यात होगा महंगा
अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले ओलियोरेज़िन पैप्रिका (लाल मिर्च अर्क) पर एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग (सब्सिडी रोधी) ड्यूटी लगाने का फैसला किया है। इस कदम से भारतीय मसाला निर्यात उद्योग में चिंता बढ़ गई है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि इन अतिरिक्त शुल्कों से भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार प्रभावित होगा और भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर सीधा असर पड़ेगा।
अमेरिकी वाणिज्य विभाग की यह कार्रवाई अमेरिकी निर्माता की ओर से अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग (यूएसआईटीसी) में दायर याचिका के बाद की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया था कि भारतीय निर्यातक ओलियोरेज़िन पैप्रिका को अमेरिका में बेहद कम कीमत पर बेच रहे हैं, जिससे वहाँ के घरेलू उत्पादकों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। इसी आधार पर अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगाने का निर्णय लिया है।
अमेरिका ने भारतीय ओलियोरेज़िन पैप्रिका पर 18.56 प्रतिशत से 25.41 प्रतिशत तक काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगाई है, जिसे फरवरी 2026 से प्रभावी माना गया है। इसके अलावा 3.33 प्रतिशत से 4.66 प्रतिशत तक एंटी-डंपिंग ड्यूटी जून 2026 से पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) के साथ लागू की गई है।
'बिजनेस लाइन' की मुताबिक, ऑल इंडिया स्पाइसेज़ एक्सपोर्टर्स फ़ोरम के अध्यक्ष इमैनुएल नम्बूस्सेरिल ने कहा कि ये शुल्क उन अतिरिक्त टैरिफ़ के अलावा हैं, जिन पर अमेरिका भारतीय आयात के लिए सेक्शन 301 के तहत विचार कर रहा है। जबरन श्रम (फ़ोर्स्ड लेबर) से जुड़े प्रावधानों के तहत प्रस्तावित ये अतिरिक्त टैरिफ़ 10 से 12.5 प्रतिशत तक हो सकते हैं। उनका कहना है कि इन सभी शुल्कों का संयुक्त असर भारतीय निर्यातकों के लिए गंभीर चुनौती पैदा करेगा।
ओलियोरेज़िन पैप्रिका लाल मिर्च से तैयार किया जाने वाला प्राकृतिक अर्क है, जिसका इस्तेमाल अमेरिका में खाद्य रंग, कॉस्मेटिक्स और मसाला उत्पादों के निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जाता है। अमेरिका इस उत्पाद के लिए भारत के सबसे बड़े निर्यात बाज़ारों में से एक है।
'बिजनेस लाइन' ने व्यापार आँकड़ों के हवाले से बताया है कि भारत से अमेरिका को हर साल 5.46 करोड़ डॉलर से 6.80 करोड़ डॉलर मूल्य का ओलियोरेज़िन पैप्रिका निर्यात होता है, जबकि निर्यात की मात्रा 21 लाख से 25 लाख किलोग्राम के बीच रहती है। उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि एंटी-डंपिंग, काउंटरवेलिंग ड्यूटी और संभावित अतिरिक्त टैरिफ़ का संयुक्त प्रभाव भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को कम कर सकता है। ऐसी स्थिति में निर्यातकों को या तो बढ़ी हुई लागत खुद वहन करनी पड़ेगी या फिर नए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तलाशने होंगे।
अमेरिकी वाणिज्य विभाग की यह कार्रवाई अमेरिकी निर्माता की ओर से अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग (यूएसआईटीसी) में दायर याचिका के बाद की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया था कि भारतीय निर्यातक ओलियोरेज़िन पैप्रिका को अमेरिका में बेहद कम कीमत पर बेच रहे हैं, जिससे वहाँ के घरेलू उत्पादकों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। इसी आधार पर अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगाने का निर्णय लिया है।
फरवरी से लागू होगी काउंटरवेलिंग ड्यूटी, जून से एंटी-डंपिंग शुल्क भी प्रभावी
'बिजनेस लाइन' की मुताबिक, ऑल इंडिया स्पाइसेज़ एक्सपोर्टर्स फ़ोरम के अध्यक्ष इमैनुएल नम्बूस्सेरिल ने कहा कि ये शुल्क उन अतिरिक्त टैरिफ़ के अलावा हैं, जिन पर अमेरिका भारतीय आयात के लिए सेक्शन 301 के तहत विचार कर रहा है। जबरन श्रम (फ़ोर्स्ड लेबर) से जुड़े प्रावधानों के तहत प्रस्तावित ये अतिरिक्त टैरिफ़ 10 से 12.5 प्रतिशत तक हो सकते हैं। उनका कहना है कि इन सभी शुल्कों का संयुक्त असर भारतीय निर्यातकों के लिए गंभीर चुनौती पैदा करेगा।
भारत के सबसे बड़े बाज़ार पर असर, निर्यातकों को नए बाज़ार तलाशने की चिंता
'बिजनेस लाइन' ने व्यापार आँकड़ों के हवाले से बताया है कि भारत से अमेरिका को हर साल 5.46 करोड़ डॉलर से 6.80 करोड़ डॉलर मूल्य का ओलियोरेज़िन पैप्रिका निर्यात होता है, जबकि निर्यात की मात्रा 21 लाख से 25 लाख किलोग्राम के बीच रहती है। उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि एंटी-डंपिंग, काउंटरवेलिंग ड्यूटी और संभावित अतिरिक्त टैरिफ़ का संयुक्त प्रभाव भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को कम कर सकता है। ऐसी स्थिति में निर्यातकों को या तो बढ़ी हुई लागत खुद वहन करनी पड़ेगी या फिर नए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तलाशने होंगे।