यूरिया पर निर्भरता घटाने की तैयारी, खेती में अमोनिया के इस्तेमाल को मिली मंज़ूरी, जानिए क्या है सरकार की पूरी योजना
Umang | Jul 27, 2026, 15:57 IST
केंद्र सरकार ने यूरिया के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए खेती में 82 प्रतिशत नाइट्रोजन वाले निर्जल (एनहाइड्रस) अमोनिया के इस्तेमाल को तीन वर्षों के लिए मंज़ूरी दे दी है। 23 जुलाई को जारी राजपत्र अधिसूचना के तहत यह अनुमति दी गई है। यदि यह तकनीक सफल रहती है, तो भारत अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के बाद खेती में सीधे अमोनिया का उपयोग करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। आईसीएआर के परीक्षणों में कुछ फसलों में अच्छे नतीजे मिले हैं, हालांकि सुरक्षित उपयोग और खेतों में अमोनिया डालने की तकनीक को अभी और बेहतर बनाने की आवश्यकता है।
यूरिया आयात घटाने के लिए सरकार का बड़ा दांव
देश में यूरिया की बढ़ती माँग और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार ने खेती में निर्जल (एनहाइड्रस) अमोनिया के इस्तेमाल को मंज़ूरी दे दी है। यह अमोनिया लगभग 82 प्रतिशत नाइट्रोजन युक्त होता है, जबकि सामान्य यूरिया में 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है। सरकार का मानना है कि इससे भविष्य में यूरिया पर निर्भरता कम करने और किसानों को नाइट्रोजन का एक नया विकल्प उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। अगर यह पहल सफल रहती है, तो अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के बाद भारत खेती में सीधे अमोनिया का इस्तेमाल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा।
23 जुलाई को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी राजपत्र (गज़ट) अधिसूचना के अनुसार, उर्वरक (अकार्बनिक, कार्बनिक या मिश्रित) नियंत्रण आदेश, 1985 के तहत कम-से-कम 82 प्रतिशत नाइट्रोजन वाले निर्जल अमोनिया उर्वरक के निर्माण की अनुमति तीन वर्षों के लिए दी गई है। हालांकि, खेतों में इसका उपयोग करने के लिए विशेष मशीनों, सुरक्षित परिवहन और मिट्टी के भीतर अमोनिया डालने की तकनीक विकसित करना अभी सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
राजपत्र अधिसूचना के तहत किसी भी इकाई को अगले तीन वर्षों तक 82 प्रतिशत नाइट्रोजन वाले निर्जल अमोनिया उर्वरक का निर्माण करने की अनुमति दी गई है। इस कदम से उन यूरिया संयंत्रों में हर साल बचने वाली अतिरिक्त अमोनिया का भी उपयोग किया जा सकेगा, जो उत्पादन क्षमता की सीमा के कारण यूरिया बनाने में इस्तेमाल नहीं हो पाती। जानकारी के अनुसार, देश के कई यूरिया संयंत्रों में हर वर्ष लगभग 2,000 से 6,000 टन अतिरिक्त अमोनिया बच जाती है। अभी इसका उपयोग सीमित है, लेकिन नई व्यवस्था के बाद इसे खेती में इस्तेमाल करने का रास्ता खुल गया है। इससे उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग होने की उम्मीद है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने रबी 2025-26 के दौरान अपने 13 संस्थानों में हरित अमोनिया के उपयोग का परीक्षण शुरू किया। सीधे बोए गए धान की फसल पर किए गए परीक्षण में कुछ स्थानों पर सामान्य यूरिया की तुलना में फसल में अधिक हरियाली और बेहतर बढ़वार दर्ज की गई। वहीं कुछ खेतों में अमोनिया समान मात्रा में नहीं पहुँचने के कारण फसल की बढ़वार एक जैसी नहीं रही। इससे साफ़ हुआ कि खेतों में अमोनिया डालने की तकनीक और उसके तरीक़े को और बेहतर बनाने की ज़रूरत है।
सरकार हरित अमोनिया और हरित यूरिया के उत्पादन को भी बढ़ावा दे रही है। आंध्र प्रदेश के पुडिमडाका में एनटीपीसी की अनुसंधान इकाई नेट्रा के माध्यम से प्रतिदिन 150 टन क्षमता वाला हरित यूरिया संयंत्र विकसित किया जा रहा है। इसके अलावा 1,200 टन प्रतिदिन क्षमता वाला हरित अमोनिया संयंत्र लगाने के लिए लगभग ₹13,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ के निवेश की आवश्यकता बताई गई है।
बिज़नेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में अच्छी बारिश के कारण देश में यूरिया की माँग तेज़ी से बढ़ी है। 17 जुलाई तक ही महीने की कुल माँग का 60 प्रतिशत से अधिक यूरिया बिक चुका था, जबकि इसी अवधि में डीएपी और मिश्रित उर्वरकों की बिक्री 50 प्रतिशत से कम तथा एमओपी की बिक्री लगभग 30 प्रतिशत रही।
भारत हर साल लगभग 100 लाख टन यूरिया का आयात करता है, जबकि देश में करीब 300 लाख टन यूरिया का उत्पादन होता है। हालांकि, घरेलू उत्पादन का बड़ा हिस्सा भी आयातित एलएनजी पर निर्भर है। सरकार को उम्मीद है कि अमोनिया आधारित नई तकनीक के सफल होने पर यूरिया के आयात में कमी आएगी, किसानों को नाइट्रोजन का एक नया विकल्प मिलेगा और हरित उर्वरकों के उत्पादन को भी बढ़ावा मिलेगा।
23 जुलाई को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी राजपत्र (गज़ट) अधिसूचना के अनुसार, उर्वरक (अकार्बनिक, कार्बनिक या मिश्रित) नियंत्रण आदेश, 1985 के तहत कम-से-कम 82 प्रतिशत नाइट्रोजन वाले निर्जल अमोनिया उर्वरक के निर्माण की अनुमति तीन वर्षों के लिए दी गई है। हालांकि, खेतों में इसका उपयोग करने के लिए विशेष मशीनों, सुरक्षित परिवहन और मिट्टी के भीतर अमोनिया डालने की तकनीक विकसित करना अभी सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
तीन साल के लिए मिली मंज़ूरी, अतिरिक्त अमोनिया का भी होगा इस्तेमाल
आईसीएआर के परीक्षण में मिले अच्छे नतीजे, हरित अमोनिया पर भी बढ़ रहा काम
सरकार हरित अमोनिया और हरित यूरिया के उत्पादन को भी बढ़ावा दे रही है। आंध्र प्रदेश के पुडिमडाका में एनटीपीसी की अनुसंधान इकाई नेट्रा के माध्यम से प्रतिदिन 150 टन क्षमता वाला हरित यूरिया संयंत्र विकसित किया जा रहा है। इसके अलावा 1,200 टन प्रतिदिन क्षमता वाला हरित अमोनिया संयंत्र लगाने के लिए लगभग ₹13,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ के निवेश की आवश्यकता बताई गई है।
बढ़ती माँग के बीच आयात कम करने की तैयारी
भारत हर साल लगभग 100 लाख टन यूरिया का आयात करता है, जबकि देश में करीब 300 लाख टन यूरिया का उत्पादन होता है। हालांकि, घरेलू उत्पादन का बड़ा हिस्सा भी आयातित एलएनजी पर निर्भर है। सरकार को उम्मीद है कि अमोनिया आधारित नई तकनीक के सफल होने पर यूरिया के आयात में कमी आएगी, किसानों को नाइट्रोजन का एक नया विकल्प मिलेगा और हरित उर्वरकों के उत्पादन को भी बढ़ावा मिलेगा।