अब बाहरी व्यक्ति को सीधे नहीं बेच पाएंगे पैतृक खेत! क्लास-1 वारिसों को मिलेगा पहला अधिकार, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से समझें पूरा मामला

Umang | Jul 17, 2026, 12:50 IST
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 22 विरासत में मिली कृषि भूमि पर भी लागू होगी। अदालत ने कहा कि क्लास-1 वारिसों में से कोई भी अपना हिस्सा किसी बाहरी व्यक्ति को बेचने से पहले अन्य सह-वारिसों को उसे खरीदने का प्राथमिक अधिकार देगा। कोर्ट ने माना कि यह प्रावधान उत्तराधिकार से जुड़ा अधिकार है, न कि सामान्य प्री-एम्प्शन कानून। इसके साथ ही संसद की विधायी शक्ति को भी वैध ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।

पैतृक कृषि भूमि बेचने से पहले जान लें ये कानून
पैतृक कृषि भूमि बेचने से पहले जान लें ये कानून
सुप्रीम कोर्ट ने पैतृक कृषि भूमि (Inherited Agricultural Land) को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी व्यक्ति की बिना वसीयत मृत्यु हो जाती है और उसकी कृषि भूमि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत क्लास-1 वारिसों को विरासत में मिलती है, तो उनमें से कोई भी वारिस अपना हिस्सा किसी बाहरी व्यक्ति को बेचने से पहले अन्य क्लास-1 वारिसों को उसे खरीदने का प्राथमिक (Preferential) अधिकार देगा। TOI की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वोच्च अदालत ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 केवल सामान्य प्री-एम्प्शन का अधिकार नहीं देती, बल्कि यह उत्तराधिकार से जुड़ा एक वैधानिक अधिकार है, जो परिवार की संपत्ति को यथासंभव परिवार के भीतर बनाए रखने के उद्देश्य से बनाया गया है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मामले में दायर अपील को खारिज करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 22 कृषि भूमि पर भी पूरी तरह लागू होती है और संसद को ऐसा कानून बनाने का पूरा संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस धारा को पंजाब प्री-एम्प्शन एक्ट की धारा 15 से जोड़कर असंवैधानिक बताने की कोशिश पूरी तरह गलत है क्योंकि दोनों कानूनों का उद्देश्य और दायरा अलग-अलग है।

क्या था पूरा मामला?

TOI की रिपोर्ट के अनुसार, यह विवाद नान्हू नामक व्यक्ति की मृत्यु के बाद शुरू हुआ। उनकी मृत्यु बिना किसी वसीयत के हुई थी। इसके बाद उनकी कृषि भूमि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत उनके सभी बच्चों को क्लास-1 वारिस के रूप में विरासत में मिली। बाद में सात भाई-बहनों ने दिसंबर 2011 में अपनी-अपनी हिस्सेदारी एक बाहरी व्यक्ति को बेचने का फैसला किया और बिक्री विलेख (Sale Deed) तैयार कर लिया। हालांकि बिक्री पूरी होने से पहले ही एक अन्य भाई-बहन ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाया। उसने दावा किया कि कानून के अनुसार सबसे पहले उसे अपने सह-वारिसों का हिस्सा खरीदने का अधिकार मिलना चाहिए था। इसलिए बाहरी व्यक्ति को संपत्ति बेचने से पहले उसे मौका दिया जाना चाहिए।

सबसे पहले मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में हुई। ट्रायल कोर्ट ने धारा 22 के तहत दायर मुकदमा खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ पहले ही आत्म प्रकाश बनाम State of Haryana मामले में पंजाब प्री-एम्प्शन एक्ट, 1913 की धारा 15 को असंवैधानिक घोषित कर चुकी है। चूंकि ट्रायल कोर्ट के अनुसार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 और पंजाब कानून की धारा 15 लगभग समान थीं, इसलिए धारा 22 भी लागू नहीं होगी।

प्रथम अपीलीय अदालत ने पलटा फैसला

ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए मामला प्रथम अपीलीय अदालत पहुंचा। प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले बाबू राम बनाम संतोख सिंह का हवाला दिया जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 कृषि भूमि पर भी लागू होती है। इसके बाद मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने भी प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को सही माना और धारा 22 को कृषि भूमि पर लागू बताया। हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद हारने वाले पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या था सबसे बड़ा सवाल?

सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे अहम कानूनी सवाल यह था कि क्या हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 के तहत क्लास-1 वारिसों को दिया गया प्राथमिक खरीद अधिकार विरासत में मिली कृषि भूमि पर भी लागू होगा? अपीलकर्ताओं का कहना था कि कृषि भूमि राज्यों का विषय है। इसलिए संसद के पास कृषि भूमि से जुड़े ऐसे अधिकार बनाने की संवैधानिक शक्ति नहीं है। उनका यह भी तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट का पुराना फैसला बाबू राम बनाम संतोख सिंह सही कानून नहीं बताता क्योंकि उस फैसले में संविधान की सातवीं अनुसूची में विधायी शक्तियों से जुड़े प्रावधानों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया था। इसलिए अब उस फैसले पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज कर दी यह दलील?

सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी तर्कों को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि बाबू राम मामले में दिया गया फैसला पूरी तरह सही है और आज भी वही कानून लागू है। कोर्ट ने कहा कि धारा 22 किसी भी कृषि भूमि की सामान्य खरीद-बिक्री पर लागू नहीं होती। यह केवल उन मामलों में लागू होती है, जहां किसी व्यक्ति की बिना वसीयत मृत्यु होने के बाद उसकी संपत्ति क्लास-1 वारिसों को विरासत में मिली हो। ऐसी स्थिति में यदि कोई सह-वारिस अपना हिस्सा किसी बाहरी व्यक्ति को बेचना चाहता है तो सबसे पहले अन्य सह-वारिसों को उसे खरीदने का अवसर देना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद ने उत्तराधिकार का अधिकार देते समय जानबूझकर यह शर्त जोड़ी थी ताकि परिवार की विरासत परिवार के भीतर ही सुरक्षित रह सके।

अदालत ने अपने फैसले में कहा, "जब संसद ने विभिन्न प्रकार की संपत्तियों, जिनमें कृषि भूमि भी शामिल है, पर उत्तराधिकार का अधिकार दिया, तब उसने बाहरी व्यक्ति को संपत्ति हस्तांतरित करने के अधिकार पर एक शर्त लगाई और अन्य वारिसों को प्राथमिक अधिकार दिया। इसका स्पष्ट उद्देश्य पारिवारिक संपत्ति को यथासंभव परिवार के भीतर बनाए रखना था।" कोर्ट ने कहा कि धारा 22 का मकसद किसी व्यक्ति की संपत्ति बेचने की स्वतंत्रता को खत्म करना नहीं है, बल्कि केवल परिवार के अन्य उत्तराधिकारियों को पहला अवसर देना है ताकि पैतृक संपत्ति परिवार से बाहर न जाए।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं ने सबसे ज़्यादा ज़ोर संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले आत्म प्रकाश बनाम State of Haryana पर दिया। उनका कहना था कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही पंजाब प्री-एम्प्शन एक्ट, 1913 की धारा 15 को असंवैधानिक घोषित कर चुका है, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 भी उसी तरह असंवैधानिक मानी जानी चाहिए। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि दोनों कानूनों की प्रकृति, उद्देश्य और लागू होने का क्षेत्र पूरी तरह अलग-अलग है। इसलिए एक कानून पर दिया गया फैसला दूसरे कानून पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि पंजाब प्री-एम्प्शन एक्ट की धारा 15 के तहत केवल सह-वारिस ही नहीं बल्कि रिश्तेदारों, पड़ोसियों और यहां तक कि कुछ परिस्थितियों में किरायेदारों को भी संपत्ति खरीदने का प्राथमिक अधिकार दिया गया था। यह अधिकार मुख्य रूप से रक्त संबंधों और पारंपरिक रीति-रिवाजों पर आधारित था। इसके विपरीत हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 केवल उन क्लास-1 वारिसों पर लागू होती है, जिन्हें एक ही मृतक की संपत्ति उत्तराधिकार के माध्यम से मिली हो। यह किसी भी व्यक्ति को सामान्य रूप से प्री-एम्प्शन का अधिकार नहीं देती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आत्म प्रकाश मामले में अदालत ने प्री-एम्प्शन की अवधारणा को असंवैधानिक नहीं ठहराया था, बल्कि पंजाब कानून में लाभार्थियों का वर्गीकरण मनमाना और अनुचित पाया गया था। इसलिए यह कहना कि प्री-एम्प्शन का सिद्धांत ही असंवैधानिक है, उस फैसले की पूरी तरह गलत व्याख्या होगी।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सभी तथ्यों और कानूनी दलीलों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट तथा प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 22 आज भी पूरी तरह प्रभावी है और यह विरासत में मिली कृषि भूमि पर भी लागू होती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि बाबू राम बनाम संतोख सिंह मामले में दिया गया निर्णय सही कानून है और भविष्य में भी उसका पालन किया जाएगा।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आत्म प्रकाश मामले के आधार पर धारा 22 को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि दोनों कानूनों का उद्देश्य और कार्यक्षेत्र अलग-अलग हैं। अदालत ने यह भी माना कि संसद को उत्तराधिकार संबंधी कानून बनाने की पूरी संवैधानिक शक्ति प्राप्त है और धारा 22 उसी शक्ति के तहत बनाई गई वैध कानूनी व्यवस्था है। इन्हीं कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और उत्तरदाता के पक्ष में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 के तहत मिले प्राथमिक खरीद अधिकार को बरकरार रखा।

यह फैसला भविष्य में पैतृक कृषि भूमि के बंटवारे और बिक्री से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी नज़ीर माना जाएगा, क्योंकि इससे स्पष्ट हो गया है कि परिवार के किसी क्लास-1 वारिस का हिस्सा बाहरी व्यक्ति को बेचने से पहले अन्य सह-वारिसों को उसे खरीदने का पहला अवसर देना अनिवार्य होगा।

क्लास-1 वारिस कौन होते हैं?

• पुत्र (Son)
• पुत्री (Daughter)
• विधवा/पत्नी (Widow)
• माता (Mother)
• पहले से दिवंगत पुत्र का पुत्र
• पहले से दिवंगत पुत्र की पुत्री
• पहले से दिवंगत पुत्र की विधवा
• पहले से दिवंगत पुत्र के पहले से दिवंगत पुत्र का पुत्र
• पहले से दिवंगत पुत्र के पहले से दिवंगत पुत्र की पुत्री
• पहले से दिवंगत पुत्र के पहले से दिवंगत पुत्र की विधवा
• पहले से दिवंगत पुत्री का पुत्र
• पहले से दिवंगत पुत्री की पुत्री
• पहले से दिवंगत पुत्री की पहले से दिवंगत पुत्री का पुत्र
• पहले से दिवंगत पुत्री की पहले से दिवंगत पुत्री की पुत्री
• पहले से दिवंगत पुत्री के पहले से दिवंगत पुत्र की पुत्री
• पहले से दिवंगत पुत्र के पहले से दिवंगत पुत्री की पुत्री

आधिकारिक स्रोत: भारत सरकार का India Code (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956)
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