एंटी-हेल गन से बचेगी सेब की खेती या पर्यावरण को होगा नुकसान? हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान

Preeti Nahar | Jun 04, 2026, 18:59 IST
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हिमाचल में ओलावृष्टि से फसलों को बचाने के लिए लगी एंटी-हेल गन अब कानूनी जांच के घेरे में हैं। हाईकोर्ट ने इनके पर्यावरणीय और स्वास्थ्य प्रभावों पर वैज्ञानिक अध्ययन न होने पर सवाल उठाए हैं। राज्य सरकार से जवाब मांगा गया है। किसानों के लिए उम्मीद की यह तकनीक वन्यजीवों और आबादी पर असर डाल सकती है।

एंटी-हेल गन की तस्वीर
एंटी-हेल गन की तस्वीर
हिमाचल प्रदेश में सेब और अन्य बागवानी फसलों को ओलावृष्टि से बचाने के लिए लगाई जा रही एंटी-हेल गन अब कानूनी जांच के दायरे में आ गई हैं। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इन उपकरणों की लगातार स्थापना पर स्वत: संज्ञान (सुओ मोटू) लेते हुए सवाल उठाया है कि आखिर इनके पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों का कोई वैज्ञानिक अध्ययन क्यों नहीं कराया गया।

हाईकोर्ट ने इस मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज करते हुए राज्य सरकार और संबंधित विभागों से जवाब मांगा है। अदालत की चिंता यह है कि जिन मशीनों को किसानों की फसलों को ओलों से बचाने के लिए लगाया जा रहा है, उनके दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर कोई व्यापक शोध या प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है।

क्या होती है एंटी-हेल गन?

एंटी-हेल गन एक ऐसी मशीन होती है जो गैस विस्फोट से तेज ध्वनि और शॉक वेव पैदा करती है। दावा किया जाता है कि यह शॉक वेव, बादलों में बनने वाले ओलों की प्रक्रिया को बाधित करती है, जिससे बर्फ के बड़े टुकड़ों की जगह बारिश होती है। हालांकि दुनिया भर में इसकी प्रभावशीलता को लेकर वैज्ञानिकों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं।

किसानों के लिए उम्मीद, लेकिन सवाल भी

एंटी-हेल गन
एंटी-हेल गन
साल 2021 में हिमाचल प्रदेश सरकार ने ओलों से फसलों को बचाने के लिए स्वदेशी 'एंटी-हेल गन' का इस्तेमाल करने की बात कही थी। राज्य के बागवानी मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर ने बताया था "भारत में बनी 'एंटी-हेल गन' कुछ इलाकों में ट्रायल के तौर पर लगाई जाएंगी। यह कदम किसानों को ओलावृष्टि से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए उठाया जा रहा है।"

बागवानी मंत्री ने बताया था, "यह नई तकनीक किसानों के लिए एक उम्मीद की किरण है। ओलावृष्टि से अक्सर किसानों की मेहनत पर पानी फिर जाता है और उनकी फसलें बर्बाद हो जाती हैं। इन 'एंटी-हेल गन' का मकसद ओलों को जमीन पर गिरने से पहले ही हवा में तितर-बितर करना है।"

आलों की मार से हर साल होता है करोड़ों का नुकसान

हिमाचल के सेब उत्पादक क्षेत्रों में ओलावृष्टि हर साल करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाती है। ऐसे में कई बागवान एंटी-हेल गन को फसलों की सुरक्षा का एक विकल्प मानते हैं। हिमाचल के शिमला जिले के सेब किसान अमन ठाकुर ने गाँव कनेक्शन को बताया कि उन्होंने न्यूजीलेंड से इन एंटी-गन को करीब 1 करोड़ की कीमत से मंगवाया था, लेकिन कुछ अधिक फायदा नहीं मिल पाया।

बर्फ से ढंके सेब
बर्फ से ढंके सेब
अमन ठाकुर ने बताया "खासकर हिमालय जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र में ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है। एंटी-हेल गन से काफी तेज आवाज निकलती है, जो आस-पास के जीव व जानवरों दिकक्त जरूर होती है। क्योंकि पहाड़ों में कोई भी आवाज बहुत तेजी से ट्रैवल करती है। साथ ही इसे चलाने पर गैस भी निकलती है जो करीब-करीब 2 किलोमीटर तक के एरिया को कवर करती है। लेकिन इसके अवाला किसी तरह कe नुकसान नहीं देखा गया।"

मौसम की मार के आगे काम नही आई एंटी गन

शिमला के बाघी और रतनाड़ी इलाकों में ओलावृष्टि का खतरा हमेशा रहता है। इन इलाकों को ओलावृष्टि के प्रति संवेदनशील माना जाता है। कुछ साल पहले, इसी तरह की ओलावृष्टि ने सेब की पूरी फसल को बर्बाद कर दिया था, जिससे करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ था। यहाँ तक कि एंटी हेल नेट (ओलों से बचाने वाले जाल) भी ज्यादा कारगर साबित नहीं हुए। इसकी वजह यह थी कि 2013 में भारी बर्फबारी हुई थी और बर्फ के वजन से नेट खराब हो गए थे। बर्फ का वजन इतना था कि नेट उस पर टिक नहीं पाए और खराब हो गए। इस वजह से ओलों से बचाव का यह तरीका भी नाकाम साबित हुआ।

अदालत ने क्यों जताई चिंता?

हाईकोर्ट ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि प्रदेश में कई स्थानों पर एंटी-हेल गन स्थापित की जा रही हैं, लेकिन इनके संभावित दुष्प्रभावों पर कोई समग्र अध्ययन सामने नहीं आया है। अदालत यह जानना चाहती है कि क्या इन मशीनों के उपयोग से पर्यावरण, जैव विविधता, वन्यजीवों या स्थानीय समुदायों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस संबंध में सरकार और संबंधित एजेंसियों से विस्तृत जानकारी मांगी गई है।"हालांकि अमन बाते हैं अभी तक किसी प्रकार के प्रतिकूल प्रभाव की कोई खबर नहीं है।"

खेती और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल

यह मामला केवल एंटी-हेल गन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल को भी सामने लाता है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में फसलों को बचाने के लिए अपनाई जा रही नई तकनीकों का मूल्यांकन कैसे किया जाए। अब सभी की नजर हाईकोर्ट की आगामी सुनवाई और सरकार द्वारा पेश की जाने वाली रिपोर्ट पर रहेगी। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि एंटी-हेल गन वास्तव में कितनी प्रभावी हैं और इनके उपयोग से जुड़े जोखिम कितने गंभीर हैं।
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