Assam Flood: एक रात में कैसे उजड़ गया नेपाल कुटी गाँव, जानिए बाढ़ पीड़ितों की दर्दनाक कहानी|Ground Report
Mansi | Aug 02, 2026, 12:42 IST
गोलाघाट जिले के नेपाल कुटी गाँव में आए विनाशकारी बाढ़ ने वहांँ के निवासियों की ज़िंदगी को पूरी तरह से बदल दिया है। बाढ़ ने न केवल कई घरों को तबाह किया, बल्कि लोगों की रोज़ी-रोटी को भी छीन लिया। पशुधन की हानि ने कई परिवारों को बेघर कर दिया है। इसके साथ ही, आवश्यक सरकारी सहायता के दस्तावेज़ भी बाढ़ में बह गए हैं।
असम के नेपाल कुटी गाँव में बाढ़ के बाद तबाही का मंजर
गोलाघाट जिला के नेपाल कुटी गाँव में आई विनाशकारी बाढ़ ने लोगों की ज़िंदगी एक ही रात में बदल दी। गाँव कनेक्शन की टीम जब गाँव पहुँची तो हर तरफ़ तबाही के निशान दिखाई दिए। कई घर मलबे में तब्दील हो चुके थे, कहीं सिर्फ़ दीवारें बची थीं, तो कहीं गाड़ियाँ पानी और कीचड़ में दबी मिलीं। सड़कों पर मरे हुए मवेशियों से उठती दुर्गंध और उजड़े घर इस आपदा की भयावह तस्वीर बयां कर रहे थे। कई परिवार अब अपने ही गाँव में बेघर होकर रिश्तेदारों या पड़ोसियों के घरों में शरण लेने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ ने केवल घर नहीं उजाड़े, बल्कि उनकी रोज़ी-रोटी भी छीन ली। बच्चों की किताबों से लेकर ज़रूरी दस्तावेज़, कपड़े, अनाज, घरेलू सामान और वर्षों की मेहनत से बनाई गई गृहस्थी सब कुछ पानी में बह गया। जिन परिवारों की आय पशुपालन पर निर्भर थी, उनके लिए यह नुकसान और भी बड़ा है, क्योंकि गाय, बकरियाँ और अन्य पालतू पशु भी बाढ़ की भेंट चढ़ गए। बाढ़ का पानी उतरने के बाद अब लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दोबारा ज़िंदगी शुरू करने की है। उन्हें इस बात की चिंता भी सता रही है कि सरकारी सहायता के लिए जिन दस्तावेज़ों की ज़रूरत होगी, वे भी बाढ़ में बह चुके हैं।
गाँव कनेक्शन से बातचीत में नूरी ने बताया कि उनका घर पूरी तरह तबाह हो गया है। अब केवल कुछ दीवारें ही बची हैं। उन्होंने कहा, "अब किसी और के घर में रहना पड़ रहा है। हमारे घर में कुछ भी नहीं बचा। जो भी था, सब पानी में बह गया।" नूरी ने बताया कि घर का सारा सामान, बच्चों की किताबें, कपड़े, ज़रूरी काग़ज़ात, सोना-चाँदी और यहाँ तक कि परिवार की लाल रंग की ऑल्टो कार भी बाढ़ में बह गई। उन्होंने कहा, "अब हमारे पास कुछ भी नहीं बचा। सिर्फ़ जान बची है।" उनके सामने अब सबसे बड़ी चुनौती परिवार के लिए फिर से एक सुरक्षित घर तैयार करना है।
बाढ़ प्रभावित परिवारों का कहना है कि सरकार राहत और मुआवज़ा देगी, लेकिन उसके लिए पहचान और ज़मीन से जुड़े दस्तावेज़ माँगे जाएँगे। नूरी कहती हैं, "अगर सरकार कुछ मदद करेगी तो सबसे पहले दस्तावेज़ माँगेगी। लेकिन दस्तावेज़ कहाँ से लाएँ? वे भी पानी के साथ बह गए।" ग्रामीणों ने प्रशासन से अपील की है कि ऐसे परिवारों के लिए दस्तावेज़ दोबारा बनवाने की विशेष व्यवस्था की जाए, ताकि राहत पाने में किसी तरह की परेशानी न हो।
![गाँव कनेक्शन की टीम से बात करती नूरी]()
नेपाल कुटी गाँव के अधिकांश परिवारों की आजीविका पशुपालन पर टिकी है। कई घरों में 20 से 30 तक गायें और बड़ी संख्या में बकरियाँ पाली जाती थीं। इन्हीं से मिलने वाले दूध और दुग्ध उत्पादों की बिक्री से परिवारों का खर्च चलता था लेकिन बाढ़ के तेज़ बहाव में बड़ी संख्या में मवेशी बह गए या उनकी मौत हो गई। गाँव कनेक्शन टीम ने गाँव में जगह-जगह मरे हुए पशुओं को देखा। ग्रामीणों का कहना है कि उस समय हालात ऐसे थे कि समझ नहीं आ रहा था कि पहले लोगों को बचाएँ या मवेशियों को। अब पशुधन खत्म होने से उनके सामने रोज़गार का संकट भी खड़ा हो गया है।
ग्रामीणों के अनुसार, 19 जुलाई की रात अचानक पानी का स्तर तेज़ी से बढ़ने लगा। किसी तरह का सायरन या आधिकारिक चेतावनी नहीं मिली। गाँव में लोग एक-दूसरे को आवाज़ देकर सतर्क करते रहे, लेकिन पानी इतनी तेज़ी से बढ़ा कि संभलने का मौका ही नहीं मिला। कई जगह पानी गले तक पहुँच गया था। लोग एक-दूसरे का हाथ पकड़कर महिलाओं, बच्चों और बुज़ुर्गों को सुरक्षित स्थानों तक ले गए। नूरी बताती हैं, "सबसे पहले पुरुष आगे बढ़े, फिर महिलाओं और बच्चों को पकड़कर बाहर निकाला गया। उस समय सिर्फ़ जान बचाना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता थी।"
बाढ़ के बाद कई परिवार राहत शिविरों और रिश्तेदारों के घरों में रह रहे हैं। प्रभावित लोगों का कहना है कि भोजन और पीने के पानी जैसी शुरुआती सहायता मिल रही है और कई सामाजिक संगठन भी मदद के लिए आगे आए हैं। लेकिन घरों के पुनर्निर्माण, पशुधन के नुकसान और आजीविका की बहाली के लिए अभी लंबी मदद की ज़रूरत है। ग्रामीणों का कहना है कि पानी उतर गया है, लेकिन बाढ़ के ज़ख्म अभी भी ताज़ा हैं। वे सरकार से पर्याप्त मुआवज़ा, दस्तावेज़ दोबारा बनवाने की सुविधा, पशुधन के नुकसान का उचित आकलन और स्थायी पुनर्वास की माँग कर रहे हैं, ताकि वे एक बार फिर सामान्य जीवन की शुरुआत कर सकें।
रिपोर्ट: मनीष मिश्रा
फ़ोटो: मोहम्मद आरिफ़
ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ ने केवल घर नहीं उजाड़े, बल्कि उनकी रोज़ी-रोटी भी छीन ली। बच्चों की किताबों से लेकर ज़रूरी दस्तावेज़, कपड़े, अनाज, घरेलू सामान और वर्षों की मेहनत से बनाई गई गृहस्थी सब कुछ पानी में बह गया। जिन परिवारों की आय पशुपालन पर निर्भर थी, उनके लिए यह नुकसान और भी बड़ा है, क्योंकि गाय, बकरियाँ और अन्य पालतू पशु भी बाढ़ की भेंट चढ़ गए। बाढ़ का पानी उतरने के बाद अब लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दोबारा ज़िंदगी शुरू करने की है। उन्हें इस बात की चिंता भी सता रही है कि सरकारी सहायता के लिए जिन दस्तावेज़ों की ज़रूरत होगी, वे भी बाढ़ में बह चुके हैं।
दस्तावेज़ भी बह गए, अब मुआवज़े की चिंता
बाढ़ प्रभावित परिवारों का कहना है कि सरकार राहत और मुआवज़ा देगी, लेकिन उसके लिए पहचान और ज़मीन से जुड़े दस्तावेज़ माँगे जाएँगे। नूरी कहती हैं, "अगर सरकार कुछ मदद करेगी तो सबसे पहले दस्तावेज़ माँगेगी। लेकिन दस्तावेज़ कहाँ से लाएँ? वे भी पानी के साथ बह गए।" ग्रामीणों ने प्रशासन से अपील की है कि ऐसे परिवारों के लिए दस्तावेज़ दोबारा बनवाने की विशेष व्यवस्था की जाए, ताकि राहत पाने में किसी तरह की परेशानी न हो।
गाँव कनेक्शन की टीम से बात करती नूरी
पशुपालन पर सबसे बड़ी मार
गले तक पानी, हाथ पकड़कर बचाई जान
राहत शिविरों में कट रही है ज़िंदगी
रिपोर्ट: मनीष मिश्रा
फ़ोटो: मोहम्मद आरिफ़