Assam Floods: माँ-बाप को बचाने गई बेटी बाढ़ में बह गई, पीछे छूट गए चार बच्चे और उजड़ गया पूरा परिवार
Umang | Aug 05, 2026, 14:56 IST
असम की तबाही भरी बाढ़ ने रिहाना आरा अहमदा की जान ले ली। उन्होंने अपने बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बाद माता-पिता की मदद करने की कोशिश की। लेकिन बाढ़ की तेज धारा उन्हें बचाने नहीं दे पाई और उनकी मृत्यु हो गई। उनके घर का भी बुरा हाल हुआ है और पूरा परिवार अब राहत शिविर में है।
रिहाना आरा अहमदा के पिता रफ़ीकुद्दीन अहमद
Ground Report: असम में आई विनाशकारी बाढ़ ने न सिर्फ़ घर और ज़मीन छीनी, बल्कि कई परिवारों से उनके अपने भी छीन लिए। ऐसी ही एक दर्दनाक कहानी है गोलाघाट की रिहाना आरा अहमदा की जिन्होंने अपने चार बच्चों को सुरक्षित जगह छोड़ने के बाद अपने माँ-बाप को बचाने के लिए उफ़नते पानी में वापस जाने का फ़ैसला किया। उन्हें तैरना आता था, लेकिन तेज़ बहाव के सामने उनकी हिम्मत भी हार गई और उनकी जान चली गई।
रिहाना की मौत के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। बाढ़ में घर तबाह हो गया, सामान बह गया और अब पूरा परिवार राहत शिविर में रहने को मजबूर है। बेटी को खोने का ग़म आज भी पिता, पति और बच्चों की आँखों से छलक पड़ता है।
रिहाना आरा अहमदा के पिता रफ़ीकुद्दीन अहमद ने गाँव कनेक्शन को बताया कि बाढ़ का पानी अचानक समुद्र की लहरों की तरह तेज़ी से गाँव में घुस आया। हालात इतने ख़राब हो गए कि लोगों को अपनी जान बचाना मुश्किल हो गया। इसी दौरान रिहाना ने अपने बच्चों को सुरक्षित स्थान पर छोड़ा और अपने माँ-बाप को बचाने के लिए वापस पानी में उतर गईं। उन्हें तैरना आता था, इसलिए उन्हें लगा कि वे सुरक्षित लौट आएँगी, लेकिन तेज़ बहाव उन्हें अपने साथ बहा ले गया। रफ़ीकुद्दीन अहमद कहते हैं, "जब बेटी का शव देखा तो रोना भी नहीं आया। ऐसा लगा जैसे मैं ज़िंदा होकर भी जिंदा लाश बन गया हूँ।"
रिहाना की नाबालिग बेटी नैनाज बताती हैं कि उनकी माँ ने जाते समय सिर्फ़ इतना कहा था, "तुम लोग अच्छे से रहना, मैं नाना-नानी को लेकर आती हूँ। बाहर मत निकलना।" नैनाज कहती हैं, "मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं अपनी मम्मी को हमेशा के लिए खो दूँगी।"
रिहाना के पति हक़ पेशे से बढ़ई (कारपेंटर) हैं। उन्होंने बताया कि बाढ़ आने पर वे बच्चों को सुरक्षित जगह छोड़कर घर से ज़रूरी काग़ज़ात निकालने लौटे थे। तभी लोगों ने आवाज़ लगाकर बताया कि उनकी पत्नी पानी में डूब गई हैं। हक़ कहते हैं, "मैं दौड़कर पहुँचा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। घर भी चला गया और पत्नी भी। अब समझ नहीं आता कि ज़िंदगी कैसे आगे बढ़ेगी।"
बाढ़ में परिवार का घर पूरी तरह तबाह हो गया। घर का कोई सामान नहीं बचा। कुछ दिनों तक शव को दफ़नाने की जगह भी नहीं मिल सकी। बाद में दूसरे गाँव के लोगों की मदद से रिहाना को दफ़नाया गया। आज पूरा परिवार राहत शिविर में रह रहा है, जहाँ खुले में खाना बनता है और अस्थायी टेंट ही उनका आशियाना है। रफ़ीकुद्दीन अहमद कहते हैं, "हम तो किसी तरह बच गए, लेकिन हमें बचाने वाली हमारी बेटी चली गई। अब न घर है, न रोज़गार और न ही पहले जैसी ज़िंदगी।"
रिहाना की मौत के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। बाढ़ में घर तबाह हो गया, सामान बह गया और अब पूरा परिवार राहत शिविर में रहने को मजबूर है। बेटी को खोने का ग़म आज भी पिता, पति और बच्चों की आँखों से छलक पड़ता है।