Assam Floods: ‘नदी फिर आएगी...’ लोगों की ज़िदगी में हर दिन लौट आता है उजड़ने का डर, बाढ़ का पानी उतर गया लेकिन दहशत आज भी ज़िदा है
Mansi | Aug 06, 2026, 12:09 IST
शिवसागर ज़िले में बाढ़ ने ना केवल घरों को, बल्कि लोगों के आत्मविश्वास को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। हर बारिश के बाद, लोग एक नए डर के साए में जीने को मजबूर हैं, जो कुछ ही पलों में उनकी दुनिया को उजाड़ देती है। यह बाढ़ सिर्फ भौतिक क्षति नहीं लाई, बल्कि उन गाँवों और सपनों को भी बहा ले गई है, जो वर्षों से अस्तित्व में थे।
बाढ़ का पानी उतर गया, लेकिन अपने ही गाँव में लौटने का डर अब भी लोगों की ज़िंदगी पर भारी है।
किसी का घर टूट जाए तो वह दोबारा बन सकता है, लेकिन जब घर के साथ ज़मीन पर भरोसा भी टूट जाए, तब ज़िंदगी पहले जैसी नहीं रहती। असम के शिवसागर ज़िले में बाढ़ से प्रभावित परिवारों की सबसे बड़ी परेशानी अब राहत सामग्री नहीं, बल्कि वह डर है जो हर दिन नदी के साथ बढ़ता जा रहा है। लोगों का कहना है कि पानी उतर गया है, लेकिन मन से बाढ़ अब तक नहीं उतरी।
गाँव कनेक्शन की ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान जब टीम प्रभावित इलाक़ों में पहुँची, तो लोगों की आँखों में राहत से ज़्यादा डर दिखाई दिया। वे बार-बार नदी की ओर देखते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि जिसने एक बार उनका सब कुछ छीन लिया, वह फिर लौट सकती है। उनके लिए अब हर बारिश सिर्फ़ मौसम नहीं, बल्कि एक ख़ौफ़ का नाम है।
![प्रकाश के लिए बाढ़ सिर्फ़ घर नहीं, बल्कि सुरक्षित भविष्य का भरोसा भी बहा ले गई।]()
शिवसागर ज़िले के नेपाल कुटी गाँव के रहने वाले विकास उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, "धीरे-धीरे पानी बढ़ रहा था। किसी ने नहीं सोचा था कि एक घंटे के भीतर पूरा गाँव ख़त्म हो जाएगा। घुटनों तक पहुँचा पानी कब कमर और फिर सिर तक पहुँच गया, किसी को समझने का मौक़ा ही नहीं मिला।" उनकी आवाज़ में आज भी वही घबराहट महसूस होती है। जिस जगह कभी बच्चों की आवाज़ें गूँजती थीं, वहाँ अब नदी का बहाव है। लगभग 40 घर इस कटाव में समा चुके हैं।
बाढ़ की उस दोपहर हर कोई अपनी तरह से ज़िंदगी बचाने की कोशिश कर रहा था। प्रकाश बताते हैं, ‘पहले लगा सामान बचा लेंगे, लेकिन पानी इतनी तेज़ी से आया कि सब छोड़ना पड़ा। पानी में तैरते बॉक्स पलंग पर परिवार को बैठाया। भाई से कहा, किसी तरह छत तक पहुँचा दो। मैं तख़्त के सहारे पत्नी और दोनों बच्चों को लेकर पानी में उतरा। उस समय सिर्फ़ एक ही बात थी किसी तरह बच्चे बच जाएँ। आज भी वह पल याद करते हुए उनकी आँखें भर आती हैं।’
![तबाही के बाद का मंजर]()
गाँव वालों के अनुसार, नागालैंड से आने वाली यह नदी पहले काफ़ी दूर बहती थी। इस बार तेज़ कटाव ने उसका रास्ता बदल दिया। जहाँ कभी खेत और आँगन थे, वहाँ अब नदी बह रही है। विकास कहते हैं, ‘पहले नदी लगभग 30 फ़ुट दूर थी। अब वहीं है जहाँ हमारा घर था।’ राहत शिविरों से लौटने के बाद भी लोग अपने पुराने घरों में लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। प्रकाश ने कहा, "अगर सड़क के पास कहीं थोड़ी-सी ज़मीन मिल जाए तो वहीं बस जाएँगे। अब यहाँ रहने की हिम्मत नहीं है। डर लगता है कि नदी फिर आएगी। यह सिर्फ़ घर बदलने की बात नहीं, बल्कि पीढ़ियों से बसे अपने गाँव को छोड़ने की मजबूरी है।
गाँव में राहत सामग्री पहुँच रही है। बिजली के खंभे दोबारा लगाए जा रहे हैं। लेकिन लोग कहते हैं कि सबसे ज़्यादा ज़रूरत भरोसे की है। विकास नदी की ओर देखते हुए कहते हैं, ‘आज भी पानी बढ़ रहा है। डर लगता है कि कहीं फिर पहले जैसा न हो जाए।’ शिवसागर के इन गाँवों में बाढ़ सिर्फ़ मकान नहीं बहाकर ले गई, बल्कि लोगों का भविष्य भी अनिश्चित कर गई। अब हर बादल, हर तेज़ बारिश और नदी की हर बढ़ती लहर उन्हें उसी एक घंटे की याद दिलाती है, जब उनकी पूरी दुनिया बह गई थी।
गाँव कनेक्शन की इस ग्राउंड रिपोर्ट में सबसे बड़ी कहानी टूटी हुई दीवारों की नहीं, बल्कि उन लोगों की है जो आज भी अपने बच्चों को सुलाते समय यही सोचते हैं-अगर आज रात नदी फिर बढ़ गई, तो इस बार कहाँ जाएँगे?
रिपोर्ट: मनीष मिश्रा
फ़ोटो: मोहम्मद आरिफ़
गाँव कनेक्शन की ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान जब टीम प्रभावित इलाक़ों में पहुँची, तो लोगों की आँखों में राहत से ज़्यादा डर दिखाई दिया। वे बार-बार नदी की ओर देखते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि जिसने एक बार उनका सब कुछ छीन लिया, वह फिर लौट सकती है। उनके लिए अब हर बारिश सिर्फ़ मौसम नहीं, बल्कि एक ख़ौफ़ का नाम है।
प्रकाश के लिए बाढ़ सिर्फ़ घर नहीं, बल्कि सुरक्षित भविष्य का भरोसा भी बहा ले गई।
एक घंटे में पूरा गाँव ख़त्म हो गया
बाढ़ की उस दोपहर हर कोई अपनी तरह से ज़िंदगी बचाने की कोशिश कर रहा था। प्रकाश बताते हैं, ‘पहले लगा सामान बचा लेंगे, लेकिन पानी इतनी तेज़ी से आया कि सब छोड़ना पड़ा। पानी में तैरते बॉक्स पलंग पर परिवार को बैठाया। भाई से कहा, किसी तरह छत तक पहुँचा दो। मैं तख़्त के सहारे पत्नी और दोनों बच्चों को लेकर पानी में उतरा। उस समय सिर्फ़ एक ही बात थी किसी तरह बच्चे बच जाएँ। आज भी वह पल याद करते हुए उनकी आँखें भर आती हैं।’
तबाही के बाद का मंजर
नदी ने सिर्फ़ घर नहीं, भविष्य भी बहा दिया
राशन मिल रहा है, लेकिन चैन नहीं
गाँव कनेक्शन की इस ग्राउंड रिपोर्ट में सबसे बड़ी कहानी टूटी हुई दीवारों की नहीं, बल्कि उन लोगों की है जो आज भी अपने बच्चों को सुलाते समय यही सोचते हैं-अगर आज रात नदी फिर बढ़ गई, तो इस बार कहाँ जाएँगे?
रिपोर्ट: मनीष मिश्रा
फ़ोटो: मोहम्मद आरिफ़