Assam Floods: साल के छह महीने पानी से घिरा रहता है नेपाल कुटी गाँव, जानिए कैसे कटती है लोगों की ज़िंदगी

Mansi | Aug 05, 2026, 12:23 IST
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शिवसागर ज़िले के नेपाल कुटी गाँव में बाढ़ ने जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। यहाँ हर जगह पानी ही पानी है और पारिवारिक जीवन के लिए नाव का भरोसा ही रह गया है। बाढ़ ने न सिर्फ घरों को बल्कि अनाज और जरूरी सामान को भी निगल लिया है, फिर भी लोगों की मेहमाननवाज़ी की परंपरा थमी नहीं है।

6 महीने तक पानी में डूबा रहता है नेपालकुटी गाँव
6 महीने तक पानी में डूबा रहता है नेपालकुटी गाँव
सुबह होते ही यहाँ किसी वाहन की आवाज़ नहीं सुनाई देती। चारों ओर फैले पानी के बीच चप्पू चलने की आवाज़ और नावों की हलचल से दिन की शुरुआत होती है। सड़कों की जगह पानी है, खेतों में भी पानी है और घरों के आँगनों में भी पानी ही पानी नज़र आता है। असम के शिवसागर ज़िले के नेपाल कुटी गाँव हर साल लगभग छह महीने तक पानी से घिरा रहता है, लेकिन इस बार आई बाढ़ ने ज़िंदगी को पहले से कहीं ज़्यादा कठिन बना दिया है।

किसी के कच्चे घर की दीवार ढह गई, किसी की पूरी गृहस्थी पानी में बह गई और कई परिवार आज भी अपने आधे डूबे घरों में रहने को मजबूर हैं। गाँव कनेक्शन की टीम जब नेपाल कुटी गाँव पहुँची, तो यहाँ सिर्फ़ बाढ़ का पानी नहीं, बल्कि हर चेहरे पर थकान, चिंता और फिर भी कहीं न कहीं बची हुई उम्मीद दिखाई दी। गाँव के लोगों के लिए बाढ़ सिर्फ़ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हर साल दोहराई जाने वाली ऐसी सच्चाई है, जिसके साथ उन्हें जीना सीखना पड़ता है।

नाव ही गाँव तक पहुँचने का एकमात्र सहारा

नेपाल कुटी गाँव तक पहुँचना किसी चुनौती से कम नहीं है। गाँव कनेक्शन की टीम को कई किलोमीटर तक नाव से सफ़र करना पड़ा। रास्ते में यह समझना मुश्किल था कि कहाँ सड़क है, कहाँ खेत और कहाँ नदी। दूर-दूर तक सिर्फ़ पानी दिखाई देता है। कई गाँव पूरी तरह बाहरी दुनिया से कट चुके हैं और यहाँ तक पहुँचने का एकमात्र सहारा नाव है। यही नाव यहाँ एम्बुलेंस भी है, बच्चों के स्कूल जाने का साधन भी और राहत पहुँचाने का ज़रिया भी। किसी बीमार को अस्पताल ले जाना हो, बच्चों के लिए दूध पहुँचाना हो या राशन और दवाइयाँ, हर ज़रूरत नाव के सहारे ही पूरी हो रही है।

'कमर से ऊपर तक पानी था, आँखों के सामने लाशें देखीं'- दिव्यांशु

बनारस से राहत कार्य के लिए पहुँचे स्वयंसेवक दिव्यांशु पिछले कई दिनों से बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में काम कर रहे हैं। वह बताते हैं कि जब बाढ़ अपने चरम पर थी, तब कई जगह कमर से ऊपर तक पानी भर गया था। दिव्यांशु कहते हैं, "हमने अपनी आँखों के सामने लाशें देखीं। कई गाँव पूरी तरह पानी में डूब गए थे। आज भी ऐसे गाँव हैं, जहाँ छोटी-सी राहत सामग्री पहुँचाने के लिए भी नाव ही एकमात्र सहारा है।" उनके मुताबिक़, कई परिवार आज भी ऐसे इलाक़ों में रह रहे हैं, जहाँ सड़क का कोई संपर्क नहीं बचा है।

गाँव कनेक्शन की टीम से बातचीत करते दिव्यांशु
गाँव कनेक्शन की टीम से बातचीत करते दिव्यांशु

सब कुछ बह गया, लेकिन मेहमाननवाज़ी नहीं

जब गाँव कनेक्शन ने जब ग्रामीणों से पूछा कि वे सुरक्षित जगह क्यों नहीं चले जाते, तो जवाब ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया। ग्रामीणों का कहना था, "हम जाएँ भी तो कहाँ जाएँ? घर में जो थोड़ा-बहुत सामान बचा है, उसे छोड़ दें तो फिर लौटकर क्या मिलेगा? सड़कें भी पानी में डूबी हैं और राहत शिविर हर किसी के लिए नहीं हैं।" इसी मजबूरी ने लोगों को अपने आधे डूबे घरों में रुकने पर विवश कर दिया है। उनके लिए घर सिर्फ़ रहने की जगह नहीं, बल्कि जीवनभर की मेहनत की कमाई है।

बाढ़ लोगों के घर, अनाज और सामान बहाकर ले गई, लेकिन उनकी संस्कृति और आत्मीयता नहीं छीन सकी। गाँव कनेक्शन की टीम के साथ पहुँचे स्वयंसेवकों ने बताया कि जिन परिवारों के पास खाने के लिए भी बहुत कम बचा है, वे भी मेहमानों का स्वागत तांबूल (पान-सुपारी) देकर करते हैं। असम की यह परंपरा आज भी यहाँ ज़िंदा है। मुश्किलों के बीच भी अपनेपन का यह भाव हर किसी को भावुक कर देता है।

तांबूल से स्वागत करते नेपाल कुटी गाँव के ग्रामीण
तांबूल से स्वागत करते नेपाल कुटी गाँव के ग्रामीण

अब राशन नहीं, सूखे कपड़े और दवाइयाँ सबसे बड़ी ज़रूरत

शुरुआती दिनों में सबसे बड़ी ज़रूरत राशन और पीने के पानी की थी। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। लगातार पानी में रहने से लोगों के पैरों की त्वचा गलने लगी है। कई लोगों के पैरों में घाव हो गए हैं। महिलाओं के पास बदलने के लिए सूखे कपड़े नहीं हैं। कई परिवार गीली ज़मीन पर बिना गद्दे के रात गुज़ार रहे हैं। राहतकर्मियों के मुताबिक़, अब मच्छरदानियाँ, गद्दे, सूखे कपड़े, चप्पल और दवाइयाँ सबसे ज़्यादा ज़रूरी हैं। पानी उतरने के बाद त्वचा संबंधी बीमारियों और संक्रमण का ख़तरा भी बढ़ सकता है।

गोद में मासूम, मदद का इंतज़ार करती माँ
गोद में मासूम, मदद का इंतज़ार करती माँ

6 महीने पानी के बीच गुजरती है ज़िंदगी

नेपाल कुटी गाँव के लोगों के लिए बाढ़ कोई एक मौसम नहीं, बल्कि हर साल की सच्चाई है। स्थानीय लोगों के मुताबिक़, यहाँ लगभग 6 महीने तक गाँव पानी से घिरा रहता है। बच्चों की पढ़ाई, रोज़मर्रा की ज़रूरतें, इलाज, खेती और आवाजाही सब कुछ नाव के भरोसे चलता है। लगभग हर घर में नाव है, क्योंकि उसके बिना ज़िंदगी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस बार बाढ़ ने हालात और गंभीर कर दिए हैं। खेत डूब गए हैं, रोज़गार ठप हो गया है और लोगों के सामने आने वाले महीनों की चिंता खड़ी है। पानी उतरने के बाद भी सबसे बड़ी चुनौती अपनी बिखरी हुई ज़िंदगी को फिर से बसाने की होगी।

पानी के बीच भी उम्मीद ज़िंदा है

नेपाल कुटी गाँव में आज भी हर सुबह नाव की आहट लोगों के लिए उम्मीद लेकर आती है। कोई नाव राशन लेकर आती है, कोई दवाइयाँ, तो कोई यह भरोसा कि मुश्किल की इस घड़ी में वे अकेले नहीं हैं। बाढ़ ने सब कुछ छीन लिया है, लेकिन लोगों का हौसला अब भी नहीं टूटा। यहाँ के लोग हर साल पानी से लड़ते हैं, फिर अपने घर सँवारते हैं और नई शुरुआत करते हैं। शायद यही वजह है कि नेपाल कुटी गाँव में आज भी सबसे बड़ी ताक़त पानी नहीं, बल्कि उम्मीद है। यही उम्मीद लोगों को हर मुश्किल के बाद फिर से खड़े होने का साहस देती है।

रिपोर्ट: मनीष मिश्रा

फ़ोटो: मोहम्मद आरिफ़
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