Azolla Farming: धान की खेती में अजोला का कमाल, खाद का खर्च घटेगा, मिट्टी बनेगी उपजाऊ, बढ़ेगा किसानों का मुनाफा
Preeti Nahar | Jun 07, 2026, 13:20 IST
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), सांबा ने धान उत्पादक किसानों को अजोला अपनाने की सलाह दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह प्राकृतिक जैव उर्वरक मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, रासायनिक खादों की खपत कम करने और उत्पादन बढ़ाने में मदद करता है। अजोला के उपयोग से खेती की लागत घटाई जा सकती है, साथ ही पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि को भी बढ़ावा मिलता है।
धान के खेत में तैरता हुआ अजोला
खेती की बढ़ती लागत आज किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। खासकर रासायनिक खादों के बढ़ते दामों ने धान की खेती को महंगा बना दिया है। ऐसे में किसान ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं, जो लागत कम करने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत भी बनाए रखें।
इसी कड़ी में कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), सांबा, शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST-Jammu) ने किसानों को धान की खेती में अजोला के इस्तेमाल की सलाह दी है। केंद्र के वैज्ञानिकों का कहना है कि अजोला एक प्राकृतिक जैव उर्वरक है, जो रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने के साथ उत्पादन बढ़ाने में भी मदद कर सकता है।
अजोला एक तरह का जलजीवी फर्न है, जो प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिर करके धान की फसल को पोषण देता है। इसके इस्तेमाल से रासायनिक खादों की जरूरत 25 से 30 प्रतिशत तक कम हो सकती है। साथ ही मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है और खेती की लागत घटाकर किसानों का मुनाफा बढ़ाया जा सकता है।
अजोला एक छोटा हरा जलजीवी पौधा है, जो पानी की सतह पर तेजी से फैलता है। इसकी खास बात यह है कि ये वातावरण से नाइट्रोजन लेकर उसे मिट्टी में मिलाता है। यही कारण है कि इसे प्राकृतिक जैव उर्वरक के रूप में देखा जाता है। धान की खेती में इसका उपयोग वर्षों से किया जा रहा है, लेकिन अब बढ़ती खेती लागत और टिकाऊ कृषि की जरूरत के कारण इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
धान की रोपाई के कुछ दिनों बाद खेत में जीवित अजोला छोड़ा जाता है। यह पानी की सतह पर फैलकर धीरे-धीरे नाइट्रोजन छोड़ता रहता है, जिससे धान के पौधों को लगातार पोषण मिलता है।
हरी खाद की तरह करता है काम- इसके अलावा जब अजोला सड़ता है, तो यह हरी खाद का काम करता है और खेत में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाता है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और फसल की बढ़वार मजबूत होती है।
रासायनिक खाद पर निर्भरता होगी कम- अजोला के नियमित उपयोग से यूरिया और अन्य रासायनिक खादों की आवश्यकता 25 से 30 प्रतिशत तक कम की जा सकती है। इसका सीधा फायदा किसानों की जेब पर पड़ता है। खाद पर होने वाला खर्च घटता है और खेती अधिक लाभकारी बनती है। साथ ही मिट्टी पर रासायनिक दबाव भी कम होता है।
खरपतवार नियंत्रण में भी मददगार- धान के खेत में खरपतवार एक बड़ी समस्या होती है। लेकिन जब अजोला पानी की सतह को ढक लेता है, तो सूर्य की रोशनी नीचे तक नहीं पहुंच पाती। नतीजतन खरपतवारों का विकास कम हो जाता है। इससे किसानों को अतिरिक्त निराई-गुड़ाई पर कम खर्च करना पड़ता है और श्रम लागत भी घटती है।
पशुओं के लिए भी है पौष्टिक आहार- अजोला केवल खेत तक सीमित नहीं है। इसमें 20 से 30 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है, इसलिए इसे पशुओं के लिए पौष्टिक चारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। दूध देने वाले पशुओं को अजोला खिलाने से दूध उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सकती है। यही वजह है कि कई किसान इसे खेती और पशुपालन दोनों में उपयोग कर रहे हैं।
अजोला उत्पादन के लिए बहुत ज्यादा जगह या निवेश की जरूरत नहीं होती। किसान छोटे टैंक, गड्ढे या प्लास्टिक लाइनिंग वाले बेड में इसे तैयार कर सकते हैं। इसके लिए उथले टैंक में पानी भरकर थोड़ी मिट्टी और गोबर मिलाया जाता है। फिर उसमें अजोला कल्चर डाला जाता है। कुछ ही दिनों में यह तेजी से बढ़ने लगता है और उपयोग के लिए तैयार हो जाता है।
जहां एक ओर रासायनिक खादों का अधिक उपयोग मिट्टी और जल स्रोतों को नुकसान पहुंचाता है, वहीं अजोला पूरी तरह प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल विकल्प है। यह कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद करता है, मिट्टी की जैविक सक्रियता बढ़ाता है और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देता है। इसलिए वैज्ञानिक इसे भविष्य की खेती का जरूरी और उपयोगी हिस्सा मान रहे हैं।
इसी कड़ी में कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), सांबा, शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST-Jammu) ने किसानों को धान की खेती में अजोला के इस्तेमाल की सलाह दी है। केंद्र के वैज्ञानिकों का कहना है कि अजोला एक प्राकृतिक जैव उर्वरक है, जो रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने के साथ उत्पादन बढ़ाने में भी मदद कर सकता है।
अजोला एक तरह का जलजीवी फर्न है, जो प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिर करके धान की फसल को पोषण देता है। इसके इस्तेमाल से रासायनिक खादों की जरूरत 25 से 30 प्रतिशत तक कम हो सकती है। साथ ही मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है और खेती की लागत घटाकर किसानों का मुनाफा बढ़ाया जा सकता है।
क्या है अजोला और क्यों बढ़ रही इसकी लोकप्रियता?
सांबा-KVK ने धान उत्पादक किसानों को अजोला अपनाने की सलाह दी
धान के खेत में कैसे काम करता है अजोला?
धान के खेत में तैरता हुआ अजोला
हरी खाद की तरह करता है काम- इसके अलावा जब अजोला सड़ता है, तो यह हरी खाद का काम करता है और खेत में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाता है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और फसल की बढ़वार मजबूत होती है।
रासायनिक खाद पर निर्भरता होगी कम- अजोला के नियमित उपयोग से यूरिया और अन्य रासायनिक खादों की आवश्यकता 25 से 30 प्रतिशत तक कम की जा सकती है। इसका सीधा फायदा किसानों की जेब पर पड़ता है। खाद पर होने वाला खर्च घटता है और खेती अधिक लाभकारी बनती है। साथ ही मिट्टी पर रासायनिक दबाव भी कम होता है।
खरपतवार नियंत्रण में भी मददगार- धान के खेत में खरपतवार एक बड़ी समस्या होती है। लेकिन जब अजोला पानी की सतह को ढक लेता है, तो सूर्य की रोशनी नीचे तक नहीं पहुंच पाती। नतीजतन खरपतवारों का विकास कम हो जाता है। इससे किसानों को अतिरिक्त निराई-गुड़ाई पर कम खर्च करना पड़ता है और श्रम लागत भी घटती है।
पशुओं के लिए भी है पौष्टिक आहार- अजोला केवल खेत तक सीमित नहीं है। इसमें 20 से 30 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है, इसलिए इसे पशुओं के लिए पौष्टिक चारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। दूध देने वाले पशुओं को अजोला खिलाने से दूध उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सकती है। यही वजह है कि कई किसान इसे खेती और पशुपालन दोनों में उपयोग कर रहे हैं।
ऐसे तैयार कर सकते हैं अजोला
सीमेंट टैंक या पॉलीथीन लाइनिंग वाले गड्ढे में अजोला उत्पादन