मुफ्त चावल योजना से संकट में बंगाल की राइस मिलें! कई यूनिट बंद होने की कगार पर, मालिकों ने सरकार से लगाई ये गुहार
Gaon Connection | May 18, 2026, 10:42 IST
पश्चिम बंगाल का चावल उद्योग नई सरकार से बेहतर सुविधाओं की उम्मीद कर रहा है। उद्योग को उम्मीद है कि सरकार बुनियादी ढांचे को सुधारेगी और मंजूरी प्रक्रिया को तेज करेगी। इससे राज्य के चावल उद्योग को बढ़ावा मिलेगा और निर्यात बढ़ेगा। प्रीमियम चावल किस्मों की ब्रांडिंग से वैश्विक पहचान मजबूत होगी।
राइस मिलों पर बढ़ा आर्थिक दबाव
पश्चिम बंगाल के चावल उद्योग ने राज्य में नई सरकार से बेहतर बुनियादी ढांचा, तेज मंजूरी प्रक्रिया और निर्यात को बढ़ावा देने की मांग की है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर सरकार जरूरी सुविधाएं और मजबूत नीतिगत समर्थन दे, तो राज्य का चावल उद्योग तेजी से आगे बढ़ सकता है और निवेश में बढ़ोतरी हो सकती है। राइसविला फूड्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सूरज अग्रवाल ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में राइस मिल और गोदामों के लिए बुनियादी ढांचे की स्थिति अभी भी कमजोर है। खराब सड़कें, जल निकासी की कमी और बिजली कनेक्शन मिलने में देरी से उद्योग को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि कई ग्रामीण जिलों में नई राइस मिलों को बिजली कनेक्शन मिलने में महीनों लग जाते हैं। इससे परियोजनाओं की लागत बढ़ जाती है और उद्योगपतियों को अनावश्यक परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। उद्योग को उम्मीद है कि नई सरकार इस दिशा में तेजी से काम करेगी।
सूरज अग्रवाल ने कहा कि देश में सालाना चावल उत्पादन 1500 लाख टन के पार पहुंच चुका है, जबकि सरकारी गोदामों में 590 लाख टन से ज्यादा चावल का भंडार मौजूद है। ऐसे में आधुनिक भंडारण और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था की जरूरत पहले से ज्यादा बढ़ गई है। उद्योग ने लाइसेंस और मंजूरी प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम लागू करने की भी मांग की है, ताकि कागजी प्रक्रिया कम हो और काम तेजी से हो सके।
उद्योग जगत ने एक समर्पित “राइस इंडस्ट्री डेवलपमेंट बोर्ड” बनाने की मांग भी की है। उनका कहना है कि इससे किसान, मिल मालिक, निर्यातक और सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बन सकेगा और पूरे उद्योग का विकास होगा। उद्योग अधिकारियों के अनुसार 2025 में भारत के चावल निर्यात में करीब 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। निर्यात प्रतिबंधों में ढील मिलने के बाद देश का कुल चावल निर्यात लगभग 215 लाख टन तक पहुंच गया।
भारत इस समय दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है और वैश्विक चावल व्यापार में उसकी हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है। दुनिया में हर साल होने वाले लगभग 550 लाख टन चावल व्यापार में भारत अकेले 200 लाख टन से ज्यादा निर्यात करता है। उद्योग ने पूर्वी भारत से निर्यात बढ़ाने के लिए बेहतर रेल और बंदरगाह कनेक्टिविटी की जरूरत पर भी जोर दिया है।
पश्चिम बंगाल की मशहूर प्रीमियम चावल किस्में “गोबिंदो भोग” और “तुलाई पंजी” घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। इन दोनों किस्मों को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग भी मिला हुआ है। उद्योग का कहना है कि अगर सरकार इन प्रीमियम किस्मों की ब्रांडिंग और प्रचार पर ध्यान दे, तो निर्यात में बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है और “बंगाल राइस” की वैश्विक पहचान मजबूत होगी।
वहीं West Bengal Rice Mills Owners Association के अध्यक्ष सुशील के चौधरी ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार की मुफ्त चावल योजनाओं की वजह से राज्य की राइस मिलों की हालत अच्छी नहीं है। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में लोग मुफ्त चावल योजना का लाभ ले रहे हैं, जिससे खुले बाजार में चावल की मांग प्रभावित हो रही है और राइस मिल मालिकों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है। सुशील के चौधरी के अनुसार पश्चिम बंगाल में करीब 1500 राइस मिलें हैं। इनमें से लगभग 550 सरकारी खरीद में शामिल हैं, जबकि बाकी निजी विपणन और निर्यात का काम करती हैं। लगातार घाटे की वजह से बड़ी संख्या में मिलें पहले ही बंद हो चुकी हैं।
उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि पश्चिम बंगाल भारत के कुल चावल उत्पादन में करीब 150 लाख टन का योगदान देता है, लेकिन इसका बहुत छोटा हिस्सा ही सीधे निर्यात बाजार तक पहुंच पाता है। सही ब्रांडिंग और निर्यात प्रोत्साहन से राज्य को 90 हजार करोड़ रुपये से अधिक के भारतीय चावल निर्यात बाजार में बड़ी हिस्सेदारी मिल सकती है।
बढ़ते उत्पादन के बीच आधुनिक भंडारण की जरूरत
राइस इंडस्ट्री डेवलपमेंट बोर्ड बनाने की मांग
दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है भारत
बंगाल की प्रीमियम चावल किस्मों की बढ़ रही मांग
मुफ्त चावल योजना से मिल मालिकों पर बढ़ा दबाव
उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि पश्चिम बंगाल भारत के कुल चावल उत्पादन में करीब 150 लाख टन का योगदान देता है, लेकिन इसका बहुत छोटा हिस्सा ही सीधे निर्यात बाजार तक पहुंच पाता है। सही ब्रांडिंग और निर्यात प्रोत्साहन से राज्य को 90 हजार करोड़ रुपये से अधिक के भारतीय चावल निर्यात बाजार में बड़ी हिस्सेदारी मिल सकती है।