कार्बन क्रेडिट क्या है; इसे कैसे बेचा जाता है, जानें इससे कितनी हो सकती है कमाई?
Gaon Connection | Apr 06, 2026, 17:50 IST
खेती से कमाई का नया रास्ता खुला है। किसान कार्बन क्रेडिट बनाकर अतिरिक्त आमदनी कर सकते हैं। बड़ी कंपनियां प्रदूषण कम दिखाने के लिए ये क्रेडिट खरीदती हैं। खेती में बदलाव से मीथेन गैस का उत्सर्जन कम होता है, जो कार्बन क्रेडिट में बदल जाता है। किसान सीधे क्रेडिट नहीं बेच सकते, उन्हें कंपनियों से जुड़ना होता है।
कार्बन क्रेडिट
बदलते मौसम और बढ़ते प्रदूषण के बीच अब खेती से भी कमाई का एक नया रास्ता खुल रहा है, जिसे कार्बन क्रेडिट कहा जाता है। दुनिया भर की बड़ी कंपनियां अपने प्रदूषण को कम दिखाने के लिए ऐसे लोगों से कार्बन क्रेडिट खरीद रही हैं, जो खेती या अन्य तरीकों से कार्बन उत्सर्जन कम कर रहे हैं। ऐसे में किसानों के लिए यह अतिरिक्त आमदनी का नया ज़रिया बन सकता है।
कार्बन क्रेडिट का मतलब है एक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करना या उसे मिट्टी में रोकना। खेती में कुछ बदलाव करके किसान यह क्रेडिट बना सकते हैं। जैसे धान की खेती में कम पानी का इस्तेमाल, सीधी बुवाई, कम जुताई, पराली प्रबंधन और AWD (Alternate Wetting and Drying) जैसी तकनीक अपनाने से मीथेन गैस का उत्सर्जन कम होता है। यही बचत कार्बन क्रेडिट में बदल जाती है। एक तरह से यह एक “सर्टिफिकेट” है, जो बताता है कि आपने प्रदूषण कम किया है।
इसे खरीदा, बेचा या इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर कोई कंपनी या संस्था एक तय सीमा से कम प्रदूषण करती है, तो उसके पास कुछ अतिरिक्त कार्बन क्रेडिट बच जाते हैं। इन क्रेडिट को वह दूसरी कंपनियों को बेच सकती है या भविष्य के लिए रख सकती है। जब कोई कंपनी यह क्रेडिट खरीदती है, तो वह असल में प्रदूषण करने का अधिकार खरीद रही होती है। कार्बन क्रेडिट तभी बनते हैं जब सच में प्रदूषण कम किया गया हो। यह कमी छोटे-छोटे कामों से भी हो सकती है, जैसे कम यात्रा करना या मशीनों को बंद रखना।
किसान सीधे कार्बन क्रेडिट नहीं बेच सकते। इसके लिए उन्हें किसी कंपनी, संस्था या FPO (किसान उत्पादक संगठन) से जुड़ना होता है। किसान अपनी जमीन की जानकारी देते हैं और नई खेती पद्धतियां अपनाते हैं। इसके बाद सैटेलाइट, मिट्टी परीक्षण और मोबाइल ऐप के जरिए डेटा रिकॉर्ड किया जाता है, जिसे MRV (Monitoring, Reporting and Verification) कहा जाता है। थर्ड पार्टी जांच के बाद कार्बन क्रेडिट जारी होता है। फिर यह क्रेडिट कंपनियां बड़ी वैश्विक कंपनियों को बेचती हैं और उसका एक हिस्सा किसानों को मिलता है।
भारत में इस क्षेत्र में कुछ प्रमुख कंपनियां काम कर रही हैं, जैसे Varaha, Grow Indigo और Boomitra। ये कंपनियां किसानों को अपने प्रोग्राम से जोड़कर कार्बन क्रेडिट तैयार करती हैं और फिर इन्हें बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को बेचती हैं, जो अपने कार्बन उत्सर्जन को संतुलित करने के लिए इन क्रेडिट्स को खरीदती हैं।
एक एकड़ जमीन से साल में करीब एक कार्बन क्रेडिट मिल सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत लगभग 10 से 40 डॉलर तक होती है। यानी किसान प्रति एकड़ सालाना ₹800 से ₹3000 या कुछ मामलों में ₹6000 तक अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं। हालांकि, पूरा पैसा किसान को नहीं मिलता क्योंकि इसमें रजिस्ट्रेशन, वेरिफिकेशन और अन्य खर्च शामिल होते हैं। किसानों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भुगतान में देरी हो सकती है और सही डेटा देना जरूरी है, वरना क्रेडिट नहीं बनेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि कार्बन क्रेडिट खेती की मुख्य आय नहीं बल्कि एक अतिरिक्त कमाई का ज़रिया है, जो आने वाले समय में और बढ़ सकता है।
क्या है कार्बन क्रेडिट और कैसे बनता है?
इसे खरीदा, बेचा या इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर कोई कंपनी या संस्था एक तय सीमा से कम प्रदूषण करती है, तो उसके पास कुछ अतिरिक्त कार्बन क्रेडिट बच जाते हैं। इन क्रेडिट को वह दूसरी कंपनियों को बेच सकती है या भविष्य के लिए रख सकती है। जब कोई कंपनी यह क्रेडिट खरीदती है, तो वह असल में प्रदूषण करने का अधिकार खरीद रही होती है। कार्बन क्रेडिट तभी बनते हैं जब सच में प्रदूषण कम किया गया हो। यह कमी छोटे-छोटे कामों से भी हो सकती है, जैसे कम यात्रा करना या मशीनों को बंद रखना।
किसान कैसे बेचेंगे और किसे बेचेंगे?
भारत में इस क्षेत्र में कुछ प्रमुख कंपनियां काम कर रही हैं, जैसे Varaha, Grow Indigo और Boomitra। ये कंपनियां किसानों को अपने प्रोग्राम से जोड़कर कार्बन क्रेडिट तैयार करती हैं और फिर इन्हें बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को बेचती हैं, जो अपने कार्बन उत्सर्जन को संतुलित करने के लिए इन क्रेडिट्स को खरीदती हैं।