जलवायु में अनिश्चितता के परिणाम को सबसे अधिक झेलते हैं ग्रामीण
Dr SB Misra | May 16, 2026, 11:52 IST
गांवों में बदलते मौसम का असर गंभीर होता जा रहा है। अत्यधिक गर्मी और अप्रत्याशित वर्षा से किसानों की फसलें प्रभावित हो रही हैं, जबकि मजदूरों की दिनचर्या परेशान हो रही है। बच्चों को शुद्ध पानी की कमी से जूझना पड़ रहा है और बीमार होने पर इलाज का कोई साधन नहीं है।
जलवायु परिवर्तन
जलवायु में अनिश्चितता का प्रभाव ग्रामीण किसानों और मजदूरों को सबसे अधिक झेलना पड़ता है और जब अप्रैल के महीने में 40 से 45 डिग्री तापमान की तपिश होती है, तो गांव का गरीब मजदूरी करने में बड़ी कठिनाई से दिन निकाल पाता है और उस पर भी लू लगने या उल्टी-दस्त होने की समस्या को झेलना पड़ता है। किसानों को अब मशीनों ने बहुत राहत दे दी है, नहीं तो महीने भर से ज्यादा समय तक गर्मी और धूप खुले आसमान के नीचे खलिहान में झेलनी पड़ती थी। गांव के बच्चे जब स्कूल आते हैं, तो उनमें से बहुतों के पास पानी की बोतल तक नहीं होती और जब पैदल एक या दो किलोमीटर चलकर आना होता है, तो रास्ते में प्यास लगने पर पीने का पानी भी नहीं मिलता। ग्रामीण महिलाओं, विशेषकर निर्धन परिवारों की महिलाओं को खेतों में दोपहर की धूप में काम करते हुए देखा जा सकता है। यदि वे बीमार हो जाएं, तो उपचार की उचित व्यवस्था भी नहीं रहती।
गर्मी की मार झेलने के बाद जब बरसात के दिन आते हैं, तो कई बार वर्षा में अनिश्चितता होने से खेती-किसानी बुरी तरह प्रभावित होती है और जब वर्षा आरंभ हो जाती है, तो तमाम ग्रामीण नंगे पांव खेतों में जाते हैं, जिससे वे तरह-तरह के कृमियों को निमंत्रण देते हैं। जैसे **एस्केरिस, टेपवर्म और हुकवर्म** जनित बीमारियां गांव में सबसे अधिक होती हैं। ग्रामीणों, विशेषकर किसानों को कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि के कारण अनिश्चित उपज और उपज की कमी का सामना करना पड़ता है। संपन्न किसान तो ग्रीन हाउस में सब्जियां आदि उगाकर पूरा लाभ उठाते हैं, लेकिन साधारण किसान यह नहीं कर पाता और अपने लिए भी सब्जी नहीं उगा पाता। यह सच है कि अब बहुत से ग्रामीणों ने पक्के मकान बनवा लिए हैं, जिससे हर साल मकान की वार्षिक मरम्मत की तकलीफ नहीं उठानी पड़ती, लेकिन उसी मरम्मत में गांव के तालाब हर साल गहरे हो जाया करते थे और बरसात में जल संग्रह का साधन बनते थे। गांव वालों को पानी, हवा और मिट्टी के प्रदूषित होने से बहुत से रोगों का सामना करना पड़ता है और उपचार के लिए स्थानीय स्तर पर कोई उचित व्यवस्था नहीं है।
बदलता मौसम चक्र और
वर्षा ऋतु सितंबर के बाद समाप्त हो जाया करती थी और अक्टूबर तथा नवंबर में शिशिर ऋतु होती थी, जब किसान अच्छे मौसम में कुछ काम कर पाता था और मजदूरों को काम भी मिल जाता था। अब यह भी नहीं पता कि कब गर्मी समाप्त होगी और कब वर्षा ऋतु आरंभ होगी अथवा वर्षा कब समाप्त होगी और शीतकाल कब आरंभ होगा। यह अनिश्चितता शहरी लोगों की अपेक्षा ग्रामीणों को अधिक कठिनाई में डालती है। केवल मैदानी इलाकों में ही नहीं, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों में भी कब बर्फ गिरेगी और कब बर्फ पिघलेगी, इसका भी अपना धर्म बदल गया है। भले ही पर्यटकों को स्नोफॉल का आनंद मिल जाता हो, लेकिन वहां के किसानों, मजदूरों, बच्चों तथा महिलाओं को कष्ट जरूर झेलना पड़ता है। शहरों में रहने वाले राजनेताओं और बाबुओं का शायद यह सोचना है कि ग्रामीणों को खैरात बांट देने से उनका जीवन सुखी हो जाएगा, वे स्वस्थ हो जाएंगे और सरकार की प्रशंसा करेंगे। लेकिन किसान आज के मशीनी युग में, जब कुछ दिनों में ही खेती का काम समाप्त कर लेता है, चरागाह बचे नहीं हैं, इसलिए दुधारू पशु भी समाप्त हो रहे हैं। नौकरी मिलती नहीं, तब खैरात से भिखारी जैसा आनंद तो मिल सकता है, लेकिन “उत्तम खेती, मध्यम बान” वाली अनुभूति नहीं होगी। यह सच है कि हर जिले में शिक्षा संस्थान और चिकित्सालय आदि खुल रहे हैं, लेकिन वे जिले में नहीं, जिला मुख्यालयों में खोले जाते हैं। सुदूर गांव के लोग परिस्थितियों से उसी प्रकार संघर्ष कर रहे हैं, जैसे पहले किया करते थे। यह सच है कि रात के समय गांव जगमगाते हुए दिखाई पड़ते हैं, लेकिन दिन में गांव में जाएं, तो घरों में ताले पड़े हैं या फिर पुरुष सदस्य शहरों में काम करने के लिए मजदूरी की तलाश में गए हुए हैं। हमारे राजनेता भूल गए हैं कि हर हाथ को काम और हर खेत को पानी मिलना चाहिए। शायद जमाना बदलने से उनका सोच भी बदल चुका है। गांव के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए या फिर सरकारी अस्पतालों में मरीज को दवाई देने के लिए अध्यापक और डॉक्टर शहरों से आते हैं, जिन पर भी मौसम की मार पड़ती है। यदि स्थानीय स्तर पर डॉक्टर या मास्टर तैयार किए गए होते और पंच-प्रधानों को यह हिदायत दी गई होती कि स्कूलों में पढ़ाई और अस्पतालों में दवाई की व्यवस्था देखना उनका दायित्व है, तो शायद स्कूल बिना अध्यापक और अस्पताल बिना डॉक्टर के न रहते। राजनेताओं और सरकारी बाबुओं से इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि यदि स्थानीय स्तर पर डॉक्टर और अध्यापक प्राथमिक चिकित्सा और शिक्षा के लिए भी उपलब्ध नहीं हो सकते, तो उन्हें संबंधित पंचायत या गांव में रहने के लिए बाध्य तो किया जा सकता है।
गांव के लोग यह तो नहीं जानते कि अनिश्चित जलवायु और विषम परिस्थितियां क्यों आती हैं, लेकिन जो लोग जानते हैं, वे शहरों में रहते हैं। उन्हें गांव की विषम परिस्थितियों की वास्तविक अनुभूति नहीं है।
भारत में अतीत काल से जलवायु और मौसम का मनुष्य से संबंध समझा और बताया गया है। ऋतुओं के विषय में कहा गया है- “दिनमपि रजनी सायं प्रातः, शिशिर वसंतौ पुनरायातः” अर्थात दिन-रात और ऋतुओं का क्रम निरंतर चलता रहता है, जिसका मतलब था कि सर्दी, गर्मी और वर्षा अपने समय पर क्रमशः आते रहते हैं। लेकिन प्राकृतिक गतिविधियों में मनुष्य द्वारा छेड़छाड़ के कारण मौसम और जलवायु में परिवर्तन हो रहा है। अब भू-क्षरण और भूस्खलन के कारण जल प्रवाह में बाधाएं पड़ रही हैं। अत्यधिक गर्मी के कारण वर्षा जल्दी आ रही है, जल सतह से वाष्पीकरण बढ़ रहा है और पहाड़ों पर मौजूद ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे समुद्र का जल स्तर बढ़ने, समुद्र तट पर बसे नगरों के डूबने का डर बना हुआ है। इसके विपरीत निर्वनीकरण के कारण अनावृष्टि और भूमिगत जल संचय में कमी की आशंका बनी रहती है। प्रकृति का चक्र, विशेषकर जल चक्र, भी इन सबसे प्रभावित हो रहा है। जल चक्र से तात्पर्य है समुद्री सतह से वाष्प का बनना, उसका ऊपर जाकर वायुमंडल में बादल का रूप धारण करना, फिर पहाड़ों पर वर्षा का होना, जिसका कुछ भाग पृथ्वी के अंदर जाना और शेष भाग का फिर से समुद्र में नदियों के माध्यम से पहुंचना।
कई बार लोग कहते हैं कि प्रकृति अपने धर्म का पालन नहीं कर रही है। उनका कष्ट है कि हजारों वर्षों से चला आ रहा जीवन क्रम, जैसे खेती-किसानी, जल संचय, औद्योगिक उत्पादन आदि, अपने समय पर नहीं हो पा रहे हैं। कभी वर्षा जल्दी हो जाती है, कभी देर से। इसी प्रकार कभी अत्यधिक गर्मी होती है और कभी बहुत कम। यही हाल सर्दी का भी है, जिससे मानव का जीवन क्रम प्रभावित होता है। सोचना यह चाहिए कि पर्यावरणीय व्यवधानों में स्वयं मनुष्य भी काफी हद तक जिम्मेदार है। अतः वांछनीय है कि मनुष्य अपने कर्तव्य का पालन करता रहे, तो प्राकृतिक व्यवधान इतने अधिक नहीं आएंगे। अन्यथा मनुष्य का जीवन कष्टप्रद अथवा संकटग्रस्त हो जाएगा।
जलवायु की अनिश्चितता के अनेक पक्ष हैं, जिनमें एक है **ग्लोबल वार्मिंग**। इसके अनेक दुष्परिणाम होने वाले हैं। धरती पर गर्मी बढ़ने से पहाड़ों पर जमी हुई बर्फ पिघल सकती है, जिससे पहाड़ी जीवन तो प्रभावित होगा ही, पृथ्वी पर जल बजट का संतुलन भी बिगड़ जाएगा। पहाड़ों पर ठंडे रेगिस्तान और समुद्र में जल वृद्धि के कारण अनेक समस्याएं पैदा होंगी। इन सबसे बचने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने बाहरी जगत में क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर के साथ सामंजस्य बनाए रखे। तभी मानव शरीर के अंदर मौजूद इन सभी अवयवों में सामंजस्य बना रहेगा।
भारत में 1998 के मई-जून में कुछ स्थानों पर 50 अंश तक तापमान पहुंचा और पूरे देश में लगभग 3000 लोगों की मृत्यु हुई थी। इसी प्रकार 1995 में लगभग विश्व स्तर पर भीषण गर्मी पड़ी थी। कुछ लोगों का मानना है कि यह तापवृद्धि ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण हो रही है। ग्रीन हाउस से तात्पर्य है वायुमंडल में विद्यमान कुछ गैसों के कारण सूर्य से आने वाली इंफ्रारेड किरणों का पृथ्वी के वायुमंडल में ही फंसा रह जाना। इंफ्रारेड किरणों के मार्ग को अवरुद्ध करने वाली गैसों को ग्रीन हाउस गैस कहा जाता है। इनमें प्रमुख हैं क्लोरोफ्लोरो कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड, धुआं, वाष्प, कोहरा, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन तथा ओजोन आदि गैसें। वायुमंडल में ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करने में कार्बन डाइऑक्साइड गैस सबसे महत्वपूर्ण है और वायुमंडल में इसका संतुलन बनाए रखने में पेड़-पौधों की सर्वाधिक भूमिका है, क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड गैस पेड़-पौधों का भोजन है और बदले में वे प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।
इस प्रकार अनादि काल से प्रकृति और प्राणी के बीच चला आ रहा सहअस्तित्व का भाव बना रहना चाहिए। यह तभी संभव है, जब पेड़ों को काटने के बजाय वृक्षारोपण पर जोर दिया जाए, रासायनिक दवाइयों और कीटनाशकों का प्रयोग सीमित हो और मिट्टी प्रदूषित न होने पाए। औद्योगिक कचरा नदियों, तालाबों और झीलों में जाकर जल प्रदूषण न करे। इसी प्रकार के सभी उपाय किए जाने चाहिए, जिससे बाहरी जगत में पाए जाने वाले और मनुष्य शरीर का निर्माण करने वाले क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर की शुद्धता बनी रहे। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो अंतिम परिणाम की केवल कल्पना ही की जा सकती है।
अनिश्चित बारिश और खेती पर बढ़ता संकट
बदलता मौसम चक्र और ग्रामीण जीवन
गांवों में शिक्षा और स्वास्थ्य की चुनौती
भारत में अतीत काल से जलवायु और मौसम का मनुष्य से संबंध समझा और बताया गया है। ऋतुओं के विषय में कहा गया है- “दिनमपि रजनी सायं प्रातः, शिशिर वसंतौ पुनरायातः” अर्थात दिन-रात और ऋतुओं का क्रम निरंतर चलता रहता है, जिसका मतलब था कि सर्दी, गर्मी और वर्षा अपने समय पर क्रमशः आते रहते हैं। लेकिन प्राकृतिक गतिविधियों में मनुष्य द्वारा छेड़छाड़ के कारण मौसम और जलवायु में परिवर्तन हो रहा है। अब भू-क्षरण और भूस्खलन के कारण जल प्रवाह में बाधाएं पड़ रही हैं। अत्यधिक गर्मी के कारण वर्षा जल्दी आ रही है, जल सतह से वाष्पीकरण बढ़ रहा है और पहाड़ों पर मौजूद ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे समुद्र का जल स्तर बढ़ने, समुद्र तट पर बसे नगरों के डूबने का डर बना हुआ है। इसके विपरीत निर्वनीकरण के कारण अनावृष्टि और भूमिगत जल संचय में कमी की आशंका बनी रहती है। प्रकृति का चक्र, विशेषकर जल चक्र, भी इन सबसे प्रभावित हो रहा है। जल चक्र से तात्पर्य है समुद्री सतह से वाष्प का बनना, उसका ऊपर जाकर वायुमंडल में बादल का रूप धारण करना, फिर पहाड़ों पर वर्षा का होना, जिसका कुछ भाग पृथ्वी के अंदर जाना और शेष भाग का फिर से समुद्र में नदियों के माध्यम से पहुंचना।