जलवायु परिवर्तन से भारत के छोटे मछुआरों पर बढ़ा खतरा, मछली पकड़ने के दिन हो रहे कम; कमाई और सुरक्षा का संकट
Gaon Connection | Sept 02, 2026, 18:01 IST
भारत के छोटे मछुआरों पर जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ता तापमान, तेज़ चक्रवात, समुद्र में तूफानी लहरें, बदलता मानसून और मछलियों की उपलब्धता में बदलाव से मछली पकड़ने के दिन घट रहे हैं। रिपोर्ट में सुरक्षित नाव, बेहतर मौसम पूर्वानुमान, आपदा के बाद मुआवज़ा, वैकल्पिक रोज़गार और बाजार सुविधाएँ बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। साथ ही, मछुआरों के अधिकार और समुद्र में सुरक्षा मजबूत करने पर जोर दिया गया है।
जलवायु बदलाव की मार झेल रहे मछुआरे
भारत के छोटे पैमाने पर मछली पकड़ने वाले मछुआरों के सामने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। तापमान में बढ़ोतरी, समुद्र में तूफानी लहरों का बढ़ना, मछलियों की उपलब्धता में बदलाव और मानसून व मछली पकड़ने के मौसम में बदलाव उनकी रोज़ी-रोटी के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं। प्रस्तावित छोटे पैमाने की मत्स्य गतिविधियों के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना (NPOA-SSF) के लिए तैयार की गई एक रिपोर्ट में इन चुनौतियों के साथ मछुआरा समुदाय की कई दूसरी समस्याओं की भी पहचान की गई है।
यह रिपोर्ट बे ऑफ बंगाल प्रोग्राम इंटर-गवर्नमेंटल ऑर्गनाइज़ेशन (BOBP-IGO) ने राष्ट्रीय विशेषज्ञों के सहयोग और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की तकनीकी मदद से तैयार की है। रिपोर्ट में मछुआरा समुदायों के अनुभवों को शामिल किया गया है। इसमें बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब ज्यादा तेज़ चक्रवात, समुद्र में तूफानी लहरें और खराब समुद्री मौसम वाले दिनों की बढ़ती संख्या के रूप में साफ़ दिखाई दे रहा है। इससे मछुआरों के लिए समुद्र में जाने के दिन कम हो रहे हैं और उनकी कमाई पर सीधा असर पड़ रहा है।
रिपोर्ट में मछुआरा समुदायों ने तापमान बढ़ने, मौसम के बदलते समय, ज्यादा तेज़ तूफान, मछलियों की प्रजातियों में बदलाव, सार्डिन मछली की कम होती पकड़ और मानसून के अनिश्चित होने जैसी समस्याएँ बताई हैं। बार-बार आने वाले चक्रवात भी समुद्र में मछली पकड़ने के काम को प्रभावित कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्र में खराब मौसम वाले दिनों की संख्या बढ़ने से मछुआरों को कई बार समुद्र में जाने से रोकना पड़ता है। इससे मछली पकड़ने के दिनों की संख्या कम होती है और आय पर असर पड़ता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु से जुड़े इन खतरों को भविष्य की मत्स्य नीतियों में पहले से शामिल करने की जरूरत है। इसके लिए आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने और जलवायु के असर से निपटने को नीति का अहम हिस्सा बनाने का सुझाव दिया गया है। इसके तहत आपदा से जुड़े बुनियादी ढाँचे की देशभर में जाँच, ज्यादा जोखिम वाले इलाकों की पहचान और प्रभावित मछुआरा परिवारों तक मुआवज़ा पहुँचाने की व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया गया है।
रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए मछुआरों की नावों को मजबूत बनाने और मौसम की बेहतर जानकारी उपलब्ध कराने की जरूरत बताई गई है। आपदा के बाद जल्दी मुआवज़ा देने, मछुआरों को नए कौशल सिखाने और आय के दूसरे साधन उपलब्ध कराने की भी सिफारिश की गई है। BOBP-IGO के निदेशक पी. कृष्णन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर सभी मछुआरों पर एक जैसा नहीं होता। यह मछली पकड़ने वाली नाव और इकाई के प्रकार, बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच, आर्थिक स्थिति और आपदा के बाद दोबारा काम शुरू करने की क्षमता पर निर्भर करता है।
यानी जिन मछुआरों के पास बेहतर नाव, सुरक्षा उपकरण, बंदरगाह और आर्थिक साधन हैं, उनके लिए आपदा के बाद संभलना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। वहीं कमजोर आर्थिक स्थिति वाले छोटे मछुआरों के लिए एक बड़ी आपदा लंबे समय तक रोज़गार और आय का संकट पैदा कर सकती है।
रिपोर्ट में सिर्फ जलवायु परिवर्तन को ही समस्या नहीं बताया गया है। मछुआरों ने बाजार तक सीमित पहुँच और मछली पकड़ने के बाद जरूरी सुविधाओं की कमी को भी बड़ी परेशानी बताया है। मछुआरा समुदायों के मुताबिक, मछलियों को रखने और सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाएँ नहीं हैं। उन्हें अपनी मछली का उचित दाम पाने में भी मुश्किल होती है और बड़े बाजारों तक पहुँच सीमित है।
समुद्र में सुरक्षा भी एक बड़ी चिंता बनी हुई है। सुरक्षा उपकरण महँगे हैं और कई जगह बंदरगाहों तथा मछली उतारने की जगहों पर जरूरी सुविधाएँ पर्याप्त नहीं हैं। पी. कृष्णन के मुताबिक, प्रस्तावित राष्ट्रीय कार्ययोजना में मछुआरों के मछली पकड़ने के अधिकारों की सुरक्षा, सुरक्षित कामकाजी माहौल, मजबूत बाजार व्यवस्था और सभी वर्गों की भागीदारी वाली व्यवस्था पर ध्यान देना जरूरी है।
रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि छोटे मछुआरों की समस्या सिर्फ समुद्र और मौसम तक सीमित नहीं है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे के साथ बाजार, सुरक्षा, बुनियादी सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षा भी उनकी आजीविका से सीधे जुड़ी हैं। ऐसे में आने वाली राष्ट्रीय कार्ययोजना में इन सभी समस्याओं को एक साथ ध्यान में रखकर उपाय करने की जरूरत होगी।
यह रिपोर्ट बे ऑफ बंगाल प्रोग्राम इंटर-गवर्नमेंटल ऑर्गनाइज़ेशन (BOBP-IGO) ने राष्ट्रीय विशेषज्ञों के सहयोग और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की तकनीकी मदद से तैयार की है। रिपोर्ट में मछुआरा समुदायों के अनुभवों को शामिल किया गया है। इसमें बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब ज्यादा तेज़ चक्रवात, समुद्र में तूफानी लहरें और खराब समुद्री मौसम वाले दिनों की बढ़ती संख्या के रूप में साफ़ दिखाई दे रहा है। इससे मछुआरों के लिए समुद्र में जाने के दिन कम हो रहे हैं और उनकी कमाई पर सीधा असर पड़ रहा है।
बढ़ता तापमान और बदलता मौसम मछुआरों की कमाई के लिए खतरा
रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु से जुड़े इन खतरों को भविष्य की मत्स्य नीतियों में पहले से शामिल करने की जरूरत है। इसके लिए आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने और जलवायु के असर से निपटने को नीति का अहम हिस्सा बनाने का सुझाव दिया गया है। इसके तहत आपदा से जुड़े बुनियादी ढाँचे की देशभर में जाँच, ज्यादा जोखिम वाले इलाकों की पहचान और प्रभावित मछुआरा परिवारों तक मुआवज़ा पहुँचाने की व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया गया है।
सुरक्षित नाव, बेहतर मौसम जानकारी और वैकल्पिक रोज़गार पर जोर
यानी जिन मछुआरों के पास बेहतर नाव, सुरक्षा उपकरण, बंदरगाह और आर्थिक साधन हैं, उनके लिए आपदा के बाद संभलना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। वहीं कमजोर आर्थिक स्थिति वाले छोटे मछुआरों के लिए एक बड़ी आपदा लंबे समय तक रोज़गार और आय का संकट पैदा कर सकती है।
बाजार और सुरक्षा की समस्या भी बड़ी चुनौती
समुद्र में सुरक्षा भी एक बड़ी चिंता बनी हुई है। सुरक्षा उपकरण महँगे हैं और कई जगह बंदरगाहों तथा मछली उतारने की जगहों पर जरूरी सुविधाएँ पर्याप्त नहीं हैं। पी. कृष्णन के मुताबिक, प्रस्तावित राष्ट्रीय कार्ययोजना में मछुआरों के मछली पकड़ने के अधिकारों की सुरक्षा, सुरक्षित कामकाजी माहौल, मजबूत बाजार व्यवस्था और सभी वर्गों की भागीदारी वाली व्यवस्था पर ध्यान देना जरूरी है।
रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि छोटे मछुआरों की समस्या सिर्फ समुद्र और मौसम तक सीमित नहीं है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे के साथ बाजार, सुरक्षा, बुनियादी सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षा भी उनकी आजीविका से सीधे जुड़ी हैं। ऐसे में आने वाली राष्ट्रीय कार्ययोजना में इन सभी समस्याओं को एक साथ ध्यान में रखकर उपाय करने की जरूरत होगी।