Winter Olympics Games: क्या जलवायु परिवर्तन से ये प्रतियोगिता खतरे में है?
Gaon Connection | Feb 04, 2026, 10:18 IST
विंटर ओलंपिक बर्फ पर खेले जाने वाले खेलों का सबसे बड़ा वैश्विक मंच है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक बर्फ कम होती जा रही है। इससे आयोजन स्थलों, खिलाड़ियों और मेजबान देशों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
विंटर ओलंपिक दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित खेल आयोजनों में से एक है, जहां बर्फ और ठंडे मौसम से जुड़े खेल खेले जाते हैं। यह आयोजन हर चार साल में होता है और इसे International Olympic Committee (आईओसी) की देखरेख में आयोजित किया जाता है। विंटर ओलंपिक केवल पदकों की दौड़ नहीं है, बल्कि यह देशों के बीच दोस्ती, सहयोग और खेल भावना का वैश्विक मंच भी है। लेकिन आज यह आयोजन एक ऐसी चुनौती का सामना कर रहा है, जो खेल मैदान से कहीं बड़ी है, वो है जलवायु परिवर्तन।
इस बार के विटंर ओलंपिक की मेजबानी इटली कर रहा है, यहाँ के Milano Cortina में प्रतियोगिता हो रही है। यहाँ ये गेम 6 फरवरी से 22 फरवरी 2026 तक आयोजित किए जा रहे हैं।
विंटर ओलंपिक की शुरुआत 1924 में फ्रांस के शैमॉनी शहर से हुई थी। उस दौर में यूरोप और उत्तरी क्षेत्रों में भारी बर्फबारी सामान्य बात थी और प्राकृतिक बर्फ पर प्रतियोगिताएं कराना आसान था। समय के साथ यह आयोजन वैश्विक बन गया और आज इसमें 90 से अधिक देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं। लेकिन, बीते कुछ दशकों में पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ने से पारंपरिक शीतकालीन खेल स्थलों पर बर्फ की उपलब्धता लगातार घट रही है। इसका असर खेलों की गुणवत्ता, खिलाड़ियों की सुरक्षा और आयोजन की लागत पर साफ दिखाई देने लगा है।
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अब कई मेजबान देशों को प्राकृतिक बर्फ के बजाय आर्टिफिशियल बर्फ का सहारा लेना पड़ रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण Beijing 2022 Winter Olympics है, जहां ज़्यादातर प्रतियोगिताएं कृत्रिम बर्फ पर कराई गईं। तकनीक ने भले ही यह संभव बना दिया हो, लेकिन इसके लिए भारी मात्रा में पानी और ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है। इससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है और पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक तापमान इसी गति से बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में कई शहर विंटर ओलंपिक की मेजबानी के लायक नहीं रह जाएंगे।
इस चिंता को वैज्ञानिक शोध भी मजबूत आधार देता है। 2024 में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में 93 संभावित विंटर ओलंपिक और पैरालिंपिक मेजबान स्थलों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के अनुसार, यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार इसी तरह बनी रही, तो 2050 तक केवल लगभग 52 ही ऐसी जगह बचेंगी जहाँ भरोसेमंद प्राकृतिक बर्फ और ठंडी परिस्थितियां उपलब्ध होंगी। वहीं 2080 के दशक तक यह संख्या घटकर लगभग 46 रह सकती है। पैरालिंपिक जैसे आयोजनों के लिए स्थिति और भी अधिक गंभीर बताई गई है। शोध यह भी संकेत देता है कि अगर वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित किया जाए, तो इस गिरावट को कुछ हद तक रोका जा सकता है।
इन चुनौतियों के बीच आयोजक अब टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल मॉडल अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। Milano Cortina 2026 Winter Olympics इसी दिशा में एक उदाहरण माना जा रहा है। इसमें पुराने स्टेडियमों के दोबारा इस्तेमाल, ऊर्जा बचत तकनीक, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा और कार्बन फुटप्रिंट कम करने पर जोर दिया जा रहा है।
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इस बार के विटंर ओलंपिक की मेजबानी इटली कर रहा है, यहाँ के Milano Cortina में प्रतियोगिता हो रही है। यहाँ ये गेम 6 फरवरी से 22 फरवरी 2026 तक आयोजित किए जा रहे हैं।
विंटर ओलंपिक की शुरुआत 1924 में फ्रांस के शैमॉनी शहर से हुई थी। उस दौर में यूरोप और उत्तरी क्षेत्रों में भारी बर्फबारी सामान्य बात थी और प्राकृतिक बर्फ पर प्रतियोगिताएं कराना आसान था। समय के साथ यह आयोजन वैश्विक बन गया और आज इसमें 90 से अधिक देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं। लेकिन, बीते कुछ दशकों में पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ने से पारंपरिक शीतकालीन खेल स्थलों पर बर्फ की उपलब्धता लगातार घट रही है। इसका असर खेलों की गुणवत्ता, खिलाड़ियों की सुरक्षा और आयोजन की लागत पर साफ दिखाई देने लगा है।
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अब कई मेजबान देशों को प्राकृतिक बर्फ के बजाय आर्टिफिशियल बर्फ का सहारा लेना पड़ रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण Beijing 2022 Winter Olympics है, जहां ज़्यादातर प्रतियोगिताएं कृत्रिम बर्फ पर कराई गईं। तकनीक ने भले ही यह संभव बना दिया हो, लेकिन इसके लिए भारी मात्रा में पानी और ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है। इससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है और पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक तापमान इसी गति से बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में कई शहर विंटर ओलंपिक की मेजबानी के लायक नहीं रह जाएंगे।
इस चिंता को वैज्ञानिक शोध भी मजबूत आधार देता है। 2024 में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में 93 संभावित विंटर ओलंपिक और पैरालिंपिक मेजबान स्थलों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के अनुसार, यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार इसी तरह बनी रही, तो 2050 तक केवल लगभग 52 ही ऐसी जगह बचेंगी जहाँ भरोसेमंद प्राकृतिक बर्फ और ठंडी परिस्थितियां उपलब्ध होंगी। वहीं 2080 के दशक तक यह संख्या घटकर लगभग 46 रह सकती है। पैरालिंपिक जैसे आयोजनों के लिए स्थिति और भी अधिक गंभीर बताई गई है। शोध यह भी संकेत देता है कि अगर वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित किया जाए, तो इस गिरावट को कुछ हद तक रोका जा सकता है।
इन चुनौतियों के बीच आयोजक अब टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल मॉडल अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। Milano Cortina 2026 Winter Olympics इसी दिशा में एक उदाहरण माना जा रहा है। इसमें पुराने स्टेडियमों के दोबारा इस्तेमाल, ऊर्जा बचत तकनीक, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा और कार्बन फुटप्रिंट कम करने पर जोर दिया जा रहा है।
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