दिल्ली से उठी आंदोलन की गूँज पहुँची गाँवों तक, जानें शिक्षा व्यवस्था और पेपर लीक पर क्या बोले युवा?
Umang | Jul 23, 2026, 17:05 IST
शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और कथित पेपर लीक मामलों में जवाबदेही की माँग को लेकर दिल्ली में शुरू हुआ 'कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)' का छात्र आंदोलन अब राष्ट्रीय स्तर पर फैल चुका है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन लगातार जारी है और देश के कई शहरों में भी इसके समर्थन में प्रदर्शन हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं का मानना है कि पेपर लीक से छात्रों का समय, पैसा और भविष्य प्रभावित होता है। उनका कहना है कि सरकार को परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाना चाहिए, छात्रों की माँगों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और आंदोलन का समाधान बातचीत के जरिए निकाला जाना चाहिए।
दिल्ली में आंदोलन करते लोग
शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और कथित पेपर लीक के मामलों में जवाबदेही तय करने की माँग को लेकर दिल्ली में शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन अब राष्ट्रीय स्वरूप ले चुका है। सोशल मीडिया पर व्यंग्य के रूप में शुरू हुआ 'कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)' का अभियान देखते ही देखते देश के सबसे बड़े छात्र आंदोलनों में शामिल हो गया है। आंदोलनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की माँग कर रहे हैं।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी का आंदोलन 23 जुलाई को भी लगातार जारी रहा। 20 जुलाई को आयोजित 'चलो पार्लियामेंट' मार्च के दौरान हजारों छात्र और युवा संसद की ओर बढ़े, जहाँ दिल्ली पुलिस ने बैरिकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की। इसके बाद कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज और आँसू गैस का इस्तेमाल किया, जिसमें प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों समेत कई लोग घायल हुए। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे अपनी माँगें पूरी होने तक प्रदर्शन जारी रखेंगे, जबकि पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में तैनात है।
दिल्ली से उठी यह चिंगारी अब देश के अलग-अलग हिस्सों में फैलने लगी है। राष्ट्रीय राजधानी के अलावा महाराष्ट्र के मुंबई, कर्नाटक के बेंगलुरु, गोवा, पश्चिम बंगाल के कोलकाता, तमिलनाडु के चेन्नई, तेलंगाना के हैदराबाद, बिहार के पटना, गुजरात के सूरत, केरल के पलक्कड़, पंजाब के पटियाला और मध्य प्रदेश के इंदौर में भी प्रदर्शन और समर्थन कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। इस आंदोलन की गूँज अब गाँवों तक भी पहुँच चुकी है। सोशल मीडिया और टीवी के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों के युवा भी इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नज़र बनाए हुए हैं और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रख रहे हैं। आख़िर इस आंदोलन को लेकर गाँव के युवाओं की क्या सोच है और इस आंदोलन से उनकी क्या उम्मीदें हैं? आइए,गाँव के युवाओं की ज़ुबानी जानते हैं।
'पेपर लीक होने से समय बर्बाद होता है'
उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले के लोहटी सरैयां गाँव के रहने वाले अनमोल पांडेय (27) प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि छात्रों को अपनी माँगें उठाने का अधिकार है। पेपर लीक होने से छात्रों को समय बर्बाद होता है और वे मानसिक रूप से टूट जाते हैं। कई परिवारों की माली हालत अच्छी न होने के कारण बच्चे दोबारा पेपर देने से वंचित रह जाते हैं। अनमोल का मानना है कि इस आंदोलन में राजनीतिक पार्टियों को नहीं कूदना चाहिए। इससे आंदोलन कमज़ोर होगा।
'सरकारों को सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रश्नपत्र लीक न हों'
अयोध्या (उत्तर प्रदेश) जिले के एक गाँव में रहने वाले जंग बहादुर लोधी (42) का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। उनके अनुसार, किसान और मज़दूर परिवारों के बच्चों को तैयारी के लिए घर से दूर शहरों का रुख करना पड़ता है, जहाँ कोचिंग की फीस, रहने और खाने का खर्च उठाना अभिभावकों के लिए काफी मुश्किल होता है। ऐसे में यदि पेपर लीक होने के कारण परीक्षा दोबारा आयोजित करनी पड़ती है, तो परिवारों पर आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है। साथ ही, दोबारा परीक्षा की तिथि कई महीनों बाद आने से छात्रों की तैयारी और मानसिक दबाव भी बढ़ता है। उन्होंने कहा कि सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक न हों और आंदोलन कर रहे छात्रों की माँगों को गंभीरता से सुनकर उनका समाधान किया जाए।
'छात्रों के भविष्य को नुकसान'
वहीं, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) के एक गाँव में रहने वाले और एसी मैकेनिक राजदीप विश्वकर्मा (35) का कहना है कि पेपर लीक की घटनाओं के लिए सीधे सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में अधिकारियों की लापरवाही भी एक अहम कारण हो सकती है। उन्होंने कहा कि आंदोलन के कारण कई स्थानों पर रास्ते अवरुद्ध हो रहे हैं, जिससे आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका मानना है कि सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत के माध्यम से समाधान निकाला जाना चाहिए। साथ ही, उन्होंने कहा कि आंदोलन को हिंसक नहीं होने दिया जाना चाहिए, क्योंकि यदि ऐसा होता है तो इसका सबसे अधिक नुकसान छात्रों के भविष्य और उनकी पढ़ाई पर पड़ सकता है।
'सत्ता सदा के लिए नहीं होती'
सीतापुर (उत्तर प्रदेश) से तालुल्क रखने वाले 28 वर्षीय व्यापारी ईशान अग्रवाल ने कहा, “छात्रों की मूलभूत ज़रूरत है कि परीक्षाएँ निष्पक्ष और सुचारु रूप से कराई जाएँ। पिछले 12 वर्षों से सरकार इस जिम्मेदारी को निभाने में विफल रही है। 15-16 वर्ष के छात्र-छात्राओं पर डंडे बरसाना और छात्राओं के कपड़े फाड़ देना दैत्यकारी कृत्य है। यह अक्षम्य है। सरकार ऐसा तब कर रही है, जब छात्रों की मांग पूरी तरह जायज़ है। ऐसे शिक्षा मंत्री का क्या औचित्य, जो इतनी बड़ी परीक्षा भी बिना पेपर लीक के न करा सके, छोटी परीक्षाओं की तो बात ही छोड़िए। मुझे याद है कि यह वही सरकार है, जिसके कार्यकाल में सीबीएसई की बोर्ड परीक्षा का पेपर भी लीक हुआ था।"
उन्होंने कहा, "सरकार किसी तानाशाह की तरह काम कर रही है और अपने सबसे अलोकप्रिय दौर से गुजर रही है। सत्ता के मद में चूर होकर सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता सदा के लिए नहीं होती।”
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) कोई राजनीतिक दल नहीं है। इसकी शुरुआत बोस्टन यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र अभिजीत दीपके ने एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान के रूप में की थी। उन्होंने लोगों से जुड़ने के लिए एक ऑनलाइन फ़ॉर्म जारी किया, जिस पर कुछ ही समय में बड़ी संख्या में युवाओं ने प्रतिक्रिया दी। इसके बाद यह अभियान संगठित छात्र आंदोलन में बदल गया और 20 जुलाई को संसद मार्च का आह्वान किया गया।
आंदोलन का नाम 'कॉकरोच जनता पार्टी' एक कथित टिप्पणी के बाद चर्चा में आया। रिपोर्टों के अनुसार, मई में एक सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कथित तौर पर बेरोज़गार युवाओं के पत्रकारिता और एक्टिविज़्म की ओर जाने को लेकर टिप्पणी की थी। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी पूरे युवावर्ग के लिए नहीं, बल्कि "फ़र्ज़ी और फर्जी डिग्री" रखने वाले लोगों के संदर्भ में थी।
आंदोलन का मुख्य मुद्दा राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) से जुड़ा है। इस वर्ष 3 मई को आयोजित नीट परीक्षा में लगभग 22.8 लाख अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था। बाद में प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के चलते परीक्षा रद्द कर दोबारा आयोजित करनी पड़ी।
सीजेपी का कहना है कि परीक्षा रद्द होने से लाखों छात्रों को मानसिक और शैक्षणिक नुकसान हुआ। आंदोलनकारी शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार, परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, कथित पेपर लीक मामलों में जवाबदेही तय करने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की माँग कर रहे हैं। आंदोलन के समर्थन में इंजीनियर और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 28 जून को जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की थी। बाद में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जिसके बाद आंदोलन को और अधिक समर्थन मिलने लगा। आंदोलन के दौरान अभिजीत दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी इस्तीफ़े की माँग की।
20 जुलाई को हुए संसद मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई बार टकराव हुआ। पुलिस ने बैरिकेडिंग, लाठीचार्ज और आँसू गैस का इस्तेमाल कर भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की। बाद में जंतर-मंतर स्थित आंदोलन स्थल से अस्थायी मंच और टेंट भी हटाए गए, लेकिन प्रदर्शनकारी वहाँ से हटने को तैयार नहीं हुए और धरना जारी रखा।
घटना के अगले दिन कांग्रेस के कई नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन किया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए। कांग्रेस का आरोप है कि संसद में इस मुद्दे पर चर्चा की अनुमति नहीं मिलने के कारण उन्हें विरोध दर्ज कराना पड़ा। प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी सहित कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया, जिन्हें बाद में रिहा कर दिया गया।
उधर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कांग्रेस पर छात्रों के मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों की चिंताओं पर व्यापक चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन विपक्ष ने समाधान के बजाय राजनीतिक टकराव का रास्ता चुना। हालांकि उन्होंने अपने बयान में चल रहे छात्र आंदोलन का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया। वहीं, सीजेपी की ओर से भी उनके बयान पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी का आंदोलन 23 जुलाई को भी लगातार जारी रहा। 20 जुलाई को आयोजित 'चलो पार्लियामेंट' मार्च के दौरान हजारों छात्र और युवा संसद की ओर बढ़े, जहाँ दिल्ली पुलिस ने बैरिकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की। इसके बाद कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज और आँसू गैस का इस्तेमाल किया, जिसमें प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों समेत कई लोग घायल हुए। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे अपनी माँगें पूरी होने तक प्रदर्शन जारी रखेंगे, जबकि पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में तैनात है।
दिल्ली से उठी यह चिंगारी अब देश के अलग-अलग हिस्सों में फैलने लगी है। राष्ट्रीय राजधानी के अलावा महाराष्ट्र के मुंबई, कर्नाटक के बेंगलुरु, गोवा, पश्चिम बंगाल के कोलकाता, तमिलनाडु के चेन्नई, तेलंगाना के हैदराबाद, बिहार के पटना, गुजरात के सूरत, केरल के पलक्कड़, पंजाब के पटियाला और मध्य प्रदेश के इंदौर में भी प्रदर्शन और समर्थन कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। इस आंदोलन की गूँज अब गाँवों तक भी पहुँच चुकी है। सोशल मीडिया और टीवी के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों के युवा भी इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नज़र बनाए हुए हैं और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रख रहे हैं। आख़िर इस आंदोलन को लेकर गाँव के युवाओं की क्या सोच है और इस आंदोलन से उनकी क्या उम्मीदें हैं? आइए,गाँव के युवाओं की ज़ुबानी जानते हैं।
गाँव के युवाओं की आंदोलन को लेकर क्या है राय
उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले के लोहटी सरैयां गाँव के रहने वाले अनमोल पांडेय (27) प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि छात्रों को अपनी माँगें उठाने का अधिकार है। पेपर लीक होने से छात्रों को समय बर्बाद होता है और वे मानसिक रूप से टूट जाते हैं। कई परिवारों की माली हालत अच्छी न होने के कारण बच्चे दोबारा पेपर देने से वंचित रह जाते हैं। अनमोल का मानना है कि इस आंदोलन में राजनीतिक पार्टियों को नहीं कूदना चाहिए। इससे आंदोलन कमज़ोर होगा।
'सरकारों को सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रश्नपत्र लीक न हों'
अयोध्या (उत्तर प्रदेश) जिले के एक गाँव में रहने वाले जंग बहादुर लोधी (42) का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। उनके अनुसार, किसान और मज़दूर परिवारों के बच्चों को तैयारी के लिए घर से दूर शहरों का रुख करना पड़ता है, जहाँ कोचिंग की फीस, रहने और खाने का खर्च उठाना अभिभावकों के लिए काफी मुश्किल होता है। ऐसे में यदि पेपर लीक होने के कारण परीक्षा दोबारा आयोजित करनी पड़ती है, तो परिवारों पर आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है। साथ ही, दोबारा परीक्षा की तिथि कई महीनों बाद आने से छात्रों की तैयारी और मानसिक दबाव भी बढ़ता है। उन्होंने कहा कि सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक न हों और आंदोलन कर रहे छात्रों की माँगों को गंभीरता से सुनकर उनका समाधान किया जाए।
'छात्रों के भविष्य को नुकसान'
वहीं, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) के एक गाँव में रहने वाले और एसी मैकेनिक राजदीप विश्वकर्मा (35) का कहना है कि पेपर लीक की घटनाओं के लिए सीधे सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में अधिकारियों की लापरवाही भी एक अहम कारण हो सकती है। उन्होंने कहा कि आंदोलन के कारण कई स्थानों पर रास्ते अवरुद्ध हो रहे हैं, जिससे आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका मानना है कि सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत के माध्यम से समाधान निकाला जाना चाहिए। साथ ही, उन्होंने कहा कि आंदोलन को हिंसक नहीं होने दिया जाना चाहिए, क्योंकि यदि ऐसा होता है तो इसका सबसे अधिक नुकसान छात्रों के भविष्य और उनकी पढ़ाई पर पड़ सकता है।
'सत्ता सदा के लिए नहीं होती'
सीतापुर (उत्तर प्रदेश) से तालुल्क रखने वाले 28 वर्षीय व्यापारी ईशान अग्रवाल ने कहा, “छात्रों की मूलभूत ज़रूरत है कि परीक्षाएँ निष्पक्ष और सुचारु रूप से कराई जाएँ। पिछले 12 वर्षों से सरकार इस जिम्मेदारी को निभाने में विफल रही है। 15-16 वर्ष के छात्र-छात्राओं पर डंडे बरसाना और छात्राओं के कपड़े फाड़ देना दैत्यकारी कृत्य है। यह अक्षम्य है। सरकार ऐसा तब कर रही है, जब छात्रों की मांग पूरी तरह जायज़ है। ऐसे शिक्षा मंत्री का क्या औचित्य, जो इतनी बड़ी परीक्षा भी बिना पेपर लीक के न करा सके, छोटी परीक्षाओं की तो बात ही छोड़िए। मुझे याद है कि यह वही सरकार है, जिसके कार्यकाल में सीबीएसई की बोर्ड परीक्षा का पेपर भी लीक हुआ था।"
उन्होंने कहा, "सरकार किसी तानाशाह की तरह काम कर रही है और अपने सबसे अलोकप्रिय दौर से गुजर रही है। सत्ता के मद में चूर होकर सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता सदा के लिए नहीं होती।”
कैसे हुई शुरूआत
आंदोलन का नाम 'कॉकरोच जनता पार्टी' एक कथित टिप्पणी के बाद चर्चा में आया। रिपोर्टों के अनुसार, मई में एक सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कथित तौर पर बेरोज़गार युवाओं के पत्रकारिता और एक्टिविज़्म की ओर जाने को लेकर टिप्पणी की थी। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी पूरे युवावर्ग के लिए नहीं, बल्कि "फ़र्ज़ी और फर्जी डिग्री" रखने वाले लोगों के संदर्भ में थी।
क्या हैं आंदोलनकारियों की मुख्य माँगें?
सीजेपी का कहना है कि परीक्षा रद्द होने से लाखों छात्रों को मानसिक और शैक्षणिक नुकसान हुआ। आंदोलनकारी शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार, परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, कथित पेपर लीक मामलों में जवाबदेही तय करने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की माँग कर रहे हैं। आंदोलन के समर्थन में इंजीनियर और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 28 जून को जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की थी। बाद में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जिसके बाद आंदोलन को और अधिक समर्थन मिलने लगा। आंदोलन के दौरान अभिजीत दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी इस्तीफ़े की माँग की।
पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिक्रिया
घटना के अगले दिन कांग्रेस के कई नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन किया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए। कांग्रेस का आरोप है कि संसद में इस मुद्दे पर चर्चा की अनुमति नहीं मिलने के कारण उन्हें विरोध दर्ज कराना पड़ा। प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी सहित कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया, जिन्हें बाद में रिहा कर दिया गया।
उधर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कांग्रेस पर छात्रों के मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों की चिंताओं पर व्यापक चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन विपक्ष ने समाधान के बजाय राजनीतिक टकराव का रास्ता चुना। हालांकि उन्होंने अपने बयान में चल रहे छात्र आंदोलन का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया। वहीं, सीजेपी की ओर से भी उनके बयान पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई।