मानसून की वापसी से जुलाई में बढ़ी कपास की बुवाई, फिर भी रकबा पिछले साल से कम, जानें क्या है ताज़ा स्थिति
Gaon Connection | Jul 09, 2026, 17:11 IST
देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून के सक्रिय होने के बाद जुलाई में कपास की बुवाई ने तेज़ी पकड़ ली है। शुरुआती देरी के बावजूद महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख राज्यों में अच्छी बारिश से बुवाई में सुधार हुआ है, हालांकि कुल रक़बा अभी भी पिछले वर्ष से कम है। कई किसान बेहतर दाम मिलने की उम्मीद में धान की जगह कपास और दलहन की खेती की ओर रुख़ कर रहे हैं। वहीं खरीफ़ सीज़न की बुवाई भी रफ़्तार पकड़ रही है और कृषि विशेषज्ञ इस वर्ष अच्छी पैदावार की उम्मीद जता रहे हैं।
अच्छी बारिश से कपास किसानों को मिली राहत
देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दोबारा सक्रिय होने के साथ ही जुलाई महीने में कपास की बुवाई ने रफ़्तार पकड़ ली है। जून में कमज़ोर बारिश के कारण कई राज्यों में बुवाई प्रभावित हुई थी, लेकिन अब महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में अच्छी वर्षा होने से किसान तेज़ी से खेतों में बुवाई कर रहे हैं। इससे कपास के कुल रक़बे में सुधार देखने को मिला है, हालांकि यह अभी भी पिछले वर्ष के स्तर से नीचे बना हुआ है।
जुलाई खरीफ़ सीज़न का सबसे अहम महीना होता है, क्योंकि इसी दौरान अधिकांश फसलों की बुवाई पूरी होती है। इस वर्ष मानसून में शुरुआती देरी के कारण बुवाई का कार्यक्रम प्रभावित हुआ, लेकिन अब मौसम अनुकूल होने से किसान फिर से खेतों की ओर लौट रहे हैं। कुछ इलाक़ों में सोयाबीन की फसल का अंकुरण कमज़ोर रहने के कारण किसान कपास की खेती को भी प्राथमिकता दे रहे हैं।
5 जुलाई तक देश में लगभग 63.18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आँकड़ा 82 लाख हेक्टेयर था। हालाँकि पिछले कुछ दिनों में हुई अच्छी बारिश के कारण दोनों के बीच का अंतर कम हुआ है। कपास की बुवाई देश के अलग-अलग राज्यों में अलग समय पर होती है। पंजाब और हरियाणा से इसकी शुरुआत होती है और बाद में तमिलनाडु सहित अन्य राज्यों तक यह प्रक्रिया पहुँचती है। सामान्य तौर पर बुवाई की अंतिम तिथि 15 जुलाई मानी जाती है, लेकिन इस बार मानसून में देरी के कारण इसे 30 जुलाई तक बढ़ा दिया गया है।
गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में अच्छी वर्षा के बाद किसान तेज़ी से कपास की बुवाई कर रहे हैं। वहीं कुछ किसानों ने धान की अपेक्षा कपास और दलहन की खेती को प्राथमिकता दी है, क्योंकि इन फसलों से बेहतर दाम मिलने की संभावना जताई जा रही है। महाराष्ट्र के कई इलाक़ों में सोयाबीन की कमज़ोर अंकुरण के बाद किसान अब कपास की बुवाई की ओर रुख़ कर रहे हैं।
जुलाई में खरीफ़ फसलों की बुवाई सबसे अधिक होती है। जून के दौरान जहाँ प्रति सप्ताह लगभग 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई होती है, वहीं जुलाई में यह आँकड़ा बढ़कर 200 से 250 लाख हेक्टेयर प्रति सप्ताह तक पहुँच जाता है। पिछले वर्ष कुल लगभग 1,140 लाख हेक्टेयर खरीफ़ क्षेत्र में से करीब 250 लाख हेक्टेयर में जून और लगभग 750 लाख हेक्टेयर में जुलाई के दौरान बुवाई हुई थी।
शुरुआती दिनों में कम वर्षा के कारण बुवाई प्रभावित रही, जबकि बाद में कई क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश से जलभराव की स्थिति बन गई। ऐसे इलाक़ों में पानी निकलने के बाद किसान दोबारा बुवाई शुरू कर रहे हैं।
दरअसल, खेती पूरी तरह स्थानीय मौसम पर निर्भर करती है। वर्ष 2015 के अल नीनो के बाद भी देश में खाद्यान्न उत्पादन में बड़ी गिरावट नहीं आई थी और इस वर्ष भी बेहतर मानसून के चलते अच्छी पैदावार की उम्मीद जताई जा रही है। वहीं, फसलों के रक़बे के आँकड़ों की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए प्रारंभिक आकलन, रिमोट सेंसिंग और ब्लॉक स्तर के डिजिटल फसल सर्वेक्षण के माध्यम से तीन चरणों में सत्यापन किया जा रहा है।
जुलाई खरीफ़ सीज़न का सबसे अहम महीना होता है, क्योंकि इसी दौरान अधिकांश फसलों की बुवाई पूरी होती है। इस वर्ष मानसून में शुरुआती देरी के कारण बुवाई का कार्यक्रम प्रभावित हुआ, लेकिन अब मौसम अनुकूल होने से किसान फिर से खेतों की ओर लौट रहे हैं। कुछ इलाक़ों में सोयाबीन की फसल का अंकुरण कमज़ोर रहने के कारण किसान कपास की खेती को भी प्राथमिकता दे रहे हैं।
बारिश बढ़ने से कपास की बुवाई में आई तेज़ी, कई राज्यों में बढ़ा रक़बा
गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में अच्छी वर्षा के बाद किसान तेज़ी से कपास की बुवाई कर रहे हैं। वहीं कुछ किसानों ने धान की अपेक्षा कपास और दलहन की खेती को प्राथमिकता दी है, क्योंकि इन फसलों से बेहतर दाम मिलने की संभावना जताई जा रही है। महाराष्ट्र के कई इलाक़ों में सोयाबीन की कमज़ोर अंकुरण के बाद किसान अब कपास की बुवाई की ओर रुख़ कर रहे हैं।
खरीफ़ बुवाई ने पकड़ी रफ़्तार, उत्पादन को लेकर उम्मीद बरक़रार
शुरुआती दिनों में कम वर्षा के कारण बुवाई प्रभावित रही, जबकि बाद में कई क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश से जलभराव की स्थिति बन गई। ऐसे इलाक़ों में पानी निकलने के बाद किसान दोबारा बुवाई शुरू कर रहे हैं।
दरअसल, खेती पूरी तरह स्थानीय मौसम पर निर्भर करती है। वर्ष 2015 के अल नीनो के बाद भी देश में खाद्यान्न उत्पादन में बड़ी गिरावट नहीं आई थी और इस वर्ष भी बेहतर मानसून के चलते अच्छी पैदावार की उम्मीद जताई जा रही है। वहीं, फसलों के रक़बे के आँकड़ों की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए प्रारंभिक आकलन, रिमोट सेंसिंग और ब्लॉक स्तर के डिजिटल फसल सर्वेक्षण के माध्यम से तीन चरणों में सत्यापन किया जा रहा है।