Rice Farming: भारतीय धान की किस्मों से हुई करोड़ों की कमाई, जानिए किसानों और राज्यों को कैसे मिलेगा फायदा

Mansi | Aug 02, 2026, 17:11 IST
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धान की किस्मों के उपयोग के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण को 8.22 करोड़ रुपये की सहायता मिली है। यह धनराशि तीन प्रमुख कृषि अनुसंधान संस्थानों और 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों में वितरित की जाएगी। सबसे ज्यादा राशि हैदराबाद के भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान को मिली है, जबकि उत्तर प्रदेश को इसमें प्रमुख कोटा मिला है। यह राशि संरक्षण एवं अनुसंधान के साथ किसानों के सहयोग पर खर्च होगी.

भारतीय धान की किस्मों के व्यावसायिक उपयोग के बदले राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) को 8.22 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं।
भारतीय धान की किस्मों के व्यावसायिक उपयोग के बदले राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) को 8.22 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं।
भारतीय धान की किस्मों के व्यावसायिक उपयोग के बदले राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) को 8.22 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं। यह राशि एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (ABS) व्यवस्था के तहत चावल के लिए किए गए सबसे बड़े लाभ-साझाकरण भुगतानों में से एक है। इस राशि को तीन कृषि अनुसंधान संस्थानों और 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों तथा केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों में वितरित किया गया है।

एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत यदि कोई कंपनी किसी देश के जैविक संसाधनों या उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान का व्यावसायिक उपयोग करती है, तो उससे होने वाले लाभ का एक हिस्सा उस देश के साथ साझा करना होता है। भारत में यह व्यवस्था जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत लागू है।

भारतीय धान की किस्मों से विकसित किए गए हाइब्रिड बीज

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के अनुसार, यह राशि अंतरराष्ट्रीय बीज कंपनी मैसर्स पायनियर ओवरसीज कॉर्पोरेशन से प्राप्त हुई है। कंपनी ने भारतीय धान (ओराइज़ा सैटिवा) की किस्मों का उपयोग कर हाइब्रिड धान विकसित किए और उनका व्यावसायिक उपयोग किया। इसके बदले कंपनी ने लाभ-साझाकरण के तहत यह राशि जमा कराई।

शोध संस्थानों को मिले 2.47 करोड़ रुपये

कुल राशि में से 2.47 करोड़ रुपये उन कृषि अनुसंधान संस्थानों को दिए गए हैं, जिन्होंने धान की किस्मों का संरक्षण किया और उन्हें अनुसंधान के लिए उपलब्ध कराया। हैदराबाद स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान को सबसे अधिक 2.43 करोड़ रुपये मिले हैं। वहीं, उत्तराखंड के गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को उसकी ओर से संरक्षित धान की एक किस्म के लिए 3.26 लाख रुपये दिए गए हैं।

उत्तर प्रदेश को मिला सबसे बड़ा हिस्सा

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने 5.75 करोड़ रुपये 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों और केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों को जारी किए हैं। यह राशि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के एकीकृत कृषि सांख्यिकी पोर्टल में दर्ज धान के
उत्तर प्रदेश को सबसे अधिक 73.26 लाख रुपये मिले हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल को 64.95 लाख रुपये, तेलंगाना को 50.60 लाख रुपये, ओडिशा को 48.09 लाख रुपये, छत्तीसगढ़ को 45.91 लाख रुपये, पंजाब को 37.15 लाख रुपये, बिहार को 36.93 लाख रुपये, मध्य प्रदेश को 36.16 लाख रुपये, असम को 27.79 लाख रुपये और आंध्र प्रदेश को 25.88 लाख रुपये मिले हैं। सिक्किम और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह जैसे कम धान उत्पादन वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी उनके धान क्षेत्र के अनुसार राशि आवंटित की गई है।

संरक्षण, अनुसंधान और किसानों के सहयोग पर होगा खर्च

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के अनुसार, अनुसंधान संस्थान इस राशि का उपयोग धान के जर्मप्लाज़्म के संरक्षण, बीज संग्रहों के रखरखाव, अनुसंधान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए करेंगे। वहीं, राज्य जैव विविधता बोर्ड अपनी-अपनी राशि का उपयोग देशी फसलों की किस्मों के संरक्षण, पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन, पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेज़ीकरण तथा स्थानीय किसानों और ज्ञानधारकों को सहायता देने जैसी गतिविधियों में करेंगे।

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के अनुसार, कृषि और बीज क्षेत्र से अब तक लगभग 83 करोड़ रुपये लाभ-साझाकरण के रूप में प्राप्त हो चुके हैं। वहीं, सभी क्षेत्रों को मिलाकर यह राशि 162 करोड़ रुपये से अधिक हो गई है। यह व्यवस्था देश के जैविक संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ उनके व्यावसायिक उपयोग से मिलने वाले लाभ को अनुसंधान संस्थानों और राज्यों तक पहुंचाने का माध्यम बन रही है।
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