Fish Waste: वैज्ञानिकों की बड़ी खोज, मछली के कचरे से बनेगा 'करोड़ों' का बायोमेडिकल प्रोडक्ट, टूटी हड्डियां और दांत जोड़ने में आएगा काम
Gaon Connection | Apr 21, 2026, 12:02 IST
भारतीय वैज्ञानिकों ने मछली के कचरे से एक नई तकनीक विकसित की है। इससे मछली के शल्क से हाई-टेक मेडिकल मटेरियल बनेगा। यह टूटी हड्डियों और खराब दांतों को ठीक करने में मदद करेगा। यह इलाज को असरदार और सुरक्षित बनाएगा। यह खोज हेल्थ सेक्टर में बड़ा बदलाव लाएगी। इससे कचरे से कमाई का नया रास्ता खुलेगा।
मछली के छिलकों से होगा इलाज
मछली बाजारों का बदबू मारता कचरा अब इलाज का नया हथियार बनने वाला है। 'बिजनेस लाइन' की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसी जबरदस्त तकनीक विकसित की है, जिससे मछली के बेकार समझे जाने वाले शल्क (छिलके) को हाई-टेक मेडिकल मटेरियल में बदला जा रहा है। यह खास नैनोफाइबर न सिर्फ टूटी हड्डियों और खराब दांतों को तेजी से ठीक करने में मदद करेगा, बल्कि इलाज को ज्यादा असरदार और सुरक्षित भी बनाएगा। कोच्चि स्थित आईसीएआर-सीआईएफटी की इस खोज को हेल्थ सेक्टर में बड़ा गेमचेंजर माना जा रहा है।
कोच्चि स्थित आईसीएआर–केंद्रीय मत्स्य प्रौद्योगिकी संस्थान (आईसीएआर-सीआईएफटी) के वैज्ञानिकों ने मछली के स्केल से नैनोफाइबर आधारित ग्राफ्ट मटेरियल तैयार किया है। भारत में हर साल 1.9 करोड़ टन से ज्यादा मछली उत्पादन होता है, जिससे करीब 40 से 60 लाख टन तक कचरा निकलता है। अब तक इस कचरे का इस्तेमाल कम मूल्य वाले उत्पादों जैसे फिश मील में होता था या इसे फेंक दिया जाता था। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार, “मछली के शल्क कोलेजन, कैल्शियम और बायोएक्टिव तत्वों से भरपूर होते हैं,” जो इसे बायोमेडिकल उपयोग के लिए बेहद उपयोगी बनाते हैं।
इस तकनीक में मछली के शल्क से हाइड्रॉक्सीएपेटाइट नामक खनिज निकाला जाता है, जो इंसानी हड्डियों और दांतों के बेहद समान होता है। उन्नत इलेक्ट्रो-स्पिनिंग प्रक्रिया के जरिए इसे अल्ट्रा-थिन नैनोफाइबर में बदला जाता है, जो शरीर में जाकर टिश्यू रीजनरेशन को बढ़ावा देते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, “ये नैनोफाइबर सिर्फ खाली जगह नहीं भरते, बल्कि हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं को बढ़ने में मदद करते हैं।” साथ ही यह एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी एजेंट्स की नियंत्रित आपूर्ति भी कर सकते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा कम होता है और रिकवरी तेज होती है।
यह तकनीक सिर्फ मेडिकल क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की दिशा में भी बड़ा कदम है। जापान और नॉर्वे जैसे देश पहले ही मछली के कचरे को हाई-वैल्यू उत्पादों में बदलकर आर्थिक लाभ उठा रहे हैं, लेकिन भारत में अभी सप्लाई चेन और प्रोसेसिंग की कमी बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस कचरे का आंशिक उपयोग भी बायोमेडिकल उत्पादों में किया जाए, तो इससे बड़ा आर्थिक लाभ और पर्यावरणीय राहत मिल सकती है। साथ ही तटीय क्षेत्रों में नए रोजगार, रिसर्च और स्टार्टअप के अवसर भी तेजी से बढ़ेंगे।