जलवायु-स्मार्ट खेती की बढ़ी अहमियत! कम पानी में अधिक उत्पादन पर फोकस, पानी बचाने के लिए किसान अपना रहे हैं ये नई तकनीक
Gaon Connection | Jul 18, 2026, 15:51 IST
जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय कृषि के सामने जल संकट और अनियमित मौसम जैसी चुनौतियाँ बढ़ रही हैं। ऐसे में जलवायु-स्मार्ट कृषि टिकाऊ खेती का प्रभावी मॉडल बनकर उभर रही है। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, जल संरक्षण, फसल विविधीकरण, आधुनिक तकनीक और सामुदायिक भागीदारी के ज़रिए कम पानी में बेहतर उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर ज़ोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य खेती को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक सक्षम बनाना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक मज़बूत बनाए रखना है।
बदलते मौसम के साथ बदल रही खेती
जलवायु परिवर्तन का असर अब भारतीय कृषि पर साफ़ दिखाई देने लगा है। अनियमित मानसून, लंबे होते गर्मी के मौसम, अचानक होने वाली भारी बारिश और लगातार गिरता भूजल स्तर खेती को पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं। ऐसे हालात में केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि खेती को इस तरह विकसित करना भी ज़रूरी हो गया है कि वह बदलते मौसम के अनुकूल होने के साथ प्राकृतिक संसाधनों का भी संरक्षण कर सके।
देश में कृषि क्षेत्र कुल मीठे पानी का लगभग 80 प्रतिशत उपयोग करता है, जबकि जल संकट लगातार गहराता जा रहा है। ऐसे में जलवायु-स्मार्ट कृषि (क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर) को टिकाऊ खेती का प्रभावी मॉडल माना जा रहा है। इसमें कम पानी में अधिक उत्पादन, जल संरक्षण, आधुनिक तकनीक, फसल विविधीकरण और सामुदायिक भागीदारी जैसे उपायों पर ज़ोर दिया जाता है, ताकि खेती को भविष्य के लिए अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा सके।
देश के कई हिस्सों में किसान पारंपरिक बाढ़ सिंचाई छोड़कर ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपना रहे हैं। इससे पानी की खपत कम होने के साथ फसल उत्पादन में भी सुधार हो रहा है। वहीं तालाब, जोहड़, चेक डैम और वर्षा जल संचयन जैसी पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के प्रयास भी तेज़ हुए हैं, जिससे भूजल स्तर सुधारने और ग्रामीण क्षेत्रों में जल उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल रही है।
जलवायु-अनुकूल खेती के तहत किसान अब सूखा सहन करने वाली फसल किस्मों, मल्चिंग, फसल विविधीकरण, कृषि वानिकी और एकीकृत खेती जैसी पद्धतियों को अपना रहे हैं। इसके साथ ही मोटे अनाज (श्री अन्न), दालों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पारंपरिक फसलों की खेती को भी बढ़ावा मिल रहा है। इन उपायों से मिट्टी की नमी बनाए रखने के साथ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम हो रही है।
खेती में सेंसर आधारित सिंचाई, मौसम संबंधी मोबाइल ऐप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित फसल निगरानी और प्रिसीजन फार्मिंग जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है। वहीं जल संरक्षण और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने में स्थानीय समुदायों और स्वयं सहायता समूहों की भूमिका भी अहम होती जा रही है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच जल सुरक्षा और कृषि को अधिक लचीला बनाना ग्रामीण विकास की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है।
देश में कृषि क्षेत्र कुल मीठे पानी का लगभग 80 प्रतिशत उपयोग करता है, जबकि जल संकट लगातार गहराता जा रहा है। ऐसे में जलवायु-स्मार्ट कृषि (क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर) को टिकाऊ खेती का प्रभावी मॉडल माना जा रहा है। इसमें कम पानी में अधिक उत्पादन, जल संरक्षण, आधुनिक तकनीक, फसल विविधीकरण और सामुदायिक भागीदारी जैसे उपायों पर ज़ोर दिया जाता है, ताकि खेती को भविष्य के लिए अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा सके।