बासमती किसानों के लिए अलग बोर्ड बनाने की तैयारी, APEDA से अलग हो सकता है नियंत्रण

Gaon Connection | May 19, 2026, 11:07 IST
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भारत में बासमती चावल के लिए एक अलग विकास बोर्ड बनाने की तैयारी चल रही है। यह कदम किसानों तक बासमती का लाभ पहुंचाने और उनकी आय बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है। वर्तमान में एपीडा बासमती निर्यात का काम देखता है, लेकिन हितधारकों का मानना है कि एक समर्पित बोर्ड अधिक प्रभावी होगा।
एपीडा से अलग हो सकता है बासमती का नियंत्रण
एपीडा से अलग हो सकता है बासमती का नियंत्रण
भारत में बासमती चावल के लिए अलग विकास बोर्ड बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। यह बोर्ड वाणिज्य मंत्रालय के तहत काम करने वाले दूसरे कमोडिटी बोर्डों की तर्ज पर बनाया जा सकता है। यह कदम ऐसे समय उठाया जा रहा है, जब दो प्रमुख चावल निर्यातक संगठनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह से बासमती चावल के लिए अलग वैधानिक बोर्ड बनाने और इसे एपीडा के नियंत्रण से बाहर करने की मांग की है।

आरएसएस से जुड़े किसान संगठन ने की चर्चा

पिछले सप्ताह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय किसान संघ की ओर से इस मुद्दे पर एक बड़ी बैठक आयोजित की गई। बैठक में ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन, पंजाब राइस मिलर्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन, किसान प्रतिनिधियों और उद्योग विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिनभर चली चर्चा के बाद भारतीय किसान संघ ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से अलग बासमती विकास बोर्ड बनाने की मांग की है। रिपोर्ट्स की मानें तो प्रधानमंत्री कार्यालय को भी इस संबंध में प्रस्ताव भेजा गया है।

किसानों तक नहीं पहुंच रहा बासमती का फायदा

बैठक में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया कि बासमती चावल से होने वाला आर्थिक लाभ किसानों तक सही तरीके से नहीं पहुंच पा रहा है। किसानों की आय लगातार घट रही है, क्योंकि बासमती की कीमतें लंबे समय से स्थिर बनी हुई हैं, जबकि खेती की लागत तेजी से बढ़ी है। बासमती को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग का संरक्षण मिला हुआ है, इसके बावजूद किसानों को अपेक्षित फायदा नहीं मिल पा रहा। पिछले कुछ सीजन में बासमती धान की कीमतें 2500 रुपये से 3700 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहीं, जबकि किसानों को उम्मीद थी कि उन्हें 4000 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक का भाव मिलेगा।

लागत बढ़ी, लेकिन प्रीमियम घटा

रिपोर्ट्स के अनुसार महंगाई को समायोजित करने के बाद किसानों को मिलने वाला वास्तविक दाम काफी घट गया है। इससे बासमती खेती अब सामान्य धान की तुलना में थोड़ा ही ज्यादा लाभदायक रह गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि बासमती को उच्च मूल्य वाला विशेष उत्पाद माना जाता है। उधर खेती की लागत भी लगातार बढ़ रही है। पिछले दस वर्षों में खाद की कीमतें 2 से 3 गुना तक बढ़ चुकी हैं। मजदूरी, ईंधन और कीटनाशक की लागत में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। निर्यात गुणवत्ता के लिए सख्त अवशेष और अनुपालन नियमों के कारण किसानों का खर्च और बढ़ गया है।

बीज गुणवत्ता को लेकर भी संकट

किसान बीज की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को लेकर भी परेशान हैं। किसान सरकारी और निजी दोनों स्रोतों से बीज खरीदते हैं, लेकिन कई बार बीज मिश्रित या खराब गुणवत्ता के निकलते हैं। इससे बासमती की शुद्धता पर सवाल उठते हैं। किसान प्रीमियम दाम पाने की उम्मीद में महंगे बीज खरीदते हैं, लेकिन कई बार उत्पाद निर्यात मानकों पर खरा नहीं उतरता। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि मजबूत बीज प्रमाणन और निगरानी व्यवस्था की कमी से किसानों का जोखिम बढ़ रहा है।

एपीडा की कार्यप्रणाली पर सवाल

फिलहाल बासमती निर्यात का काम कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण यानी एपीडा संभालता है। निर्यातक संगठनों ने प्रधानमंत्री और अमित शाह को भेजे पत्र में कहा कि एपीडा कई दूसरे उत्पादों पर भी काम करता है, इसलिए बासमती पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। हालांकि एपीडा के तहत बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन काम करता है, लेकिन हितधारकों ने उसके प्रदर्शन पर भी नाराजगी जताई।

RCAC फीस को लेकर उठे सवाल

बैठक में कहा गया कि एपीडा बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन के लिए प्रति टन 70 रुपये की आरसीएसी फीस वसूलता है। इससे एपीडा को करीब 45.5 करोड़ रुपये की आय होती है, लेकिन वह इसमें से 50 प्रतिशत राशि अपनी सेवाओं के लिए रख लेता है। दूसरी ओर एपीडा का कुल बजट आवंटन करीब 80 करोड़ रुपये है और इसमें केवल कुछ अधिकारी ही काम करते हैं।
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