Earth Day Special 2026: क्या वास्तव में हम पृथ्वी की इतनी परवाह करते हैं?

Gaon Connection | Apr 22, 2026, 16:23 IST
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संयुक्त राष्ट्रसंघ के अनुसार हर 4 महीने में एक नई संक्रामक बीमारी से आज हमारा सामना हो रहा है। विज्ञान इन सब नई नई बीमारियों के इलाज ढूढ़ने में हर बार लगा है और सफलता भी हासिल की है परंतु फिर भी कोई ऐसा पल नहीं आया जब मानव को कोई ऐसी बीमारियों की कोई चुनौती शेष न रह गई हो।
Earth Day 2026
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क्या हम सच में पृथ्वी की परवाह करते हैं?

पृथ्वी बचाओ का दशकों से बड़ा नारा रहा है लेकिन क्या वास्तव में हम पृथ्वी की इतनी परवाह करते हैं? क्या हम सच मे पृथ्वी के लिए इतने चिंतित हैं? मेरा मानना है कि बिल्कुल नहीं। पृथ्वी के अस्तित्व में आने से लेकर अरबों वर्षों तक यहाँ मानव का अस्तित्व नहीं था। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी करीब 4.6 अरब साल पहले अस्तित्व में आई, जबकि आधुनिक मानव का इतिहास ज्ञात साक्ष्यों के अनुसार 2 से 3 लाख वर्ष पुराना है।

अंतरिक्ष से दिखती पृथ्वी, पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती तस्वीर।
अंतरिक्ष से दिखती पृथ्वी, पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती तस्वीर।
अफ्रीका क्षेत्र में मानव के पदार्पण के जो जीवाश्म साक्ष्य मिलते हैं, उनसे वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है। विश्व में अन्य जगहों पर मानव के पलायन का इतिहास तो महज 50 से 70 हज़ार वर्ष पुराना ही है। मतलब यह कि जब मानव का उद्भव भी नहीं हुआ था तब से पृथ्वी का अस्तित्व बरकरार है।

पृथ्वी पहले आयी उसपर जीवन बाद में और मानव जीवन विकासक्रम में लगभग सबसे बाद में। अतः हम मान सकते हैं कि मानव जीवन का आरंभ पृथ्वी पर एक अत्यंत आधुनिक घटना है। अर्थात मानव के पृथ्वी पर उद्भव और विकास की कहानी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बहुत पुरानी बात नहीं है।

संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और संकट

प्रकृति और मानव जीवन का गहरा संबंध दर्शाती प्रतीकात्मक छवि।
प्रकृति और मानव जीवन का गहरा संबंध दर्शाती प्रतीकात्मक छवि।
मानव जब से धरती पर अस्तित्व में आया पृथ्वी के लिए कोई विशेष खतरा नहीं बना था। परंतु हाल की शताब्दियों में मानव ने पृथ्वी के पर्यावरण की प्राकृतिकता से छेड़छाड़ करनी शुरू की। प्राकृतिक संसाधनों का अपने फायदे के लिए अंधाधुंध दोहन शुरू किया। समस्या यहीं से शुरू हुईं।

कोयला, प्राकृतिक खनिज आदि संसाधन जो करोड़ों वर्षो की प्रक्रिया के दौरान इस पृथ्वी पर बने उन्हें मानव ने कुछ सौ साल में ही खत्म करने की ठान ली। जनसंख्या में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई। मानव को पिछली सदी में ही लगने लगा कि यदि हम इसी रफ़्तार से संसाधनों का दोहन करते रहेंगे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ नहीं बचेगा। यदि मानव को पृथ्वी पर अपने अस्तित्व को बनाये रखना है तो प्राकृतिक कड़ियों से छेड़खानी हमें नहीं करनी चाहिए।

विज्ञान का भ्रम और प्रकृति की शक्ति

मानव जब से अस्तित्व में आया तब से उसकी जीवन प्रक्रिया में कई बढ़ाएं निश्चय ही आयी होंगी लेकिन फिर भी वह पृथ्वी पर अपनी जाति के जीवन को अब तक बचाने में कामयाब रहा है। लेकिन अब हालात नकारात्मक दिशा में बदले है। कुछ सौ वर्षों से इंसान को पृथ्वी पर अधिक संघर्ष करते देखा जा रहा है।

कई वैज्ञानिक खोजों और आविष्कारों से मानव को यह भ्रम हुआ कि उसने प्रकृति को जीत लिया। प्रकृति पर मानव द्वारा विजय हासिल करने का इंसान ने कई बार जश्न मनाया है जब इसे किसी प्लेग, चेचक, हैजा, पोलियो जैसी बीमारियों पर विजय हासिल हुई एवं मानव के पांव जब चाँद तक पहुंच गए। लेकिन वास्तव में प्रकृति सदा से अजेय रही है। उसे कोई नहीं जीत पाया। हम एक बीमारी का इलाज ढूंढते हैं तब तक दूसरी प्रकट हो जाती जाती है। यह हम इतिहास के पन्नों से देख सकते हैं।

संक्रामक बीमारियाX और जैविक संतुलन

वैश्विक महामारी के दौरान सूनी पड़ी दुनिया और बंद शहरों का दृश्य
वैश्विक महामारी के दौरान सूनी पड़ी दुनिया और बंद शहरों का दृश्य
संयुक्त राष्ट्रसंघ के अनुसार हर 4 महीने में एक नई संक्रामक बीमारी से आज हमारा सामना हो रहा है। विज्ञान इन सब नई नई बीमारियों के इलाज ढूढ़ने में हर बार लगा है और सफलता भी हासिल की है परंतु फिर भी कोई ऐसा पल नहीं आया जब मानव को कोई ऐसी बीमारियों की कोई चुनौती शेष न रह गई हो।

कारणों पर जाएंगे तो पता चलता है कि इन संक्रामक बीमारियों में से 75 प्रतिशत जानवरों से मानव में फैलती है। जैसे जैसे हमने जीवों की बायोलॉजिकल प्राकृतिक श्रृंखला को तोड़ने की कोशिश की है हमे मतलब मानव को किसी मुसीबत से जरूर दो चार होना पड़ा है।

कोरोना वायरस और मानव हस्तक्षेप

आप नॉवेल कोरोना19 वायरस का ही उदाहरण ले लें। अभी तक की थ्योरी के मुताबिक यह वायरस या तो चीन के वुहान शहर के वेट मार्किट में प्रतिबंधित चमगादड़ और पेंगोलिन जैसे जीवो के अवैध व्यापार से मानव में फैला है या यह वायरस चीन की वुहान प्रयोगशाला में मानव द्वारा ही बनाया गया है जो किसी वजह से मानव में फैला।

दुनिया के सामने सच्चाई सामने आने में हो सकता है लंबा समय लगे पर इस संकट का निष्कर्ष एक ही है कि मानव ने प्राकृतिक श्रृंखला से छेड़छाड़ की है और उसी का नतीजा आज पूरा विश्व भुगत रहा है। हमने बायोडायवर्सिटी की नैसर्गिकता को कहीं न कही विघटित किया है।

आज सारे पृथ्वी के निवासी एक दूसरे से बहुत अच्छे से जुड़े हैं यही कारण है कि नॉवेल कोरोना19 जैसा वायरस कुछ ही दिनों में दुनिया के तमाम देशो को अपनी चपेट में ले पाया। आज विज्ञान ने जो आपस की दूरियां कम कर दी ऐसे समय में कोरोना का तेजी से फैलना लाजमी है।

वैश्विक संकट और मानव की विवशता

भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को माता मानने की परंपरा को दर्शाती तस्वीर।
भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को माता मानने की परंपरा को दर्शाती तस्वीर।
आज ऐसी ही ग्लोबल चुनौतियां मानव के सामने खड़ी है। ज्ञात इतिहास में दुनिया की अधिकांश जनसंख्या आज पहली बार अपने अपने घरो में बंद रहने को मजबूर हुई है। पूरा विश्व ठप्प पड़ा है, अर्थव्यवस्था चौपट हो रही है लेकिन मानव का अस्तित्व बरकरार रहना चाहिए इसी जद्दोजहद में सब चुपचाप, बेबस लाचार नजर आ रहे हैं। मानव सदा से एक जुझारू प्राणी है। कोरोना वायरस का भी वह कोई न कोई तोड़ जल्द निकाल लेगा ऐसी उम्मीद है। एक दिन इससे वह जीतेगा भी लेकिन सवाल यह है कि क्या आगे ऐसी कोई समस्या नहीं आएगी ? इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता।

समाधान क्या है?

हां, यदि हम वास्तव में मानव जीवन की निरंतरता को इस धरा पर देखना चाहते हैं तो हमें इस पृथ्वी की प्राकृतिक स्थिति में बदलाव की गतिविधियों को तत्काल बंद करना पड़ेगा। उतनी ही गतिविधियों को मानव जारी रखे जो सतत विकास की राह में रोड़ा न बने, हमे अर्थव्यवस्था का सतत विकास का मॉडल अपनाना होगा, हमें पृथ्वी और प्रकृति के संबंधों का सम्मान करना होगा अन्यथा जैसे हज़ारो प्राणियों की प्रजातियां हर वर्ष पृथ्वी से लुप्त हो रही है या विलुप्ति के कगार पर है। उसी प्रकार मानव जाति पर भी यह संकट आ सकता है और हम भी डाइनासोर जैसे जीवों की तरह पृथ्वी के जीवों के इतिहास में सिर्फ इतिहास बनकर रह जा सकते हैं।

भारत दुनिया को दे सकता है दिशा

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत दुनिया को एक नई दिशा दे सकता है। हम विश्व गुरु ऐसे ही नहीं कहलाते। भारतवर्ष की प्राचीन संस्कृति पृथ्वी को माँ के समान मानकर चलती है। हमारी संस्कृति उग्र रूप धारण कर पृथ्वी का दोहन करने की शिक्षा हमें नही देती है बल्कि उसमे तो विनम्रता की गहराई है। माँ और बच्चे का सा अपनत्व और ममता का सम्बंध है। और जैसे माँ से छीना झपटी नही होती उसी प्रकार हम पृथ्वी के संसाधनों का दोहन ऐसा नही करते थे कि आगामी पीढ़ियों के लिए संकट पैदा हो जाये। हम तो माँ के कर्जदार है। माँ की गोद मे हमारा हज़ारो वर्षों से पालन हमारे लिए गर्व की बात है।

भारतीय ग्रंथों में पृथ्वी का सम्मान

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अथर्ववेद में कहा गया है कि 'माता भूमि':, पुत्रो अहं पृथिव्या:। अर्थात भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं… इसी प्रकार यजुर्वेद में भी कहा गया है- 'नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्या:। अर्थात माता पृथ्वी को नमस्कार है, मातृभूमि को नमस्कार है। ऐसा ही भाव हम वाल्मीकि रामायण में भी देखते हैं जहाँ कहा गया है 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' अर्थात जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है।

अंतिम चेतावनी

यही संस्कृति हमे सदियों से जिंदा रखे हुए हैं। आज हम पश्चिम की भोगवादी संस्कृति के अनुगामी हो चले थे। परंतु आज आप देख रहे हैं कि उसका परिणाम क्या निकला। जो देश दुनिया को मिनटों में तहस नहस करने का दम भरते थे, जिनके पास परमाणु शक्ति है, अकूत गोला बारूद और अन्य सब हथियार हैं लेकिन फिर भी वे आज एक छोटे से नंगी आंखों से दिखाई भी नही देने वाले एक नोवेल कोरोना19 नामक वायरस के सामने घुटने टेककर खड़े हैं। अब भी समय है मानव के पास कि वह इस गंभीर कोरोना संकट की चेतावनी को समझे और संभल जाए नहीं तो परिणाम क्या होंगे इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।

(एचएन मीना सीजीेेएसटी कोलकाता पश्चिम बंगाल में अपर आयुक्त हैं उनका ये लेख मूल रूप से 22 अप्रैल 2022 को प्रकाशित हुआ था)
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