अल नीनो से भारत की 300 अरब डॉलर की कृषि आपूर्ति शृंखला पर मंडराया ख़तरा, बढ़ सकती हैं किसानों की मुश्किलें, क्या बढ़ेगी महँगाई ?
Gaon Connection | Jun 25, 2026, 12:01 IST
भारत में मानसून की धीमी रफ़्तार और एल नीनो के प्रभाव से खरीफ़ सीज़न की बुआई प्रभावित होने की आशंका है। इससे सोयाबीन, गन्ना, कपास, दालें और खाद्य तेल जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। कम वर्षा से खाद्य महँगाई बढ़ने और कृषि आपूर्ति शृंखला पर दबाव बनने की संभावना जताई गई है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक़, इससे भारत की 300 अरब डॉलर की कृषि अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
मानसून में देरी के बाद अब अल नीनो की मार
देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी रफ़्तार खरीफ़ सीज़न की बुआई पर असर डालने लगी है। जून का महीना धान, कपास, सोयाबीन, बाजरा जैसी खरीफ़ फसलों की बुआई के लिए सबसे अहम माना जाता है लेकिन कई हिस्सों में बारिश में हुई देरी के कारण किसान अब भी पर्याप्त वर्षा का इंतज़ार कर रहे हैं। मानसून की यह सुस्ती ऐसे समय में आई है, जब देश की लगभग 300 अरब डॉलर की कृषि अर्थव्यवस्था और खाद्य आपूर्ति शृंखला बड़े पैमाने पर समय पर होने वाली वर्षा पर निर्भर रहती है।
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा अल नीनो आने वाले महीनों में भारत के मानसून को और कमज़ोर कर सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे न केवल खरीफ़ फसलों का उत्पादन प्रभावित होने का ख़तरा बढ़ेगा, बल्कि खाद्य तेल, चीनी, कपास और दालों जैसी आवश्यक कृषि जिंसों की क़ीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है। इससे महँगाई पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई है।
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्यतः जून में समयबद्ध ढंग से आगे बढ़ता है और उसी के आधार पर खरीफ़ फसलों की बुआई का कैलेंडर तय होता है। इस बार मुंबई तक मानसून पहुँचने में लगभग दो सप्ताह की देरी हुई, जिससे किसानों के बीच चिंता बढ़ गई है। जून खरीफ़ फसलों की बुआई का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। किसान पहली अच्छी बारिश के बाद ही खेतों में बुआई शुरू करते हैं। ऐसे में जून के अंतिम सप्ताह तक कई क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा नहीं होने से खेती प्रभावित हो रही है।
ब्लूमबर्ग के अनुसार, सूखे जैसी स्थिति का सबसे अधिक असर मध्य भारत और दक्कन क्षेत्र में देखा जा रहा है। इसमें राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के बड़े कृषि क्षेत्र शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़, यही क्षेत्र देश के लगभग 90 प्रतिशत सोयाबीन और गन्ना, 80 प्रतिशत कपास तथा 70 प्रतिशत मूँगफली और दलहन, जैसे मसूर और चने का उत्पादन करते हैं। इसके अलावा फल और सब्ज़ियों की खेती में भी इन राज्यों की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है, जिससे इन क्षेत्रों का असर देशभर के कृषि बाज़ारों पर पड़ता है।
रिपोर्ट में महाराष्ट्र के नासिक का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि यह ज़िला देश के प्रमुख प्याज़ उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। प्याज़ की क़ीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू बजट और महँगाई पर पड़ता है। मानसून कमज़ोर रहने पर अगस्त और सितंबर में प्याज़ की क़ीमतों में तेज़ उछाल देखा जाता है। जून में नासिक में अब तक सामान्य वर्षा का केवल 16 प्रतिशत ही रिकॉर्ड किया गया है।
भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले सभी कारकों की पूरी समझ अभी वैज्ञानिकों के पास नहीं है। इसलिए मानसून की शुरुआती देरी का कारण केवल एल नीनो को नहीं माना जा सकता। हालाँकि, जैसे-जैसे वर्ष आगे बढ़ेगा, एल नीनो का प्रभाव बढ़ने की संभावना है। रिपोर्ट के अनुसार, इससे पिछले 11 वर्षों का सबसे कमज़ोर मानसून देखने को मिल सकता है। देर से बोई गई फसलें भी कम वर्षा और सूखे जैसी परिस्थितियों का सामना कर सकती हैं।
यदि बारिश सामान्य से कम रहती है तो खाद्य तेल, चीनी, कपास और सस्ते प्रोटीन के प्रमुख स्रोत दलहनों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे खाद्य महँगाई बढ़ने की आशंका है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपने आर्थिक अनुमानों में असामान्य मौसम को एक प्रमुख जोखिम के रूप में चिह्नित किया है।
वर्ष 2023 में मानसून की अनियमितता और बाढ़ के बाद केंद्र सरकार ने घरेलू बाज़ार में क़ीमतों को नियंत्रित रखने के लिए चावल के निर्यात पर रोक लगाई थी। भारत वैश्विक चावल व्यापार का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध कराता है। यदि मौजूदा मौसम की स्थिति बनी रहती है तो चीनी के निर्यात पर भी नई पाबंदियाँ लगाए जाने की संभावना बढ़ सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की कृषि व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक मज़बूत हुई है। उर्वरकों का पर्याप्त भंडार, चावल और गेहूँ का बेहतर सरकारी स्टॉक, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, फसल विज्ञान में प्रगति और बेहतर लॉजिस्टिक्स ने खाद्य प्रणाली को अधिक लचीला बनाया है। इसके बावजूद जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही अनिश्चितता बड़ी चुनौती बनी हुई है। दक्षिण एशिया की लगभग एक-चौथाई आबादी सदियों से मानसून पर निर्भर रही है, लेकिन वैश्विक तापवृद्धि के कारण मानसून का समय और स्वरूप लगातार अनिश्चित होता जा रहा है। इससे सूखा और बाढ़ जैसी चरम मौसम घटनाओं का जोखिम बढ़ रहा है। यदि सुपर अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है, तो इसका असर केवल भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक कृषि और खाद्य बाज़ारों पर भी महसूस किया जाएगा।
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा अल नीनो आने वाले महीनों में भारत के मानसून को और कमज़ोर कर सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे न केवल खरीफ़ फसलों का उत्पादन प्रभावित होने का ख़तरा बढ़ेगा, बल्कि खाद्य तेल, चीनी, कपास और दालों जैसी आवश्यक कृषि जिंसों की क़ीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है। इससे महँगाई पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई है।