अल नीनो और बढ़ती गर्मी से फसलों पर बड़ा खतरा, कमजोर मानसून ने बढ़ाईं दो बड़ी चिंताएं
Umang | May 20, 2026, 15:51 IST
देश में लगातार बढ़ती गर्मी और अल नीनो के कारण खरीफ फसलों पर संकट मंडरा रहा है। धान, दाल और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे खाद्य महंगाई बढ़ने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव आने की आशंका है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मानसून कमजोर रहने की संभावना है।
मानसून पर अल नीनो असर
देश में लगातार बढ़ती गर्मी और अल नीनो (El Niño) की आशंका ने खरीफ फसलों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। 'फाइनेंशियल एक्सप्रेस' के मुताबिक, विशेषज्ञों का कहना है कि हीटवेव, कमजोर मानसून और बारिश के असमान वितरण का असर इस साल धान, दाल, तिलहन और अन्य प्रमुख खरीफ फसलों के उत्पादन पर पड़ सकता है। इससे खाद्य महंगाई बढ़ने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने का खतरा भी पैदा हो गया है। देश के पश्चिमी, उत्तरी और मध्य हिस्सों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आने से पहले ही भीषण गर्मी का दौर जारी है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अल नीनो प्रभाव के कारण इस बार मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। अल नीनो दरअसल प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से के समुद्री सतह के तापमान में बढ़ोतरी से जुड़ी स्थिति है, जो मानसून की गतिविधियों को कमजोर करती है।
एचएसबीसी ग्लोबल इन्वेस्टमेंट रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 1950 के दशक से औसत तापमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इसका असर अब खेती पर साफ दिखाई देने लगा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती गर्मी का असर सब्जियों, फलों, अनाज, दालों और तिलहन जैसी फसलों के उत्पादन और कीमतों दोनों पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक तापमान पौधों में हीट स्ट्रेस पैदा करता है, जिससे फूल आने और दाना बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों घट जाते हैं। उदाहरण के तौर पर धान की पैदावार में 32 से 40 प्रतिशत तक गिरावट आने की आशंका जताई गई है।
भारत में करीब 40 प्रतिशत खाद्य उत्पादन वर्षा आधारित खेती से आता है। ऐसे में मानसून में कमी या बारिश का असमान वितरण सीधे किसानों और खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। मौसम विभाग के अनुसार मानसून 26 मई के आसपास केरल पहुंच सकता है, लेकिन अल नीनो की वजह से बारिश कमजोर रहने की आशंका बनी हुई है। अमेरिकी एजेंसियों ने भी मई से जुलाई के बीच अल नीनो के जल्दी सक्रिय होने की संभावना जताई है, जिससे मानसून की समय और क्षेत्र के हिसाब से वितरण प्रणाली प्रभावित हो सकती है।
केरल स्थित एडवांस्ड सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक रडार रिसर्च के निदेशक एस अभिलाष के मुताबिक अल नीनो के कारण बादल कम बनते हैं, जमीन में नमी घटती है और तापमान तेजी से बढ़ता है। इसके चलते देश के कई हिस्सों में लंबे और तीव्र हीटवेव की स्थिति पैदा होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार हीटवेव और कमजोर बारिश से फ्लैश ड्रॉट यानी अचानक सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है, जो खेती के लिए बेहद खतरनाक होती है।
फाइनेंशियल एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक 2014, 2015, 2017, 2018 और 2023 जैसे वर्षों में जब बारिश सामान्य से कम रही, तब खरीफ खाद्यान्न उत्पादन की वार्षिक वृद्धि औसतन 0.09 प्रतिशत तक सिमट गई थी। वहीं 2016, 2019, 2020, 2021, 2022, 2024 और 2025 में सामान्य या सामान्य से अधिक बारिश होने पर खरीफ उत्पादन में औसतन 4.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसी तरह कमजोर मानसून वाले वर्षों में कृषि क्षेत्र की औसत वृद्धि दर 2.4 प्रतिशत रही, जबकि सामान्य बारिश वाले वर्षों में यह बढ़कर 5 प्रतिशत तक पहुंच गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती गर्मी और सूखे के खतरे से निपटने के लिए जलवायु अनुकूल खेती को तेजी से बढ़ावा देना होगा। राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के तहत जिला स्तर पर रणनीति तैयार करने की जरूरत बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार 2014 से 2025 के बीच 2,996 जलवायु अनुकूल फसल किस्में विकसित की गई हैं। उत्तर-पश्चिम भारत में गर्मी सहने वाली गेहूं की किस्मों का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है। विशेषज्ञों ने कहा है कि किसानों तक इन बीजों की आसान उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अधिक सीड बैंक बनाए जाने चाहिए और जलवायु अनुकूल तकनीकों का प्रदर्शन संवेदनशील जिलों में किया जाना चाहिए।