गन्ना-मक्का छोड़ सोयाबीन की ओर लौट रहे किसान, रकबा बढ़ने की उम्मीद, क्या मिलेगी तेल कीमतों से राहत?
Gaon Connection | Jun 16, 2026, 16:49 IST
सोयाबीन के दाम चार साल के उच्च स्तर पर पहुंचने और अल नीनो के कारण कम बारिश की आशंका से किसानों का रुझान इस खरीफ़ सीज़न में सोयाबीन की ओर बढ़ सकता है। उद्योग के अनुसार सोयाबीन का रकबा 10% तक बढ़ सकता है। उत्पादन बढ़ने पर खाद्य तेल आयात घटेगा, घरेलू उपलब्धता बढ़ेगी और पोल्ट्री उद्योग को भी लाभ मिलेगा।
कम बारिश की आशंका में किसानों का सोयाबीन पर भरोसा
देश में इस खरीफ़ सीज़न सोयाबीन की बुवाई बढ़ने की उम्मीद है। सोयाबीन के दाम चार साल के उच्च स्तर पर पहुँचने और अल नीनो के कारण सामान्य से कम बारिश की आशंका के चलते किसान मक्का और गन्ने जैसी अधिक पानी वाली फसलों की जगह सोयाबीन की खेती को प्राथमिकता दे सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो देश में सोयाबीन उत्पादन बढ़ेगा, जिससे खाद्य तेल आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
सोयाबीन भारत की प्रमुख खरीफ़ तिलहन फसल है। इसका उत्पादन बढ़ने से पाम ऑयल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल के आयात की आवश्यकता घट सकती है। साथ ही घरेलू बाजार में सोयाबीन और सोयामील की उपलब्धता बढ़ने से कीमतों पर दबाव कम होगा, जिसका लाभ पोल्ट्री उद्योग को भी मिल सकता है, क्योंकि सोयामील पोल्ट्री क्षेत्र का प्रमुख पशु आहार है।
महाराष्ट्र ऑयल एक्सट्रैक्शंस के प्रबंध निदेशक मनोज अग्रवाल के अनुसार पिछले वर्ष कई किसानों ने सोयाबीन छोड़कर मक्का की खेती की थी, लेकिन इस बार सोयाबीन बेहतर मुनाफा दे रही है। ऐसे में किसानों के फिर से सोयाबीन की ओर लौटने की संभावना है। पिछले महीने सोयाबीन की कीमत 7,587 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुँच गई, जो चार वर्षों का उच्चतम स्तर है। यह सरकार द्वारा तय 5,328 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से भी काफी अधिक है। दूसरी ओर मक्का के दाम 2,400 रुपये प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य से नीचे बने हुए हैं।
PTI के अनुसार, उद्योग से जुड़े अधिकारियों का अनुमान है कि इस वर्ष देश में सोयाबीन का रकबा 10 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। वर्ष 2025 में किसानों ने लगभग 1.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की खेती की थी। बेहतर दाम और मौसम की परिस्थितियों को देखते हुए इस बार क्षेत्रफल बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
किसान आमतौर पर मानसून की शुरुआत के साथ जून में सोयाबीन और अन्य खरीफ़ फसलों की बुवाई शुरू करते हैं। अल नीनो के प्रभाव के कारण इस वर्ष मानसून सामान्य से कमज़ोर रह सकता है जिससे वर्षा पर निर्भर खेती प्रभावित हो सकती है। ऐसे में सोयाबीन किसानों के लिए बेहतर विकल्प बन रही है क्योंकि इसे गन्ने और मक्का की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है।
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA) के कार्यकारी निदेशक डी. एन. पाठक का कहना है कि सोयाबीन का रकबा बढ़ने की संभावना तो है, लेकिन अंतिम उत्पादन मानसून के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। यदि उत्पादन बढ़ता है तो देश में बढ़ते सोयाबीन तेल आयात पर अंकुश लगाया जा सकेगा। पिछले वर्ष उत्पादन कम रहने के कारण भारत का सोयाबीन आयात रिकॉर्ड 9 लाख टन तक पहुँचने का अनुमान है। भारत अपनी पाम ऑयल आवश्यकता का अधिकांश हिस्सा इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात करता है, जबकि सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल मुख्य रूप से अर्जेंटीना, ब्राज़ील, रूस और यूक्रेन से खरीदे जाते हैं।
सोयाबीन भारत की प्रमुख खरीफ़ तिलहन फसल है। इसका उत्पादन बढ़ने से पाम ऑयल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल के आयात की आवश्यकता घट सकती है। साथ ही घरेलू बाजार में सोयाबीन और सोयामील की उपलब्धता बढ़ने से कीमतों पर दबाव कम होगा, जिसका लाभ पोल्ट्री उद्योग को भी मिल सकता है, क्योंकि सोयामील पोल्ट्री क्षेत्र का प्रमुख पशु आहार है।