7 फ़ीट की लौकी और ढाई फ़ीट की सेम उगाने वाले किसान रघुपत सिंह को मिला मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान, जानें उनकी कहानी

Umang | Jun 25, 2026, 16:54 IST
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उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के किसान स्वर्गीय रघुपत सिंह को पारंपरिक बीजों के संरक्षण और टिकाऊ खेती में योगदान के लिए वर्ष 2026 में मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान दिया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने यह सम्मान उनकी पत्नी प्रेमवती को प्रदान किया। रघुपत सिंह ने 100 से अधिक नई प्रजातियाँ विकसित कीं और तीन लाख से अधिक किसानों को खेती के नए प्रयोगों से जोड़ा।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से पद्मश्री सम्मान ग्रहण करतीं स्वर्गीय रघुपत सिंह की पत्नी प्रेमवती
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से पद्मश्री सम्मान ग्रहण करतीं स्वर्गीय रघुपत सिंह की पत्नी प्रेमवती
पारंपरिक बीजों के संरक्षण, टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने और विलुप्त होती सब्ज़ियों की प्रजातियों को बचाने के लिए जीवन समर्पित करने वाले उत्तर प्रदेश के किसान स्वर्गीय रघुपत सिंह को वर्ष 2026 में मरणोपरांत पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कृषि क्षेत्र में उनके अद्वितीय योगदान के लिए यह सम्मान प्रदान किया, जिसे उनकी पत्नी प्रेमवती ने ग्रहण किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे गौरवपूर्ण और प्रेरणादायी बताया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि रघुपत सिंह ने पाँच दशकों से अधिक समय तक कृषि सेवा के प्रति समर्पित रहकर भारतीय कृषि को नई दिशा दी। उन्होंने अपना जीवन पारंपरिक बीजों के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित किया तथा किसानों के जीवन को समृद्ध बनाने में असाधारण योगदान दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि आत्मनिर्भर कृषि और जैव विविधता संरक्षण को सशक्त बनाने में उनकी भूमिका सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।


देसी बीजों के संरक्षण को बनाया जीवन का लक्ष्य

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद ज़िले के समाथल गाँव के रहने वाले रघुपत सिंह ने बहुत पहले ही यह महसूस कर लिया था कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव के बीच किसानों के लिए टिकाऊ खेती और देसी बीजों का संरक्षण बेहद ज़रूरी है।

विलुप्त होती सब्ज़ियों को बचाने का लिया संकल्प

करीब 35 वर्ष पहले रघुपत सिंह ने देखा कि लोगों की थाली से कई पारंपरिक सब्ज़ियाँ धीरे-धीरे गायब होती जा रही हैं। इसके बाद उन्होंने विलुप्त होती सब्ज़ियों की प्रजातियों को खोजने, संरक्षित करने और दोबारा उगाने का संकल्प लिया।

किसानों तक मुफ़्त पहुँचाए बीज

रघुपत सिंह स्वयं को हमेशा एक साधारण किसान मानते रहे, लेकिन उनका कार्य असाधारण था। उन्होंने खेतों से बीजों को सुरक्षित कर किसानों को मुफ़्त या न्यूनतम लागत पर उपलब्ध कराया। अपने जीवनकाल में उन्होंने दालों से लेकर सब्ज़ियों तक 100 से अधिक नई प्रजातियाँ विकसित कीं और तीन लाख से अधिक किसानों को खेती के नए प्रयोगों से जोड़ा।

कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से हुए सम्मानित

कृषि क्षेत्र में नवाचारों के लिए रघुपत सिंह को पद्मश्री से पहले 11 राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी उनके प्रयासों की सराहना कर चुके हैं।

वर्ष 2025 में हुआ निधन

रघुपत सिंह ने पाँच दशकों से अधिक समय तक टिकाऊ खेती के लिए कार्य किया। एक जुलाई 2025 को 85 वर्ष की आयु में बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। वर्ष 2026 में उन्हें मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया, जिसे उनकी पत्नी प्रेमवती ने राष्ट्रपति से प्राप्त किया।
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