Cow Protection: अब Gen Z को भी गो संरक्षण से जोड़ने की तैयारी, गाँव-गाँव तैयार होंगे 10 हजार ‘गो मित्र’
Mansi | Aug 17, 2026, 18:26 IST
उत्तर प्रदेश सरकार की नई योजना गो संरक्षण को नई पीढ़ी के साथ जोड़ने की है। इसके तहत गाँवों में युवा जागरूकता अभियान चलाकर गो मित्रों का प्रशिक्षण किया जाएगा। गो सेवा आयोग से लगभग दस हजार गो मित्र तैयार किए जाएंगे, जो ग्रामीणों को गोबर से उत्पाद बनाने की क्षमता बढ़ाएंगे। यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाएगी और हरित ऊर्जा के विकास को भी प्रोत्साहित करेगी।
Gen Z बनेंगे ‘गो मित्र’
गोशालाओं और गो संरक्षण की चर्चा अब सिर्फ़ पशुपालन या ग्रामीण व्यवस्था तक सीमित नहीं रहने वाली है। उत्तर प्रदेश में सरकार इस अभियान को नई पीढ़ी, ख़ासकर Gen Z, से जोड़ने की तैयारी कर रही है। इसके लिए गाँव-गाँव जागरूकता अभियान चलाने और युवाओं को गो सेवा, देसी गोवंश, प्राकृतिक खेती और इससे जुड़े रोज़गार के अवसरों की जानकारी देने की योजना है।
इस पहल के तहत करीब 10 हजार ‘गो मित्र’ तैयार किए जाने की बात कही गई है। इसके लिए पहले मास्टर ट्रेनर बनाए जाएंगे, जो आगे गाँवों में लोगों को प्रशिक्षण देंगे। गो संरक्षण में पहले से रुचि रखने वाले लोगों को प्राथमिकता देने की योजना है। सरकार की कोशिश है कि युवाओं की भागीदारी के ज़रिए गो संरक्षण को सिर्फ़ सेवा से नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोज़गार से भी जोड़ा जाए।
उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता के अनुसार, नई पहल में बच्चों और युवाओं तक गो संरक्षण का संदेश पहुँचाने पर ख़ास ज़ोर दिया जाएगा। गाँवों में अभियान के ज़रिए उन्हें बताया जाएगा कि गोवंश का महत्व सिर्फ़ पशुपालन तक सीमित नहीं है। प्राकृतिक खेती, जैविक खाद, गोबर से बनने वाले उत्पाद और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी इसकी भूमिका हो सकती है। युवाओं को इस पूरी प्रक्रिया से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था बनाई जाएगी। पहले मास्टर ट्रेनर तैयार होंगे और फिर वे दूसरे लोगों को प्रशिक्षित करेंगे। इससे गाँवों में स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित लोगों का नेटवर्क तैयार करने की कोशिश होगी।
उत्तर प्रदेश में निराश्रित गोवंश के संरक्षण के लिए बड़ी संख्या में गो-आश्रय स्थल संचालित किए जा रहे हैं। सरकार के अनुसार, प्रदेश में 7,500 से अधिक गो-आश्रय स्थल हैं, जहाँ 12 लाख से ज़्यादा गोवंश संरक्षित हैं। गोवंश के भरण-पोषण के लिए मिलने वाली सहायता राशि भी बढ़ाई गई है। इसे ₹30 से बढ़ाकर ₹50 प्रति गोवंश प्रतिदिन किया गया है। कई गो-आश्रय स्थलों में निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था भी की गई है। सरकार अब गो संरक्षण को ग्रामीण आय और रोज़गार से जोड़ने पर भी ज़ोर दे रही है। गोबर से गो-काष्ठ, वर्मी कम्पोस्ट, दीपक, गमले, धूपबत्ती और अगरबत्ती जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इसके साथ ही बायोगैस और प्राकृतिक खेती से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने की कोशिश है।
इस काम में महिला स्वयं सहायता समूहों को भी जोड़ा जा रहा है। इससे गाँव में ही महिलाओं के लिए छोटे स्तर पर स्वरोज़गार के अवसर तैयार किए जा सकते हैं। यानी जिस गोबर को पहले बेकार समझकर छोड़ दिया जाता था, उसका इस्तेमाल खाद, ऊर्जा और दूसरे उत्पाद बनाने में किया जा सकता है।
गो संरक्षण में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री सहभागिता योजना और पोषण मिशन जैसी पहलों के ज़रिए गोवंश को पशुपालकों को सौंपने की व्यवस्था भी की गई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़, करीब 1.15 लाख पशुपालकों को लगभग 1.85 लाख गोवंश सौंपे गए हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य निराश्रित गोवंश को परिवार आधारित संरक्षण देना है। साथ ही पशुपालकों को भी गोवंश से जुड़ी गतिविधियों में शामिल करके ग्रामीण स्तर पर आय के नए रास्ते तैयार करने की कोशिश की जा रही है।
गो सेवा आयोग अब अलग-अलग ज़िलों में उपलब्ध संसाधनों और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए गो-आधारित गतिविधियों की संभावनाएँ तलाशने की तैयारी कर रहा है। जहाँ गोबर से बायोगैस बनाने की बेहतर संभावना होगी, वहाँ उस दिशा में काम किया जा सकता है। किसी दूसरे ज़िले में वर्मी कम्पोस्ट, गो-काष्ठ या गोमूत्र आधारित उत्पादों की इकाइयों को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसका मक़सद एक ऐसा स्थानीय मॉडल तैयार करना है, जिसमें गो संरक्षण के साथ खेती, महिला रोज़गार, हरित ऊर्जा और ग्रामीण आय को भी जोड़ा जा सके।
गो संरक्षण अभियान में युवाओं को जोड़ने की योजना सामने आ चुकी है। अब इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशिक्षण और जागरूकता की यह पहल गाँवों में किस तरह लागू होती है और युवाओं को इससे कितने व्यावहारिक अवसर मिलते हैं। अगर योजना ज़मीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से आगे बढ़ती है, तो गो संरक्षण को केवल आश्रय देने तक सीमित रखने के बजाय इसे प्राकृतिक खेती, स्थानीय रोज़गार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश को नया आधार मिल सकता है।
इस पहल के तहत करीब 10 हजार ‘गो मित्र’ तैयार किए जाने की बात कही गई है। इसके लिए पहले मास्टर ट्रेनर बनाए जाएंगे, जो आगे गाँवों में लोगों को प्रशिक्षण देंगे। गो संरक्षण में पहले से रुचि रखने वाले लोगों को प्राथमिकता देने की योजना है। सरकार की कोशिश है कि युवाओं की भागीदारी के ज़रिए गो संरक्षण को सिर्फ़ सेवा से नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोज़गार से भी जोड़ा जाए।
Gen Z को क्यों जोड़ा जा रहा है गो संरक्षण अभियान से?
7,500 से ज़्यादा गो-आश्रय स्थलों में लाखों गोवंश
इस काम में महिला स्वयं सहायता समूहों को भी जोड़ा जा रहा है। इससे गाँव में ही महिलाओं के लिए छोटे स्तर पर स्वरोज़गार के अवसर तैयार किए जा सकते हैं। यानी जिस गोबर को पहले बेकार समझकर छोड़ दिया जाता था, उसका इस्तेमाल खाद, ऊर्जा और दूसरे उत्पाद बनाने में किया जा सकता है।
पशुपालकों की भागीदारी बढ़ाने पर भी ज़ोर
हर ज़िले के हिसाब से तैयार होगा गो-आधारित मॉडल
गो संरक्षण अभियान में युवाओं को जोड़ने की योजना सामने आ चुकी है। अब इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशिक्षण और जागरूकता की यह पहल गाँवों में किस तरह लागू होती है और युवाओं को इससे कितने व्यावहारिक अवसर मिलते हैं। अगर योजना ज़मीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से आगे बढ़ती है, तो गो संरक्षण को केवल आश्रय देने तक सीमित रखने के बजाय इसे प्राकृतिक खेती, स्थानीय रोज़गार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश को नया आधार मिल सकता है।