1 किलो प्लास्टिक कचरे के बदले इस कैफे में मिलता है भरपेट भोजन, 500 ग्राम कूड़े से मिलता है नाश्ता, जानिए इस पहल की पूरी कहानी
Mansi | Aug 11, 2026, 13:05 IST
छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में गार्बेज कैफ़े प्लास्टिक कचरे के बदले भोजन उपलब्ध कराता है। यह पहल शहर की गंदगी कम करने के साथ जरूरतमंदों को सम्मान देती है। एक किलो प्लास्टिक पर पूरा भोजन और आधे किलो पर नाश्ता मिलता है। वर्ष 2019 से अब तक 24 हजार से अधिक लोगों को भोजन मिल चुका है। यह कैफ़े कचरा प्रबंधन और सामाजिक सम्मान को एक साथ जोड़ता है।
अंबिकापुर का गार्बेज कैफ़े प्लास्टिक कचरे के बदले भोजन देकर स्वच्छता और सम्मान, दोनों की मिसाल पेश कर रहा है
कचरा दीजिए, खाना लीजिए! सुनने में अजीब लगता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में यह कई सालों से हक़ीक़त है। यहाँ सड़क और गलियों से उठाया गया प्लास्टिक कचरा सीधे किसी ज़रूरतमंद की थाली तक पहुँचने का रास्ता बन रहा है। नियम भी बेहद आसान है-1 किलो प्लास्टिक के बदले पूरा भोजन और 500 ग्राम के बदले नाश्ता।
यह सिर्फ़ कचरे के बदले खाना देने की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है, जहाँ शहर की गंदगी कम करने के साथ किसी भूखे इंसान को सम्मान के साथ भोजन भी मिल रहा है। अंबिकापुर का ‘गार्बेज कैफ़े’ दिखाता है कि सही सोच और व्यवस्था हो तो कचरा भी किसी के लिए भोजन, सम्मान और बदलाव का ज़रिया बन सकता है।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा ज़िले में स्थित अंबिकापुर नगर निगम ने वर्ष 2019 में ‘गार्बेज कैफ़े’ की शुरुआत की थी। इसका मक़सद प्लास्टिक कचरे को सड़कों और सार्वजनिक जगहों से हटाने के साथ-साथ उन लोगों तक भोजन पहुँचाना था, जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। बस स्टैंड के पास शुरू किए गए इस कैफ़े तक कोई भी व्यक्ति प्लास्टिक कचरा लेकर पहुँच सकता है। खासकर गरीब, बेघर और कचरा बीनने वाले लोगों के लिए यह पहल उम्मीद की तरह सामने आई। यहाँ उन्हें पैसे न होने की वजह से किसी के सामने हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वे प्लास्टिक जमा करते हैं और उसके बदले भोजन प्राप्त करते हैं। यानी जिस प्लास्टिक को हम अक्सर बेकार समझकर सड़क पर छोड़ देते हैं, वही किसी दूसरे के लिए एक समय के भोजन का ज़रिया बन जाता है।
इस कैफ़े की व्यवस्था बेहद सरल रखी गई है। 1 किलो प्लास्टिक कचरा लाने पर एक समय का पूरा भोजन। 500 ग्राम प्लास्टिक कचरा लाने पर नाश्ता या गरमा-गरम स्नैक्स। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि लोगों को प्लास्टिक कचरा जमा करने के लिए एक सीधा प्रोत्साहन मिलता है। सड़क पर पड़ा प्लास्टिक अब सिर्फ़ गंदगी नहीं दिखता, बल्कि उसे उठाने की एक वजह भी सामने होती है। जमा किया गया साफ़ और छंटाई किया हुआ प्लास्टिक आगे ठोस एवं तरल संसाधन प्रबंधन केंद्र की प्लास्टिक ग्रेन्युल इकाई में पुनर्चक्रण के लिए भेजा जाता है। इस तरह कैफ़े सीधे शहर की कचरा प्रबंधन व्यवस्था से जुड़ जाता है।
अंबिकापुर नगर निगम के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2019 से जून 2026 तक इस पहल के ज़रिए 24,296 लोगों को भोजन मिला, जबकि 20,077 किलोग्राम यानी 20 टन से अधिक प्लास्टिक कचरा जमा किया गया। वर्ष 2019 में 2,832 लोगों ने 2,555 किलोग्राम प्लास्टिक जमा किया था। 2020 में 5,185 लोगों ने 4,015 किलोग्राम प्लास्टिक जमा किया। इसके बाद भी यह सिलसिला जारी रहा। 2021 में 1,845 लोगों ने 1,825 किलोग्राम, 2022 में 3,410 लोगों ने 2,920 किलोग्राम, 2023 में 4,187 लोगों ने 3,285 किलोग्राम और 2024 में 3,029 लोगों ने 2,555 किलोग्राम प्लास्टिक जमा किया। वर्ष 2025 में 2,825 लोगों ने 2,174 किलोग्राम और जनवरी से जून 2026 के बीच 983 लोगों ने 748 किलोग्राम प्लास्टिक जमा किया। इन आंकड़ों में सिर्फ़ प्लास्टिक का वजन नहीं है, बल्कि हज़ारों थालियों तक पहुँचा भोजन और साफ़ हुई शहर की सड़कें भी शामिल हैं।
इस पहल की खासियत सिर्फ़ इसका सामाजिक उद्देश्य नहीं, बल्कि इसका आत्मनिर्भर मॉडल भी है। कैफ़े में कुल 10 टेबल हैं। इनमें से 2 टेबल प्लास्टिक कचरा लाकर भोजन करने वालों के लिए रखी गई हैं, जबकि बाकी 8 टेबल सामान्य ग्राहकों और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए हैं। इसके बदले नगर निगम को एकमुश्त प्रीमियम और मासिक किराया मिलता है। यानी व्यवस्था को लगातार चलाने के लिए पूरा आर्थिक बोझ नगर निगम पर नहीं पड़ता। इससे कैफ़े संचालक को व्यवसाय का अवसर मिलता है, नगर निगम को राजस्व मिलता है और शहर को प्लास्टिक कचरे से राहत मिलती है।
इस कहानी का सबसे भावुक पहलू शायद यही है कि यहाँ भोजन को सिर्फ़ दान की तरह नहीं दिया जाता। किसी ज़रूरतमंद व्यक्ति के लिए भूख सिर्फ़ पेट की समस्या नहीं होती, वह उसके आत्मसम्मान से भी जुड़ी होती है। गार्बेज कैफ़े में प्लास्टिक जमा करने के बदले भोजन मिलने से उसे अपने श्रम के बदले खाना मिलता है। यानी कोई व्यक्ति सड़क से प्लास्टिक उठाता है, उसे जमा करता है और फिर उसी मेहनत के बदले भोजन करता है। कचरा उठाने वाला हाथ यहाँ मदद माँगने वाला हाथ नहीं, बल्कि अपने हक़ का भोजन हासिल करने वाला हाथ बन जाता है।
अंबिकापुर का गार्बेज कैफ़े यह साबित करता है कि स्वच्छता केवल झाड़ू लगाने से नहीं आती। इसके लिए ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिसमें आम लोग भी बदलाव का हिस्सा बनें। यह पहल प्लास्टिक कचरा प्रबंधन, पुनर्चक्रण, भोजन और सामाजिक सम्मान को एक साथ जोड़ती है। स्वच्छ भारत मिशन-शहरी के तहत ऐसे नवाचार शहरों में कचरा प्रबंधन को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कभी सड़क किनारे पड़ा प्लास्टिक सिर्फ़ गंदगी की तस्वीर बनाता था। आज उसी प्लास्टिक से किसी के लिए भोजन की थाली सज रही है। और शायद अंबिकापुर के गार्बेज कैफ़े की सबसे बड़ी सीख यही है- जब सोच बदलती है, तो कचरा भी संसाधन बन जाता है और मदद भी सम्मान में बदल जाती है।
यह सिर्फ़ कचरे के बदले खाना देने की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है, जहाँ शहर की गंदगी कम करने के साथ किसी भूखे इंसान को सम्मान के साथ भोजन भी मिल रहा है। अंबिकापुर का ‘गार्बेज कैफ़े’ दिखाता है कि सही सोच और व्यवस्था हो तो कचरा भी किसी के लिए भोजन, सम्मान और बदलाव का ज़रिया बन सकता है।
जहाँ कचरा था, आज वहीं सज रही थाली
छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में नागरिकों को प्लास्टिक वेस्ट के बदले भोजन उपलब्ध कराता है गार्बेज कैफ़े
1 किलो प्लास्टिक पर पूरा खाना, आधे किलो पर नाश्ता
1 किलो कचरा दीजिए और बदले में पाइए भरपेट भोजन की थाली
24 हजार से ज़्यादा लोगों को मिला भोजन
24 हजार से ज़्यादा लोगों को मिला भोजन, 20 टन से अधिक प्लास्टिक कचरा हुआ जमा