सरकार ने जैविक खेती पर बढ़ाया फ़ोकस, चल रही दो बड़ी योजनाएँ, किसानों को मिल रही ₹46,500 प्रति हेक्टेयर तक की सहायता
Umang | Aug 05, 2026, 17:08 IST
केंद्र सरकार सहकारी मॉडल से देश में जैविक खेती को लगातार बढ़ावा दे रही है। परंपरागत कृषि विकास योजना और एमओवीसीडीएनईआर किसानों को व्यापक सहायता प्रदान करती हैं। ये योजनाएं उत्पादन से लेकर बाज़ार तक हर स्तर पर किसानों को सहयोग देती हैं। लाखों किसानों को इन योजनाओं का लाभ मिला है और जैविक खेती का दायरा बढ़ रहा है।
छोटे किसानों के लिए जैविक खेती बनेगी फ़ायदे का सौदा
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बताया कि केंद्र सरकार सहकारी मॉडल के माध्यम से देश में जैविक खेती को लगातार बढ़ावा दे रही है। उन्होंने कहा कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय वर्ष 2015-16 से परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ ईस्टर्न रीजन (एमओवीसीडीएनईआर) के ज़रिए किसानों को व्यापक सहायता उपलब्ध करा रहा है। इन योजनाओं का उद्देश्य किसानों को केवल जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करना नहीं, बल्कि उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण, प्रमाणन और बाज़ार तक हर स्तर पर सहयोग देना है।
अमित शाह ने कहा कि सरकार छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता देते हुए सहकारी मॉडल पर जैविक क्लस्टर विकसित कर रही है। इससे किसानों को एक मज़बूत आपूर्ति श्रृंखला का लाभ मिलेगा और उनके उत्पादों के लिए बेहतर बाज़ार तैयार होगा। सरकार का मानना है कि जैविक खेती के विस्तार से खेती की लागत कम होगी, मिट्टी की उर्वरता बनी रहेगी, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
दो योजनाओं के ज़रिए बढ़
देशभर में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) लागू की जा रही है, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों में मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ ईस्टर्न रीजन (एमओवीसीडीएनईआर) संचालित है। दोनों योजनाओं में किसानों को खेती की शुरुआत से लेकर प्रसंस्करण, प्रमाणन और विपणन तक हर स्तर पर सहायता दी जाती है। साथ ही छोटे और सीमांत किसानों को समूहों और क्लस्टरों के रूप में जोड़कर जैविक उत्पादों की बेहतर आपूर्ति व्यवस्था तैयार की जा रही है।
परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत किसानों को तीन वर्षों में प्रति हेक्टेयर 31,500 रुपये की सहायता दी जाती है। इसमें 15,000 रुपये प्रति हेक्टेयर सीधे किसानों के बैंक खातों में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से भेजे जाते हैं। यह राशि जैविक खाद, जैव उर्वरक और अन्य आवश्यक जैविक कृषि सामग्री ख़रीदने के लिए दी जाती है। योजना का संचालन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों के माध्यम से किया जाता है।
पूर्वोत्तर राज्यों के लिए चलाई जा रही एमओवीसीडीएनईआर योजना के तहत किसानों को तीन वर्षों में प्रति हेक्टेयर 46,500 रुपये तक की सहायता दी जाती है। इस योजना में किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) का गठन, जैविक कृषि सामग्री उपलब्ध कराना, प्रसंस्करण सुविधाओं का विकास और विपणन व्यवस्था को मज़बूत करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। योजना के तहत 32,500 रुपये प्रति हेक्टेयर जैविक कृषि निविष्टियों के लिए दिए जाते हैं, जिनमें 15,000 रुपये सीधे किसानों के खातों में डीबीटी के माध्यम से पहुँचते हैं।
30 जून 2026 तक परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत 18.93 लाख हेक्टेयर भूमि को जैविक खेती के दायरे में लाया जा चुका है। इस योजना से अब तक 33.63 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं। इसके लिए केंद्र सरकार ने 2,811.36 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की है। वहीं एमओवीसीडीएनईआर योजना के तहत 2.36 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती को बढ़ावा दिया गया है। इस योजना से 2.74 लाख किसानों को लाभ मिला है और अब तक 1,548.62 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की जा चुकी है।
सरकार का कहना है कि दोनों योजनाओं का उद्देश्य केवल जैविक खेती का रक़बा बढ़ाना नहीं है, बल्कि किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसमें उन्हें उत्पादन, प्रसंस्करण, प्रमाणन और विपणन की पूरी सुविधा एक ही ढाँचे में मिल सके। सहकारी मॉडल के माध्यम से किसानों को संगठित कर बेहतर बाज़ार, मूल्य संवर्धन और आय बढ़ाने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार को उम्मीद है कि इन योजनाओं से आने वाले वर्षों में जैविक खेती का दायरा और तेज़ी से बढ़ेगा तथा देश में टिकाऊ कृषि व्यवस्था को मज़बूती मिलेगी।
अमित शाह ने कहा कि सरकार छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता देते हुए सहकारी मॉडल पर जैविक क्लस्टर विकसित कर रही है। इससे किसानों को एक मज़बूत आपूर्ति श्रृंखला का लाभ मिलेगा और उनके उत्पादों के लिए बेहतर बाज़ार तैयार होगा। सरकार का मानना है कि जैविक खेती के विस्तार से खेती की लागत कम होगी, मिट्टी की उर्वरता बनी रहेगी, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।