भारत में ग्रीन यूरिया उत्पादन की तैयारी तेज़, आंध्र प्रदेश में बनेगा पायलट प्लांट; धान, तिलहन और गन्ने पर चल रहे परीक्षण

Gaon Connection | Jun 27, 2026, 16:44 IST
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भारत सरकार ने ग्रीन यूरिया उत्पादन के लिए रोडमैप तैयार करना शुरू किया है। आंध्र प्रदेश में 150 टीपीडी क्षमता का पायलट प्लांट स्थापित होगा, जबकि आईसीएआर धान, तिलहन और गन्ने पर ग्रीन अमोनिया का परीक्षण कर रही है। सरकार वित्तीय सहायता और नई व्यवस्था के ज़रिये ग्रीन अमोनिया को बढ़ावा देकर यूरिया आयात घटाने और 2070 के नेट-ज़ीरो लक्ष्य को समर्थन देना चाहती है।

ग्रीन यूरिया उत्पादन के लिए सरकार की बड़ी पहल
ग्रीन यूरिया उत्पादन के लिए सरकार की बड़ी पहल
भारत सरकार रासायनिक उर्वरकों के क्षेत्र में हरित ऊर्जा आधारित तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। उर्वरक मंत्रालय ने देश में ग्रीन यूरिया उत्पादन के लिए रोडमैप तैयार करना शुरू कर दिया है। इसके तहत आंध्र प्रदेश के पुडिमाडका में 150 टन प्रतिदिन (टीपीडी) क्षमता वाला पायलट ग्रीन यूरिया संयंत्र स्थापित किया जाएगा। वहीं, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) पिछले रबी मौसम से देश के विभिन्न केंद्रों पर धान, तिलहन और गन्ने जैसी फसलों में ग्रीन अमोनिया के उपयोग और उसकी प्रभावशीलता का परीक्षण कर रही है। इन परीक्षणों के आधार पर भविष्य में ग्रीन यूरिया के व्यावसायिक उत्पादन का रास्ता तय किया जाएगा।

उर्वरक मंत्रालय का कहना है कि ग्रीन यूरिया परियोजना को लेकर उद्योग जगत की ओर से मिले सकारात्मक संकेत बताते हैं कि देश में इसका उत्पादन जल्द शुरू हो सकता है। सरकार ग्रीन अमोनिया की अधिक लागत को कम करने के लिए वित्तीय सहायता, बाज़ार व्यवस्था और नई नीतियों पर काम कर रही है। इसका उद्देश्य यूरिया आयात पर निर्भरता कम करना, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना और वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने में योगदान देना है।

सरकार की पूरी योजना

ग्रीन यूरिया संयंत्रों की स्थापना के लिए प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड (पीडीआईएल) ने एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया था, ताकि बाज़ार की रुचि और तकनीकी तैयारियों का आकलन किया जा सके। इसी सिलसिले में उर्वरक विभाग ने संयुक्त सचिव के. के. पाठक की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की, जिसमें एनटीपीसी, सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI), ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन अमोनिया, इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माता, यूरिया तकनीक उपलब्ध कराने वाली कंपनियाँ और प्रमुख उर्वरक कंपनियाँ शामिल हुईं। मंत्रालय के अनुसार, ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से बड़ी संख्या में कंपनियों की भागीदारी इस परियोजना को लेकर उद्योग जगत की गंभीर रुचि को दर्शाती है। बैठक में यह भी बताया गया कि नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) को हरित ऊर्जा अवसंरचना विकसित करने के लिए 19,744 करोड़ रुपये उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी दी गई है, जबकि उर्वरक विभाग ग्रीन अमोनिया को देश की उर्वरक उत्पादन प्रणाली में शामिल करने के लिए संस्थागत और बाज़ार ढाँचा तैयार करेगा। चूँकि ग्रीन अमोनिया का उत्पादन अभी ग्रे अमोनिया की तुलना में महँगा है, इसलिए प्रस्ताव है कि सेकी ग्रीन अमोनिया खरीदकर उर्वरक कंपनियों को ग्रे अमोनिया के बराबर कीमत पर उपलब्ध कराए और दोनों के बीच के मूल्य अंतर की भरपाई उर्वरक विभाग करे। ग्रीन अमोनिया की कीमत प्लैट्स और आर्गस के दो सप्ताह के औसत मूल्य, सीमा शुल्क और स्थानीय परिवहन लागत के आधार पर तय करने का भी प्रस्ताव है।

आईसीएआर के परीक्षण, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और यूरिया आयात घटाने पर ज़ोर

ग्रीन अमोनिया उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत वित्तीय प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके अंतर्गत हर वर्ष 7.24 लाख टन ग्रीन अमोनिया की खरीद प्रतिस्पर्धी ई-रिवर्स नीलामी के माध्यम से की जाएगी, जिसका संचालन सेकी करेगी। यदि प्रस्ताव को मंज़ूरी मिलती है, तो परियोजनाओं को विकास और संचालन दोनों चरणों में 10 वर्षों तक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। दूसरी ओर, आईसीएआर पिछले रबी मौसम से धान, तिलहन और गन्ने पर ग्रीन अमोनिया के प्रभाव का परीक्षण कर रही है। ग्रीन यूरिया उत्पादन में तापीय बिजलीघरों, सीमेंट और इस्पात संयंत्रों से प्राप्त कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग किया जाएगा।

मंत्रालय के अनुसार, 12.7 लाख टन वार्षिक क्षमता वाले एक बड़े यूरिया संयंत्र को लगभग 10 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड की आवश्यकता होगी। भारत ने वर्ष 2025-26 में लगभग 100 लाख टन यूरिया का आयात किया था। सरकार का मानना है कि नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर और ग्रीन अमोनिया आधारित एकीकृत परियोजनियाँ न केवल यूरिया आयात पर निर्भरता कम करेंगी, बल्कि उर्वरक क्षेत्र को स्वच्छ और टिकाऊ बनाने के साथ देश के वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में भी अहम भूमिका निभाएँगी।
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