India Cooling Action Plan: देश और दुनिया में बढ़ती गर्मी और ग्लोबल हीट पर भारत सरकार ने चिंता जाहिर की है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि वैश्विक तापमान वृद्धि यानी ग्लोबल वार्मिंग अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। उन्होंने कहा कि भारत इस चुनौती से निपटने के लिए इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान के जरिए तेजी से काम कर रहा है, जिसे देश के 250 से अधिक शहरों में लागू किया जा चुका है।
क्या है इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान?
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने को ग्लोबल हीट एंड कूलिंग फोरम में बताया कि भारत "इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान" के ज़रिए टिकाऊ कूलिंग और जलवायु लचीलेपन के लिए काम कर रहा है। इस योजना को देश के 250 से ज़्यादा शहरों में पहले ही लागू किया जा चुका है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ग्लोबल वार्मिंग दुनिया भर में स्वास्थ्य, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन गई है। डॉ. सिंह ने कहा कि बढ़ता तापमान सिर्फ पर्यावरण की चिंता नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर बीमारियों को भी बढ़ा रहा है, जिनमें संक्रामक और गैर-संक्रामक दोनों तरह की बीमारियां शामिल हैं।
![परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह]()
परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह
उन्होंने कहा कि भारत की अलग-अलग जलवायु के लिए एक जैसे समाधान काम नहीं करेंगे, बल्कि खास ज़रूरतों के हिसाब से समाधान निकालने होंगे। साथ ही, उन्होंने अत्यधिक कूलिंग के गलत इस्तेमाल से ऊर्जा पर पड़ने वाले बोझ को कम करने और ज़िम्मेदारी से कूलिंग का उपयोग करने की ज़रूरत बताई। उन्होंने बताया कि भारत सरकार ने गर्मी से निपटने और ऊर्जा की बचत के लिए इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP) शुरू किया है। इसका उद्देश्य देश में सुरक्षित, सस्ती और पर्यावरण के अनुकूल कूलिंग सिस्टम को बढ़ावा देना है।
इस योजना के तहत:- शहरों में गर्मी कम करने के उपाय
- ऊर्जा बचाने वाले AC और कूलिंग सिस्टम
- इमारतों का बेहतर डिजाइन
- हरित क्षेत्र और पेड़-पौधे बढ़ाना
- आम लोगों को जागरूक करना
ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ रहे कई खतरे
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि लगातार बढ़ता तापमान लोगों के स्वास्थ्य पर सीधा असर डाल रहा है। गर्मी के कारण शरीर पर दबाव बढ़ता है, जिससे कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि अत्यधिक गर्मी के कारण:
![बढ़ते तापमान से लोगों के स्वास्थ्य पर सीधा असर]()
बढ़ते तापमान से लोगों के स्वास्थ्य पर सीधा असर
- डेंगू जैसी संक्रामक बीमारियां बढ़ सकती हैं
- हृदय रोगियों को ज्यादा खतरा होता है
- मधुमेह मरीजों की स्थिति बिगड़ सकती है
- बुजुर्गों और बच्चों पर अधिक असर पड़ता है
- श्रमिकों और खुले में काम करने वालों के लिए बढ़ता है जोखिम
भारत की जरूरतों के हिसाब से निकलेगा समाधान
डॉ. सिंह ने बताया कि भारत की जलवायु बहुत विविध है। कुछ इलाकों में बहुत ज़्यादा गर्मी पड़ती है, तो कहीं बहुत ज़्यादा ठंड। इसलिए, दुनिया भर के एक जैसे मॉडलों को अपनाने के बजाय, भारत को अपनी खास ज़रूरतों के हिसाब से समाधान निकालने होंगे। उन्होंने कहा कि आज भारत एक साथ उष्णकटिबंधीय बीमारियों (जैसे डेंगू) और जीवनशैली से जुड़ी गैर-संक्रामक बीमारियों (जैसे दिल की बीमारी और मधुमेह) से जूझ रहा है। बढ़ता तापमान इन दोनों तरह की बीमारियों को और गंभीर बना रहा है, खासकर उन लोगों के लिए जो पहले से ही इन बीमारियों से पीड़ित हैं।
कूलिंग सिस्टम से घट रही सहनशीलता
![कूलिंग समाधानों की पहुँच सभी तक हो समान]()
कूलिंग समाधानों की पहुँच सभी तक हो समान
मंत्री ने यह भी कहा कि आधुनिक कूलिंग सिस्टम पर हमारी बढ़ती निर्भरता ने हमारी प्राकृतिक सहनशीलता को कम कर दिया है। उन्होंने एयर कंडीशनिंग (AC) के अत्यधिक उपयोग के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा कि इससे ऊर्जा की खपत बढ़ती है, जो पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डालती है। डॉ. सिंह ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कूलिंग समाधानों तक सभी की बराबर पहुँच होनी चाहिए, क्योंकि पहुँच में असमानता सामाजिक असमानताओं को और बढ़ा सकती है। उन्होंने ज़िम्मेदारी से कूलिंग का उपयोग करने की ज़रूरत बताई। उन्होंने कहा कि अगर हम AC का तापमान सही रखेंगे, तो ऊर्जा की माँग काफी कम हो जाएगी और देश के संसाधनों की बचत होगी।
वैज्ञानिकों और संस्थानों से सहयोग की अपील
डॉ. सिंह ने कहा कि 140 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले भारत का जलवायु परिवर्तन से निपटने का तरीका न सिर्फ देश के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने दोहराया कि सरकारी विभागों, रिसर्च संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के मिलकर काम करने से ही ऐसे समाधान निकलेंगे जो व्यावहारिक, बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकें और सभी के लिए फायदेमंद हों। उन्होंने कहा कि ऐसे मंचों से ऐसे नतीजे निकलने चाहिए जिन पर तुरंत काम किया जा सके और जो लंबे समय तक टिकाऊ हों।