पंजाब में अब गर्मी मौसम नहीं मजबूरी बनी, टॉयलेट न जाना पड़े इसलिए कम पानी पी रहे वर्कर, किसान सबसे ज़्यादा प्रभावित
Gaon Connection | May 02, 2026, 16:52 IST
पंजाब में गर्मी अब सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बन गई है। जलवायु परिवर्तन की सच्चाई लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रही है। किसान, मजदूर और डिलीवरी राइडर जैसे लोग इस भीषण गर्मी में काम करने को मजबूर हैं। वे अपनी बुनियादी जरूरतों से भी समझौता कर रहे हैं।
जलवायु संकट का नया चेहरा
पंजाब में बढ़ती गर्मी अब सिर्फ तापमान का आंकड़ा नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है। एयरकेयर सेंटर की फेलो हरगुन कौर ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई है, जिसे लोग रोज जी रहे हैं। उन्होंने ऐसे कई उदाहरण दिए जो दिखाते हैं कि कैसे आम लोग खासकर खेतों में काम करने वाले किसान, सड़क पर मेहनत करने वाले मजदूर और गिग वर्कर्स इस बदलते मौसम की मार झेल रहे हैं। उनके मुताबिक यह संकट धीरे-धीरे और चुपचाप लोगों की दिनचर्या, सेहत और कमाई को प्रभावित कर रहा है।
हरगुन कौर ने लुधियाना के एक डिलीवरी राइडर का जिक्र किया जो 44 डिग्री की गर्मी में रोज 12 घंटे काम करता है। वह जानबूझकर कम पानी पीता है, ताकि उसे बार-बार रुकना न पड़े और उसकी कमाई पर असर न पड़े। कौर के अनुसार, यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उस सिस्टम का उदाहरण है जिसमें इंसान अपनी बुनियादी जरूरत प्यास को भी दबाने के लिए मजबूर हो जाता है।
उन्होंने बताया कि पहले पंजाब की गर्मियां भले ही कठिन होती थीं लेकिन उनका एक तय चक्र था. मई की तपिश और जुलाई की राहत। अब यह संतुलन टूट चुका है। गर्मी पहले आ रही है, देर तक जा रही है और पहले से ज्यादा तीखी महसूस हो रही है। कौर के मुताबिक अब यह सिर्फ मौसम नहीं बल्कि एक स्थायी स्थिति बन गई है।
मलेरकोटला के एक किसान का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि अब किसान सुबह 4 बजे काम शुरू कर 10 बजे तक खेतों से लौट आते हैं, क्योंकि दिन का बाकी समय खतरनाक हो गया है। उन्होंने किसान के हवाले से कहा, “शरीर तो एडजस्ट कर लेता है, लेकिन जमीन नहीं।” टमाटर झुलस रहे हैं, भिंडी पकने से पहले जल रही है और किसानों को डिहाइड्रेशन, सिरदर्द और ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं रोजमर्रा का हिस्सा बन चुकी हैं।
हरगुन कौर ने कहा कि इस संकट का सबसे बड़ा बोझ उन लोगों पर पड़ रहा है, जो गर्मी से बचने के लिए काम छोड़ नहीं सकते।
डिलीवरी वर्कर ऐप से लॉग ऑफ नहीं कर सकता और किसान फसल छोड़ नहीं सकता। सरकारी सलाह जैसे दोपहर में बाहर काम न करना उन लोगों तक नहीं पहुंचती जिनके लिए यह सबसे ज्यादा जरूरी है।
उन्होंने बताया कि लुधियाना और अमृतसर जैसे शहरों में अब रात में भी गर्मी कम नहीं होती। कंक्रीट, कम हरियाली और घनी आबादी के कारण गर्मी फंसी रहती है। रात में भी शरीर को राहत नहीं मिलती, जिससे लोग थकान के साथ सोते हैं और उसी हालत में उठते हैं। बिजली कटौती होने पर यह स्थिति और गंभीर हो जाती है, खासकर बुजुर्गों के लिए यह स्वास्थ्य खतरा बन जाती है।
हरगुन कौर ने ‘वेट-बल्ब तापमान’ की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि बढ़ती नमी के कारण शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं कर पाता। इसका मतलब है कि आज का 40 डिग्री तापमान पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा खतरनाक हो गया है।
उन्होंने कहा कि लोग बिना शोर के अपनी जिंदगी में बदलाव कर रहे हैं जैसे सुबह जल्दी उठना, कम पानी पीना, चेहरे ढकना, काम के समय बदलना। यह सब ‘एडजस्टमेंट’ दिखता है लेकिन असल में यह एक मजबूरी है जिसे लोग अपनी सहनशक्ति समझने लगे हैं। हरगुन कौर ने साफ कहा कि पंजाब जलवायु परिवर्तन का इंतजार नहीं कर रहा बल्कि उसके भीतर जी रहा है। इंडो-गंगेटिक मैदान पहले से ही दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में है और आने वाले समय में हालात और कठिन हो सकते हैं। उनका कहना है कि असली चिंता 2050 की भविष्यवाणियां नहीं बल्कि आज का वह आदमी है जो प्यास दबाकर काम कर रहा है और वह किसान है जो सूरज से पहले खेत में उतरने को मजबूर है। यह एक ऐसा संकट है जो धीरे-धीरे सामान्य बनता जा रहा है जबकि इसे कभी सामान्य नहीं होना चाहिए था।
प्यास से समझौता, मजबूरी का सिस्टम
गर्मी अब मौसम नहीं, ‘स्थिति’ बन चुकी है
किसान बदल रहे दिनचर्या, फसलें झुलस रहीं
सबसे ज्यादा असर उन्हीं पर, जो काम रोक नहीं सकते
डिलीवरी वर्कर ऐप से लॉग ऑफ नहीं कर सकता और किसान फसल छोड़ नहीं सकता। सरकारी सलाह जैसे दोपहर में बाहर काम न करना उन लोगों तक नहीं पहुंचती जिनके लिए यह सबसे ज्यादा जरूरी है।