गर्मी के चलते कृषि मजदूरों के 16.33 करोड़ काम के घंटे हुए बर्बाद, फसलों पर बढ़ा संकट, क्या हीटवेव बढ़ाएगी खाने-पीने की चीजों के दाम?
Preeti Nahar | Jun 09, 2026, 11:33 IST
दुनिया भर में बढ़ती हीटवेव का असर खेतों तक पहुंच चुका है। एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट की एक नई रिपोर्ट के अनुसार 2024 में कृषि क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित रहा और करोड़ों श्रमिकों के काम के घंटे कम हुए। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इसका असर फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है।
गर्मी बन रही है किसानों की दुश्मन! 2024 में खेतों में काम के करोड़ों घंटे हुए बर्बाद
Heatwave India 2026: गर्मी बढ़ने का असर सिर्फ लोगों की सेहत तक सीमित नहीं है। अब इसका सीधा असर खेती, किसानों की कमाई और आम लोगों की रसोई तक पहुंचने लगा है। दुनिया भर में बढ़ती हीटवेव और रिकॉर्ड तोड़ तापमान खेतों में काम करने वाले करोड़ों कृषि श्रमिकों की काम करने की क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं।
एक हालिया अध्ययन जो कि एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट (ECIU) की तरफ से किया गया है, में बताया गया कि के वर्ष 2024 में भारत के कृषि मजदूरों के करीब 16.33 करोड़ कार्य घंटे (163.3 million work hours) भीषण गर्मी की वजह से प्रभावित हुए।
अगर यही स्थिति जारी रही तो इसका असर सिर्फ फसल उत्पादन पर नहीं पड़ेगा, बल्कि खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी पड़ सकता है। यानी जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी आने वाले समय में महंगाई का एक बड़ा कारण बन सकती है।
खेती ऐसा काम है जिसमें किसान और मजदूरों को घंटों खुले आसमान के नीचे काम करना पड़ता है। लेकिन जब तापमान 45 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर पहुंच जाता है तो लंबे समय तक खेत में काम करना स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाता है।
रिपोर्ट में बताया गया कि वर्ष 2024 में दुनिया के कई प्रमुख कृषि उत्पादक देशों में कृषि श्रमिकों के लगभग 216 अरब कार्य घंटे (216 billion work hours) गर्मी के कारण प्रभावित हुए। इसका मतलब है कि औसतन एक कृषि श्रमिक करीब 49 कार्य दिवस के बराबर काम नहीं कर पाया।
भारत उन देशों में शामिल है जहाँ बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। देश के कई हिस्सों में इस समय तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। ऐसी परिस्थितियों में खेतों में काम करना बेहद कठिन हो जाता है।
एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट (ECIU) के अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम प्रमुख गैरेथ रेडमंड-किंग कहते हैं "भारत जैसे देशों में जब तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है तो खेतों में काम करना खतरनाक हो सकता है। इससे किसानों की सेहत, आजीविका और खाद्य आपूर्ति तीनों पर असर पड़ता है।"
पहली नजर में गर्मी और महंगाई का सीधा संबंध समझ में नहीं आता, लेकिन दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब किसान और मजदूर कम समय तक काम कर पाते हैं तो खेती के काम प्रभावित होते हैं। बुवाई, सिंचाई, कटाई और फसल प्रबंधन में देरी हो सकती है।
यदि उत्पादन घटता है या फसल की गुणवत्ता प्रभावित होती है तो बाजार में आपूर्ति कम हो सकती है। ऐसे में खाद्यान्न, फल, सब्जियां और अन्य कृषि उत्पाद महंगे हो सकते हैं।
रिपोर्ट से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन/Global Warming Agriculture के कारण पहले ही कई देशों में फसल उत्पादन प्रभावित हुआ है और इसका असर खाद्य कीमतों पर दिखाई देने लगा है।
दुनिया के कई बड़े खाद्य उत्पादक देश जलवायु जोखिमों का सामना कर रहे हैं। इनमें भारत, ब्राजील, वियतनाम, घाना, कोट डी आइवर, केन्या, पेरू और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश शामिल हैं।
यहीं से चावल, कॉफी, चाय, कोको, केला, अंगूर, संतरा और कई अन्य खाद्य उत्पाद वैश्विक बाजारों तक पहुंचते हैं। यदि इन देशों में अत्यधिक गर्मी के कारण खेती प्रभावित होती है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय खाद्य आपूर्ति और कीमतों/Food Inflation India पर भी पड़ सकता है।
लैंसेट काउंटडाउन रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में दुनिया भर में गर्मी के कारण लगभग 640 अरब संभावित कार्य घंटे प्रभावित हुए। यह आंकड़ा 2023 से भी अधिक है और 1990 के दशक की तुलना में लगभग दोगुना माना जा रहा है।
रिपोर्ट बताती है कि कुल प्रभावित कार्य घंटों में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही। दुनिया भर में गर्मी से प्रभावित कुल कार्य घंटों का लगभग 63 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र से जुड़ा था।
भारत की जैविक किसान और इंटरकॉन्टिनेंटल नेटवर्क ऑफ ऑर्गेनिक फार्मर्स की अध्यक्ष शमिका मोने का कहना है "अत्यधिक गर्मी खेती के पहले से कठिन काम को और मुश्किल बना रही है। किसानों को चिंता है कि सुपर एल नीनो जैसी स्थितियां फसलों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।"
वह आगे कहती हैं "सरकारों को किसानों तक जलवायु वित्त/climate finance पहुंचाना चाहिए ताकि वे बदलते मौसम के अनुसार खुद को ढाल सकें। इसके साथ ही विविध फसलें और पेड़ आधारित खेती खेतों का तापमान कम करने में मदद कर सकती हैं।"
विश्व मौसम संगठन (WMO) ने आने वाले महीनों में शक्तिशाली एल नीनो की संभावना करीब 80 प्रतिशत बताई है। एल नीनो /El Nino 2027 Impact के दौरान कई क्षेत्रों में सामान्य से अधिक गर्मी और मौसम संबंधी असामान्य घटनाएं देखने को मिल सकती हैं। यदि एल नीनो और जलवायु परिवर्तन का असर एक साथ बढ़ता है तो खेती और खाद्य सुरक्षा के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
रिपोर्ट से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अनुकूलन उपाय काफी नहीं होंगे। किसानों को गर्मी सहन करने वाली फसल किस्में, बेहतर सिंचाई व्यवस्था, पेड़ आधारित खेती, मौसम आधारित सलाह और वित्तीय सहायता की जरूरत होगी।
एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट (ECIU) में अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों के प्रमुख गैरेथ रेडमंड-किंग का कहना है कि..."यदि हम जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को नहीं रोकते तो खेतों में बढ़ती गर्मी किसानों के लिए असहनीय होती जाएगी। नेट-जीरो उत्सर्जन की दिशा में तेजी से बढ़ना ही इसका स्थायी समाधान है।"
बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम की खबर नहीं रह गई है। इसका असर किसानों की मेहनत, फसल उत्पादन, खाद्य आपूर्ति और आम लोगों के खर्च तक पहुंच चुका है। खेतों में काम के अरबों घंटे कम होने का मतलब है कम उत्पादन, बढ़ती लागत और भविष्य में खाद्य महंगाई का बढ़ता खतरा। इसलिए जलवायु परिवर्तन से निपटना अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि खेती और खाद्य सुरक्षा का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है।
एक हालिया अध्ययन जो कि एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट (ECIU) की तरफ से किया गया है, में बताया गया कि के वर्ष 2024 में भारत के कृषि मजदूरों के करीब 16.33 करोड़ कार्य घंटे (163.3 million work hours) भीषण गर्मी की वजह से प्रभावित हुए।
अगर यही स्थिति जारी रही तो इसका असर सिर्फ फसल उत्पादन पर नहीं पड़ेगा, बल्कि खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी पड़ सकता है। यानी जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी आने वाले समय में महंगाई का एक बड़ा कारण बन सकती है।
खेतों में काम करना क्यों होता जा रहा है मुश्किल?
रिपोर्ट में बताया गया कि वर्ष 2024 में दुनिया के कई प्रमुख कृषि उत्पादक देशों में कृषि श्रमिकों के लगभग 216 अरब कार्य घंटे (216 billion work hours) गर्मी के कारण प्रभावित हुए। इसका मतलब है कि औसतन एक कृषि श्रमिक करीब 49 कार्य दिवस के बराबर काम नहीं कर पाया।
भारत जैसे देशों पर सबसे ज्यादा असर
एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट (ECIU) के अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम प्रमुख गैरेथ रेडमंड-किंग कहते हैं "भारत जैसे देशों में जब तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है तो खेतों में काम करना खतरनाक हो सकता है। इससे किसानों की सेहत, आजीविका और खाद्य आपूर्ति तीनों पर असर पड़ता है।"
गर्मी और महंगाई का क्या है संबंध?
यदि उत्पादन घटता है या फसल की गुणवत्ता प्रभावित होती है तो बाजार में आपूर्ति कम हो सकती है। ऐसे में खाद्यान्न, फल, सब्जियां और अन्य कृषि उत्पाद महंगे हो सकते हैं।
रिपोर्ट से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन/Global Warming Agriculture के कारण पहले ही कई देशों में फसल उत्पादन प्रभावित हुआ है और इसका असर खाद्य कीमतों पर दिखाई देने लगा है।
सिर्फ भारत नहीं, पूरी दुनिया की चिंता
यहीं से चावल, कॉफी, चाय, कोको, केला, अंगूर, संतरा और कई अन्य खाद्य उत्पाद वैश्विक बाजारों तक पहुंचते हैं। यदि इन देशों में अत्यधिक गर्मी के कारण खेती प्रभावित होती है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय खाद्य आपूर्ति और कीमतों/Food Inflation India पर भी पड़ सकता है।
2024 में टूटा रिकॉर्ड
रिपोर्ट बताती है कि कुल प्रभावित कार्य घंटों में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही। दुनिया भर में गर्मी से प्रभावित कुल कार्य घंटों का लगभग 63 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र से जुड़ा था।
किसान क्या कह रहे हैं?
वह आगे कहती हैं "सरकारों को किसानों तक जलवायु वित्त/climate finance पहुंचाना चाहिए ताकि वे बदलते मौसम के अनुसार खुद को ढाल सकें। इसके साथ ही विविध फसलें और पेड़ आधारित खेती खेतों का तापमान कम करने में मदद कर सकती हैं।"
क्या एल नीनो बढ़ा सकता है मुश्किलें?
समाधान क्या है?
एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट (ECIU) में अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों के प्रमुख गैरेथ रेडमंड-किंग का कहना है कि..."यदि हम जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को नहीं रोकते तो खेतों में बढ़ती गर्मी किसानों के लिए असहनीय होती जाएगी। नेट-जीरो उत्सर्जन की दिशा में तेजी से बढ़ना ही इसका स्थायी समाधान है।"
बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम की खबर नहीं रह गई है। इसका असर किसानों की मेहनत, फसल उत्पादन, खाद्य आपूर्ति और आम लोगों के खर्च तक पहुंच चुका है। खेतों में काम के अरबों घंटे कम होने का मतलब है कम उत्पादन, बढ़ती लागत और भविष्य में खाद्य महंगाई का बढ़ता खतरा। इसलिए जलवायु परिवर्तन से निपटना अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि खेती और खाद्य सुरक्षा का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है।