Food Crisis Alert: बढ़ सकती हैं खाने-पीने की चीजों की कीमतें! FAO ने दी बड़े संकट की चेतावनी-गेहूं और चावल के दामों में आ सकता है उछाल
Preeti Nahar | May 21, 2026, 16:41 IST
वर्तमान समय में जब दुनिया युद्ध और पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रभाव में है, होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और एल नीनो के चलते खाद्य संकट का खतरा गहरा रहा है। इससे कृषि के लागत में वृद्धि होने की संभावना है, जो गेहूं और चावल के दामों में उछाल ला सकती है।
एल नीनो और होर्मुज तनाव से गेहूं चावल के दाम बढ़ने का खतरा
Hormuz crisis and food inflation: दुनिया इस समय कई मोर्चों पर दबाव झेल रही है। एक तरफ युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन खेती और खाद्य उत्पादन पर असर डाल रहा है। ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र की संस्था FAO ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव लंबा खिंचता है और इसी दौरान एल नीनो का असर बढ़ता है, तो दुनिया एक गंभीर खाद्य संकट की तरफ बढ़ सकती है। यह संकट सिर्फ तेल या व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर सीधे खेती, खाद्य उत्पादन और आम लोगों की रसोई तक पहुंच सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है। फारस की खाड़ी से निकलने वाला बड़ा हिस्सा तेल और गैस इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुँचता है। सिर्फ ऊर्जा ही नहीं, बल्कि उर्वरक उद्योग के लिए जरूरी कच्चा माल भी इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में अगर यहां किसी तरह की रुकावट आती है, तो पूरी दुनिया की सप्लाई चेन प्रभावित होने लगती है।
इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने का मतलब है कि तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है। जब तेल महंगा होता है, तो उसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। खेती में इस्तेमाल होने वाली मशीनें, सिंचाई, ट्रांसपोर्ट और खाद निर्माण सबकी लागत बढ़ने लगती है। यही वजह है कि FAO इस संकट को केवल “ऊर्जा संकट” नहीं बल्कि “खाद्य सुरक्षा संकट” के रूप में देख रहा है।
कृषि क्षेत्र पूरी तरह उर्वरकों और ऊर्जा पर निर्भर है। यूरिया और अन्य रासायनिक खाद बनाने के लिए बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की जरूरत होती है। अगर गैस और तेल की सप्लाई प्रभावित होती है, तो खाद की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर किसानों की लागत पर पड़ेगा।
दुनिया के कई देशों में पहले ही किसान बढ़ती लागत से परेशान हैं। अगर खाद और डीजल और महंगे होते हैं, तो छोटे और मध्यम किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। कई किसान कम मात्रा में उर्वरक इस्तेमाल करेंगे, जिससे फसल उत्पादन घट सकता है। इसका असर धीरे-धीरे बाजार में दिखाई देगा, जहाँ गेहूं, चावल, दाल और सब्जियों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
क्योंकि खाद की कमी सिर्फ एक सीजन का संकट नहीं पैदा करती, बल्कि इसका असर कई महीनों तक बना रहता है। जब उत्पादन घटता है, तो उसकी भरपाई जल्दी नहीं हो पाती। यही कारण है कि FAO इसे आने वाले समय के लिए गंभीर खतरा मान रहा है।
होर्मुज संकट के साथ-साथ एल नीनो की आशंका ने चिंता और बढ़ा दी है। एल नीनो एक ऐसी जलवायु घटना है, जो दुनिया भर के मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है। इसके कारण कई देशों में सूखा पड़ता है, कहीं अत्यधिक गर्मी होती है और कई क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की जाती है।
भारत समेत एशिया के कई देशों की खेती मानसून पर निर्भर है। अगर एल नीनो के कारण बारिश प्रभावित होती है, तो फसल उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है। ऐसे में एक तरफ खेती की लागत बढ़ेगी और दूसरी तरफ उत्पादन घटेगा। यह स्थिति खाद्य महंगाई को तेजी से बढ़ा सकती है।
भारत दुनिया के बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन यहाँ की खेती अभी भी काफी हद तक मानसून और उर्वरकों पर निर्भर है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद महंगी होती है और तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर भारतीय किसानों पर भी पड़ेगा क्योंकि इससे किसानों की लागत बढ़ेगी। खेती की लागत बढ़ने से किसानों का मुनाफा कम हो सकता है।
वहीं अगर मानसून कमजोर रहा, तो उत्पादन घटने की आशंका भी बढ़ जाएगी। इसका असर बाजार में खाद्यान्न की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। दाल, खाद्य तेल, सब्जियाँ और अनाज महंगे हो सकते हैं। सरकार पर भी दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि उर्वरक सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। इसके अलावा खाद्य महंगाई बढ़ने पर आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ेगा। खासकर गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए रसोई का बजट संभालना मुश्किल हो सकता है।
FAO का मानना है कि इस संकट का सबसे ज्यादा असर गरीब और आयात पर निर्भर देशों पर पड़ेगा। अफ्रीका और एशिया के कई देशों में पहले ही खाद्य असुरक्षा की स्थिति बनी हुई है। वहाँ अगर खाद और ईंधन की सप्लाई प्रभावित होती है, तो हालात और खराब हो सकते हैं।
कई देशों में लोग पहले ही महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। ऐसे में अगर खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो भूख और कुपोषण की समस्या और गंभीर हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों को भी राहत कार्यक्रम चलाने में ज्यादा खर्च करना पड़ेगा।
फिलहाल दुनिया के कई देशों के पास पुराने स्टॉक मौजूद हैं, इसलिए बाजार में तुरंत किसी बड़े संकट की तस्वीर नहीं दिखाई दे रही। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो असर धीरे-धीरे साफ दिखने लगेगा। सबसे पहले ऊर्जा महंगी होगी, फिर उर्वरक की कीमतें बढ़ेंगी और उसके बाद खेती की लागत बढ़ेगी। जब उत्पादन कम होगा, तब खाद्यान्न की कीमतों में तेजी आएगी। यानी संकट अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे सामने आएगा।
यही वजह है कि विशेषज्ञ अभी से सरकारों को सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं। उनका मानना है कि अगर समय रहते वैकल्पिक सप्लाई चेन, खाद उपलब्धता और जलवायु अनुकूल खेती पर काम नहीं किया गया, तो आने वाले समय में स्थिति ज्यादा कठिन हो सकती है।
आने वाले समय में देशों को अपनी कृषि व्यवस्था को ज्यादा मजबूत और टिकाऊ बनाना होगा। जलवायु परिवर्तन, युद्ध और व्यापारिक तनाव अब सीधे खेती और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में सिर्फ उत्पादन बढ़ाना ही काफी नहीं होगा, बल्कि सप्लाई चेन, पानी, ऊर्जा और उर्वरकों की स्थिर उपलब्धता सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने का मतलब है कि तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है। जब तेल महंगा होता है, तो उसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। खेती में इस्तेमाल होने वाली मशीनें, सिंचाई, ट्रांसपोर्ट और खाद निर्माण सबकी लागत बढ़ने लगती है। यही वजह है कि FAO इस संकट को केवल “ऊर्जा संकट” नहीं बल्कि “खाद्य सुरक्षा संकट” के रूप में देख रहा है।
खेती पर सबसे बड़ा असर उर्वरकों की कीमत से पड़ेगा
दुनिया के कई देशों में पहले ही किसान बढ़ती लागत से परेशान हैं। अगर खाद और डीजल और महंगे होते हैं, तो छोटे और मध्यम किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। कई किसान कम मात्रा में उर्वरक इस्तेमाल करेंगे, जिससे फसल उत्पादन घट सकता है। इसका असर धीरे-धीरे बाजार में दिखाई देगा, जहाँ गेहूं, चावल, दाल और सब्जियों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
क्योंकि खाद की कमी सिर्फ एक सीजन का संकट नहीं पैदा करती, बल्कि इसका असर कई महीनों तक बना रहता है। जब उत्पादन घटता है, तो उसकी भरपाई जल्दी नहीं हो पाती। यही कारण है कि FAO इसे आने वाले समय के लिए गंभीर खतरा मान रहा है।
एल नीनो बना सकता है इस संकट को और खतरनाक
भारत समेत एशिया के कई देशों की खेती मानसून पर निर्भर है। अगर एल नीनो के कारण बारिश प्रभावित होती है, तो फसल उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है। ऐसे में एक तरफ खेती की लागत बढ़ेगी और दूसरी तरफ उत्पादन घटेगा। यह स्थिति खाद्य महंगाई को तेजी से बढ़ा सकती है।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
वहीं अगर मानसून कमजोर रहा, तो उत्पादन घटने की आशंका भी बढ़ जाएगी। इसका असर बाजार में खाद्यान्न की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। दाल, खाद्य तेल, सब्जियाँ और अनाज महंगे हो सकते हैं। सरकार पर भी दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि उर्वरक सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। इसके अलावा खाद्य महंगाई बढ़ने पर आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ेगा। खासकर गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए रसोई का बजट संभालना मुश्किल हो सकता है।
गरीब देशों के लिए स्थिति और गंभीर हो सकती है
कई देशों में लोग पहले ही महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। ऐसे में अगर खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो भूख और कुपोषण की समस्या और गंभीर हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों को भी राहत कार्यक्रम चलाने में ज्यादा खर्च करना पड़ेगा।
अभी बाजार शांत क्यों दिखाई दे रहे हैं?
यही वजह है कि विशेषज्ञ अभी से सरकारों को सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं। उनका मानना है कि अगर समय रहते वैकल्पिक सप्लाई चेन, खाद उपलब्धता और जलवायु अनुकूल खेती पर काम नहीं किया गया, तो आने वाले समय में स्थिति ज्यादा कठिन हो सकती है।