Human Wildlife Conflict: हाथियों के हमले से सबसे अधिक मौतें ओडिशा में, बाघ संघर्ष में महाराष्ट्र आगे

Divendra Singh | Feb 10, 2026, 14:51 IST
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लोकसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार देश में हाथियों और बाघों से जुड़ा मानव-वन्यजीव संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है। ओडिशा हाथी हमलों से सबसे ज्यादा प्रभावित है, जबकि बाघों से मौतों में महाराष्ट्र शीर्ष पर है, लेकिन आखिर क्यों बढ़ रहा है ये संघर्ष?
इंसान और जंगल की टकराह, देशभर में बढ़ रही हाथी-बाघ हमलों की घटनाएँ।
12 अक्टूबर 2025 की सुबह ओडिशा के ढेंकनाल ज़िले के बलिमी गाँव में रोज़ की तरह दिन की शुरुआत हुई थी। 50 साल के नरोत्तम बेहरा जंगल की ओर शौच को गए थे। लेकिन उस दिन वापसी के दौरान अचानक एक हाथी से उनका सामना हो गया। कुछ ही पलों में हमला हुआ और उनकी जान चली गई।

यह घटना उस गाँव के लिए नई नहीं थी। ढेंकनाल में ऐसे हादसे बार-बार होते रहे हैं। दरअसल, पूरे देश में हाथियों के हमलों से सबसे ज़्यादा मौतें ओडिशा में दर्ज होती हैं, और उस राज्य के भीतर भी ढेंकनाल सबसे संवेदनशील ज़िलों में गिना जाता है।

9 फरवरी 2026 को लोकसभा में पेश आंकड़ों ने मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीर तस्वीर सामने रखी। वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच हाथियों के हमलों में सबसे अधिक मौतें ओडिशा में हुईं- 538 लोगों की जान गई। इसके बाद असम में 364, झारखंड में 338 और पश्चिम बंगाल में 322 मौतें दर्ज की गईं।

इन आंकड़ों से साफ है कि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत हाथी-मानव संघर्ष का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। छत्तीसगढ़, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी बड़ी संख्या में ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं।

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि हाथियों की सबसे अधिक आबादी ओडिशा में नहीं है। कर्नाटक में करीब 6,013 हाथी, असम में 4,159, तमिलनाडु में 3,136 और केरल में 2,785 हाथी पाए जाते हैं। ओडिशा में इनकी संख्या लगभग 912 है, फिर भी यहां मौतों का आंकड़ा सबसे ज्यादा है।

अलग-अलग राज्यों में अलग तरह का वन्यजीव संकट।
अलग-अलग राज्यों में अलग तरह का वन्यजीव संकट।


कम हाथी, ज़्यादा मौतें क्यों?

ओडिशा वन्यजीव सोसायटी के सचिव बिस्वजीत मोहंती इस विरोधाभास को समझाते हुए कहते हैं कि खनन गतिविधियाँ इस संघर्ष का बड़ा कारण हैं।

वो बताते हैं, "ढेंकनाल जैसे क्षेत्रों में खदानों में तेज रोशनी, मशीनों का शोर और विस्फोटक गतिविधियाँ हाथियों को परेशान करती हैं। जब वे तनावग्रस्त होकर इधर-उधर भटकते हैं, तो रास्ते में आने वाले इंसानों पर हमला कर देते हैं।

वे कहते हैं, “हाथियों के गलियारों में खनन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। ऐसी गतिविधियाँ न केवल संघर्ष बढ़ाती हैं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण कानूनों की भावना के भी खिलाफ हैं।”

पिछले वर्षों में हाथियों के हमलों में हुईं इंसानों की मौतें
पिछले वर्षों में हाथियों के हमलों में हुईं इंसानों की मौतें


अभयारण्य हैं, लेकिन दबाव भी

ओडिशा में मयूरभंज, महानदी, संबलपुर और चंदाका-दमपारा जैसे कई हाथी अभयारण्य बनाए गए हैं। लेकिन इन संरक्षित क्षेत्रों के आसपास खनन, सड़क निर्माण और बस्तियों के फैलाव से हाथियों के पारंपरिक रास्ते टूट रहे हैं। जब उनके पुराने मार्ग बाधित हो जाते हैं, तो हाथी खेतों और गाँवों में प्रवेश करने लगते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ संघर्ष हिंसक रूप ले लेता है।

जलवायु परिवर्तन का असर

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन भी इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। सूखा, बाढ़ और अनियमित मौसम से जंगलों में भोजन और पानी की कमी हो जाती है। ऐसे में हाथी मानव बस्तियों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ उन्हें धान, गन्ना या केला जैसी फसलें आसानी से मिल जाती हैं।

यह बदलाव धीरे-धीरे मानव-वन्यजीव संघर्ष को एक नई और जटिल समस्या में बदल रहा है।

बाघ-मानव संघर्ष: एक अलग तस्वीर

हाथियों के बाद बाघों से जुड़ा संघर्ष भी कई राज्यों में गंभीर रूप ले चुका है। वर्ष 2021 से जून 2025 के बीच बाघों के हमलों में सबसे अधिक मौतें महाराष्ट्र में हुईं- 239 लोग मारे गए।

इसके बाद उत्तर प्रदेश में 59 और मध्य प्रदेश में 30 मौतें दर्ज की गईं। बिहार, कर्नाटक और उत्तराखंड में भी ऐसे मामले सामने आए, हालांकि संख्या अपेक्षाकृत कम रही। विशेषज्ञों का कहना है कि कई राज्यों में बाघों की संख्या बढ़ी है, जो संरक्षण के लिहाज़ से सकारात्मक संकेत है। लेकिन जंगलों के आसपास बसे गांवों में इससे जोखिम भी बढ़ा है। खेतों में चरते मवेशी बाघों के लिए आसान शिकार बन जाते हैं। कई बार बाघ मवेशियों का पीछा करते हुए गाँवों तक पहुँच जाते हैं और इंसानों से आमना-सामना हो जाता है।

पिछले वर्षों में बाघ के हमलों में हुईं इंसानों की मौतें
पिछले वर्षों में बाघ के हमलों में हुईं इंसानों की मौतें


तराई का अलग संकट

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में स्थिति और जटिल है। यहाँ जंगल और खेतों के बीच कोई स्पष्ट सीमा नहीं है। घने जंगलों के किनारे बसे गाँवों में बाघ और तेंदुए अक्सर दिखाई दे जाते हैं। कई जगहों पर लोग जंगल के अंदर तक खेती या मवेशी चराने जाते हैं, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है।

अलग-अलग क्षेत्रों में अलग संकट

देश के अलग-अलग हिस्सों में संघर्ष का स्वरूप भी अलग है। जैसे पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में हाथियों का खतरा सबसे बड़ा है। मध्य और पश्चिम भारत में बाघों से जुड़ी घटनाएँ अधिक हैं। दक्षिण भारत में दोनों तरह के संघर्ष देखने को मिलते हैं। इससे साफ है कि समस्या का कोई एक कारण या एक समाधान नहीं है।

विशेषज्ञ मानव-वन्यजीव संघर्ष के पीछे कुछ मुख्य कारण बताते हैं, जैसे कि जंगलों का सिकुड़ना और खंडित होना, वन गलियारों पर सड़क और खनन परियोजनाएँ, खेती और बस्तियों का जंगलों की ओर विस्तार, जलवायु परिवर्तन, ऐसी फसलें जो वन्यजीवों को आकर्षित करती हैं।

क्या है समाधान?

समाधान के लिए क्षेत्र-विशेष रणनीति जरूरी मानी जा रही है। पूर्वी भारत में हाथी गलियारों की सुरक्षा, मध्य भारत में बाघ आवास के आसपास बफर जोन, और तराई क्षेत्रों में सामुदायिक निगरानी जैसे उपाय प्रभावी हो सकते हैं। त्वरित मुआवज़ा, फसल सुरक्षा, चेतावनी प्रणाली और समुदायों की भागीदारी भी इस समस्या को कम करने में मदद कर सकती है। भारत में जंगल और गाँव अक्सर एक-दूसरे के बेहद करीब हैं। यही नज़दीकी हमारी जैव विविधता की ताकत भी है और संघर्ष की वजह भी।

नरोत्तम बेहरा जैसे लोगों की मौत केवल एक आंकड़ा नहीं होती, बल्कि एक परिवार की दुनिया उजड़ जाती है। उसी तरह, हर संघर्ष में मारे गए हाथी या बाघ से जंगल का संतुलन भी प्रभावित होता है। इसलिए समाधान केवल जानवरों को बचाने या इंसानों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। असली चुनौती है, दोनों के बीच संतुलन बनाना, ताकि जंगल भी जिंदा रहें और इंसान भी सुरक्षित रह सकें।

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