गर्मी-सूखे में भी होगी बेहतर पैदावार, मौसम की मार से बचाएंगी ICAR की नई गेहूं और जौ वैरायटी
Gaon Connection | Apr 25, 2026, 18:22 IST
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए नए दरवाजे खोल रही है। गेहूं और जौ की नई किस्मों का विकास न केवल सिंचाई जल और उर्वरक की खपत को कम करेगा, बल्कि यह किसानों की आमदनी को भी दोगुना करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
जलवायु परिवर्तन के साथ बदलेगी खेती
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) गेहूं और जौ जैसी फसलों को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक सहनशील बनाने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में बड़ी सफलता हासिल कर रहा है। यह देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने और किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। करनाल में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग के सचिव एवं आईसीएआर के महानिदेशक प्रो. एम.एल. जाट ने इन प्रयासों की समीक्षा की।
अंतरराष्ट्रीय मक्का और गेहूं सुधार केंद्र (CIMMYT) के सहयोग से गंगा–सिंधु के मैदानी क्षेत्र में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि सिंचाई जल के उपयोग में 85% तक की कमी लाई जा सकती है। इसके साथ ही, उर्वरक उपयोग में 28%, ईंधन की खपत में 51%, फसल अवशेष जलाने में 95% और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 46% की कमी भी दर्ज की गई है। इन सुधारों से किसानों की आय लगभग दोगुनी होने की उम्मीद है।
आईसीएआर के अनुसार, देश इस साल गेहूं का बंपर उत्पादन करने के लिए तैयार है, जिससे न केवल घरेलू खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी मदद मिलेगी। अब ध्यान सिर्फ उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि पोषक तत्वों से भरपूर और जलवायु-अनुकूल फसलों पर केंद्रित है। जैविक नाइट्रिफिकेशन अवरोधन (बीएनआई) तकनीक से उत्पादन को कम किए बिना नाइट्रोजन उर्वरक के उपयोग में 25% तक की कमी संभव है। इस तकनीक के व्यापक उपयोग से सालाना लगभग 2,000 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
वर्तमान में, 19 गेहूं किस्मों का बहु-स्थान परीक्षण चल रहा है। आईसीएआर ने आयरन, जिंक और प्रोटीन से भरपूर 55 जैव-संवर्धित गेहूं की किस्में विकसित की हैं, जिन्हें देश के लगभग 45% गेहूं क्षेत्र में अपनाया जा चुका है। उच्च तापमान, सूखा, लवणता और रतुआ रोगों के प्रति सहनशील किस्मों के विकास पर भी काम जारी है। लगभग एक करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करने वाली निगरानी प्रणाली से रोगों की समय पर पहचान और प्रबंधन संभव हो रहा है।
कम पानी और कम लागत में उगने वाला जौ अब खाद्य, पशु आहार और औद्योगिक उपयोग के कारण एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक फसल के रूप में उभर रहा है। दीर्घकालिक अध्ययनों में 15 वर्षों में मृदा कार्बन और सूक्ष्मजीव गतिविधि लगभग दोगुनी पाई गई है, जो टिकाऊ कृषि और कार्बन न्यूट्रल लक्ष्य के अनुरूप है। आईसीएआर की रणनीति अब तकनीक-आधारित, जलवायु-सहिष्णु और पोषण-केंद्रित कृषि पर केंद्रित है। यह उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह प्रयास जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और कृषि क्षेत्र को अधिक लचीला बनाने में सहायक होंगे। गेहूं और जौ जैसी प्रमुख फसलों में सुधार से न केवल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार आएगा।
जौ को एक वैकल्पिक फसल के रूप में बढ़ावा देने से जल संसाधनों पर दबाव कम होगा और भूमि की उर्वरता में वृद्धि होगी। यह टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। किसानों की लागत में भी कमी आएगी। क्योंकि रोग प्रतिरोधी किस्मों का विकास और निगरानी प्रणाली का विस्तार फसलों को विभिन्न प्रकार के रोगों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इससे फसल की हानि को कम किया जा सकेगा। साथ ही आईसीएआर द्वारा विकसित जैव-संवर्धित गेहूं की किस्में पोषण सुरक्षा में सुधार करेंगी, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी एक बड़ी समस्या है। यह सुनिश्चित करेगा कि उपभोक्ताओं को न केवल पर्याप्त मात्रा में भोजन मिले, बल्कि वह पौष्टिक भी हो। जलवायु-अनुकूल किस्मों पर जोर देने से बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी कृषि उत्पादकता बनी रहेगी।