खेती पर बढ़ रहा मौसम का ख़तरा, अब नए तरीके अपनाने का समय, जानिए क्या है उपाय
Gaon Connection | Jul 11, 2026, 11:20 IST
भारत में जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर लगातार बढ़ रहा है। अनियमित मानसून, बढ़ता तापमान, सूखा और एल नीनो जैसी परिस्थितियाँ कृषि के लिए नई चुनौतियाँ पैदा कर रही हैं। फ़र्टिलाइज़र एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (एफ़एआईएफ़ए) की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में देश के अधिकांश दिनों में चरम मौसम की घटनाएँ दर्ज की गईं, जिससे करोड़ों हेक्टेयर कृषि भूमि प्रभावित हुई। ऐसे हालात में फसल विविधीकरण, मिट्टी और जल संरक्षण, आधुनिक तकनीक तथा सरकारी योजनाओं के बेहतर उपयोग के ज़रिए खेती को जलवायु जोखिमों के प्रति अधिक मज़बूत और टिकाऊ बनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है।
अब बदलनी होगी खेती की सोच
भारत में खेती अब जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है। अनियमित मानसून, बढ़ता तापमान, बार-बार पड़ने वाला सूखा और एल नीनो जैसी मौसमी परिस्थितियाँ खेती को पहले से अधिक जोखिम भरा बना रही हैं। इसके साथ ही लगातार एक जैसी खेती, मिट्टी की घटती उर्वरता और पानी पर बढ़ता दबाव भी कृषि क्षेत्र के सामने नई मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। ऐसे में खेती को भविष्य के लिए अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा महसूस की जा रही है।
देश की आधी से अधिक आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। ऐसे में बदलते मौसम का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसी वजह से खेती में ऐसे बदलावों पर ज़ोर दिया जा रहा है, जो मौसम की अनिश्चितताओं के बावजूद उत्पादन को स्थिर बनाए रखने में मदद करें।
फ़र्टिलाइज़र एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (एफ़एआईएफ़ए) की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी से नवंबर 2025 के बीच देश में 334 दिनों में से 331 दिनों तक किसी न किसी हिस्से में चरम मौसम की घटनाएँ दर्ज की गईं। इसका असर 1.7 करोड़ हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि पर पड़ा। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जाँच किए गए अधिकांश मिट्टी के नमूनों में आवश्यक पोषक तत्वों और जैविक कार्बन की कमी पाई गई।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने इस मानसून के दौरान अल नीनो की स्थिति बनने की संभावना जताई है। इससे सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान है, जो खरीफ़ फसलों के लिए चुनौती बन सकता है। ऐसे हालात में समय रहते योजना बनाना, जोखिम का आकलन करना और मौसम के अनुरूप खेती के तरीक़े अपनाना ज़रूरी माना जा रहा है। खेती को मौसम के अनुकूल बनाने के लिए डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन, एग्रीस्टैक, भारत-विस्तार, पीएम-कुसुम और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी कई सरकारी पहलें भी चल रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य किसानों तक मौसम संबंधी जानकारी, आधुनिक तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और फसल सुरक्षा जैसी सुविधाएँ पहुँचाना है।
फ़र्टिलाइज़र एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (एफ़एआईएफ़ए) के अध्यक्ष पी. एस. मुरली बाबू ने 'बिजनेस लाइन' को बताया कि बदलते मौसम के असर को कम करने के लिए मिट्टी की सेहत सुधारने, पानी का बेहतर उपयोग करने और एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने पर ज़ोर दिया जा रहा है। इससे मौसम से जुड़े जोखिम कम करने और उत्पादन को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई), सैटेलाइट निगरानी, रिमोट सेंसिंग, सटीक सिंचाई और मौसम आधारित सलाह जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किसानों को सही समय पर बेहतर फ़ैसले लेने में मदद कर सकता है। इन तकनीकों को स्थानीय कृषि अनुभव और सरकारी कृषि सेवाओं के साथ जोड़कर खेती को अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है।
रिपोर्ट में गुजरात के खिरसरा क्षेत्र का उदाहरण भी दिया गया है, जहाँ लगभग 4,200 वर्ष पहले सूखे की स्थिति में किसानों ने केवल जौ की खेती पर निर्भर रहने के बजाय बाजरा, ज्वार और धान जैसी फसलों को अपनाया था। फसलों में इस बदलाव से कठिन परिस्थितियों में भी खेती जारी रखी जा सकी। बदलते मौसम के दौर में यही मॉडल आज भी खेती को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने का रास्ता माना जा रहा है।
देश की आधी से अधिक आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। ऐसे में बदलते मौसम का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसी वजह से खेती में ऐसे बदलावों पर ज़ोर दिया जा रहा है, जो मौसम की अनिश्चितताओं के बावजूद उत्पादन को स्थिर बनाए रखने में मदद करें।
बदलते मौसम का बढ़ रहा असर, तकनीक और नई खेती पद्धतियों पर ज़ोर
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने इस मानसून के दौरान अल नीनो की स्थिति बनने की संभावना जताई है। इससे सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान है, जो खरीफ़ फसलों के लिए चुनौती बन सकता है। ऐसे हालात में समय रहते योजना बनाना, जोखिम का आकलन करना और मौसम के अनुरूप खेती के तरीक़े अपनाना ज़रूरी माना जा रहा है। खेती को मौसम के अनुकूल बनाने के लिए डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन, एग्रीस्टैक, भारत-विस्तार, पीएम-कुसुम और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी कई सरकारी पहलें भी चल रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य किसानों तक मौसम संबंधी जानकारी, आधुनिक तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और फसल सुरक्षा जैसी सुविधाएँ पहुँचाना है।
फसल विविधीकरण और आधुनिक तकनीक से बढ़ सकती है खेती की मज़बूती
रिपोर्ट में गुजरात के खिरसरा क्षेत्र का उदाहरण भी दिया गया है, जहाँ लगभग 4,200 वर्ष पहले सूखे की स्थिति में किसानों ने केवल जौ की खेती पर निर्भर रहने के बजाय बाजरा, ज्वार और धान जैसी फसलों को अपनाया था। फसलों में इस बदलाव से कठिन परिस्थितियों में भी खेती जारी रखी जा सकी। बदलते मौसम के दौर में यही मॉडल आज भी खेती को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने का रास्ता माना जा रहा है।